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वीरगाथा: देश में दूसरे गदर का असफल प्रयास था लाहौर और बनारस षड्यंत्र, चंद गद्दारों की मुखबिरी से मिली असफलता

Wed, 14 Aug 2024 05:27 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Wed, 14 Aug 2024 05:27 PM IST
सार

Varanasi News: देश की स्वतंत्रता में बनारस का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। 1947 के पहले 21 फरवरी 1915 को देश में दूसरे गदर की तैयारियां पूरी हो गई थीं। बड़े विप्लव की तैयारी शुरू हो गई थी। 1857 की क्रांति के बाद फिर से उसी तरह की तैयारियों को देखकर रास बिहारी बोस और शचींद्र नाथ सान्याल रोमांचित थे।

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Lahore and Banaras conspiracy failed attempt to start second mutiny in the country
देश में दूसरे गदर का असफल प्रयास। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लाहौर और बनारस षड्यंत्र 1857 के बाद देश में दूसरे गदर का असफल प्रयास था। 21 फरवरी 1915 को देश में दूसरे गदर की तैयारियां पूरी हो गई थीं। बनारस में ही विद्रोह का ताना-बाना बुना गया था और सिख रेजीमेंट विद्रोह के लिए तैयार बैठी थी। चंद गद्दारों की मुखबिरी के कारण विद्रोह सफल नहीं हो सका।

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जब ब्रिटिश हूकुमत प्रथम विश्व युद्ध में उलझी हुई थी तब रास बिहारी बोस और उनके लेफ्टिनेंट शचींद्र नाथ सान्याल ने बनारस में रहकर विद्रोह की तैयारी की। इसके तहत सिख रेजीमेंट बनारस, लाहौर और रावलपिंडी में विद्रोह करके देश को फिरंगियों से आजाद कराना था। 
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दिल्ली में लाॅर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के बाद रास बिहारी बोस पर कुल 15 हजार का इनाम घोषित था। रास बिहारी बोस ने बनारस में रहकर गदर का ताना बाना बुना। बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय बताते हैं कि पंजाब, दिल्ली और बंगाल से लोग रास बिहारी बोस से मिलने बनारस आते थे। 
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बाहरी लोगों से मिलने के लिए बनारस में रास बिहारी ने अलग ठिकाना बनाया था। बड़े विप्लव की तैयारी शुरू हो गई थी। 1857 की क्रांति के बाद फिर से उसी तरह की तैयारियों को देखकर रास बिहारी बोस और शचींद्र नाथ सान्याल रोमांचित थे। अमेरिका से विष्णु गणेश पिंगले बनारस पहुंच गए थे। 

पंजाब में विप्लव की तैयारियों का सारा भार उन सिखों पर था जो अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से लौटकर भारत आए थे। रासबिहारी को वे पंजाब ले जाना चाहते थे। रासबिहारी ने शचींद्र नाथ सान्याल को सिखों से संपर्क करने और विप्लव की तैयारियों के सिलसिले में लुधियाना भेजा। 

कई बार लाहौर और लुधियाना होकर सान्याल काशी लौटे। इसके बाद रास बिहारी काशी से लाहौर गए। तय हुआ कि लाहौर की सिख रेंजीमेंट 21 फरवरी 1915 को विद्रोह शुरू करेगी। काशी के सिख रेजीमेंट ने भी विद्रोह शुरू होने पर साथ देने का वायदा किया था।

अखबार के जरिये पता चला शुरू हो गई धर पकड़
विद्रोह के लिए जो योजना निर्धारित थी, उसे देखने जानने के लिए सान्यालजी मोटर साइकिल से बनारस कैंटोनमेंट पर शाम के समय पहुंचे। उन्होंने अखबार खरीदा तो मालूम चला कि लाहौर में धरपकड़ शुरू हो गई है। यूरोपियन फौज शहर में पिकेट कर रही है। वे समझ गए कि कुछ गड़बड़ हो गई है। वे तुरंत लौट आए। अजीब स्थिति थी, चेहरा मुरझाया हुआ और मन अशांत। दरअसल एक गद्दार ने सब गड़बड़ कर दिया था।

विप्लव दल में भर्ती कृपाल ने किया था भंडाफोड़
पंजाब पुलिस के खुफिया विभाग के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने कृपाल सिंह नाम के सिख को विप्लव दल में भर्ती करा दिया था। इसी एक व्यक्ति ने सारा भंडाफोड़ कर दिया। गदर की निश्चित तिथि 21 फरवरी आने से पूर्व ही गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। आखिरकार विप्लव असफल हो गया। बनारस में पिंगले को एक गद्दार ने बमों सहित छावनी में ले जाकर पकड़वा दिया।

रासबिहारी ने छोड़ा देश, सान्याल हुए गिरफ्तार
रासबिहारी बोस ने अप्रैल 1915 में देश छोड़ दिया। शचींद्र नाथ सान्याल 26 जून 1915 को गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ दिन बनारस जेल में रखने के बाद उन्हें काला पानी भेज दिया गया। लाहौर षड्यंत्र और बनारस षड्यंत्र के नाम से क्रांतिकारियों पर मुकदमा चला। बहुतों को फांसी दी गई और स्वतंत्रता संग्राम का दूसरा प्रयास असफल रह गया अन्यथा भारत 21 फरवरी 1915 को ही आजाद हो गया होता।

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