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काशी में भारतीय कला की अनमोल थाती देखने जाएंगे मोदी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 29 Apr 2016 02:18 AM IST
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ज्ञान प्रवाह में मूर्तियां तैयार करता कारीगर। पीएम मोदी यहां का दौरा करेंगे।
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काशी में भारतीय कला के विविध आयामों का अनमोल खजाना देखने पहली बार एक मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ज्ञान प्रवाह जाएंगे। गंगा तट पर सुरम्य लहरों से संवाद करती कला यहां सिर्फ थाती के तौर पर सहेजकर रखी ही नहीं जाती, पत्थरों-धातुओं पर आकार भी लेती है। चाहे मुगल काल के शिल्प हों या नेवारी चित्रित पोथी के बेजोड़ नमूने, यहां ज्ञान के भंडार के रूप में बरबस ध्यान खींच लेते हैं। कला-संस्कृति के संरक्षण वाले ज्ञान प्रवाह की 20 वर्षों की कला-संपदा को लेकर संभावनाओं के नए द्वार खुलने के संकेत मिले हैं। इसके लिए संग्रहालय परिसर को सजाया-संवारा जा रहा है।
ज्ञान प्रवाह में न केवल भारतीय कला-संस्कृति के विविक्ष पक्षों से प्रधानमंत्री परिचित होंगे, बल्कि कम समय में ही बनारस की पारंपरिक शैलियों और प्राचीन विरासत के अनछुए पहलुओं की भी उन्हें जानकारी दी जाएगी। इसके लिए प्राचीन शैली की मूर्तियों के साथ ही अष्टधातु के हाथी, शेर, सूर्य भगवान की प्रतिमाओं के अलावा मुगल शैली के नक्काशीदार बर्तनों को हस्तशिल्पी रामचंद्र विश्वकर्मा, शक्ति सिंह, सतीश पटेल तराशने में जुटे हैं।
कला परिसर में गुरुवार की दोपहर कारीगर अष्टधातु की प्रतिमाओं को ढालने की प्रक्रिया में भी जुट गए। पीएम की इस नजर-ए-इनायत से प्राचीन कला-शिल्प के कायाकल्प के संकेत मिले हैं। ज्ञान प्रवाह के द्वितीय तल पर स्थित संग्रहालय के सभागार में बद्री प्रसाद विश्वकर्मा, काशीनाथ विश्वकर्मा, गणेश विश्वकर्मा, नंदकिशोर सिंह, राम जियावन समेत करीब 10 हस्तशिप्ल्पी टेराकोटा पर कारीगरी, मोम की आकृतियां, धातुओं पर ढलाई, लकड़ी के खिलौने, धातुओं और पत्थरों पर नक्काशी पीएम के सामने करते नजर आएंगे।
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ज्ञान प्रवाह के सहायक निदेशक नीरज पांडेय ने बताया कि एसपीजी को इन कारीगरों की सूची जल्द सौंप दी जाएगी। नजर डालें तो भारतीय कला की प्रमुख शैलियों का ज्ञान प्रवाह अनूठा संग्रह है। संग्रहालय में बीकानेर शैली की कलाओं विशेष संग्रह किया गया है। 1435 की नेवारी चित्रित पोथी के अलावा तिब्बती, नेपाली चित्रित थंका, ताड़पत्र भी यहां संग्रहणीय है। इसके अलावा संग्रहालय में काष्ठ पटली, शाहनामा, कल्पसूत्र, जहांगीर के सिंह आखेट, राग-रागिनियों के चित्रों के अलावा जरदोजी में गोटा-किनारी के वस्त्र, 1825 में निर्मित पश्मीना शाल, कसीदाकारी ऊंची चंदोवा, फारसी कशीदाकारी, तोरण फारसी कसीदाकारी, आहत मुद्राएं, औजार, हाथी की झूलदार मखमल की कशीदाकारी देखने लायक है। पद्मश्री बिमला पोद्दार और सुरेश नेवटिया के प्रयासों से इस कला केंद्र की स्थापना हो सकी।
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ज्ञान प्रवाह में न केवल भारतीय कला-संस्कृति के विविक्ष पक्षों से प्रधानमंत्री परिचित होंगे, बल्कि कम समय में ही बनारस की पारंपरिक शैलियों और प्राचीन विरासत के अनछुए पहलुओं की भी उन्हें जानकारी दी जाएगी। इसके लिए प्राचीन शैली की मूर्तियों के साथ ही अष्टधातु के हाथी, शेर, सूर्य भगवान की प्रतिमाओं के अलावा मुगल शैली के नक्काशीदार बर्तनों को हस्तशिल्पी रामचंद्र विश्वकर्मा, शक्ति सिंह, सतीश पटेल तराशने में जुटे हैं।
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कला परिसर में गुरुवार की दोपहर कारीगर अष्टधातु की प्रतिमाओं को ढालने की प्रक्रिया में भी जुट गए। पीएम की इस नजर-ए-इनायत से प्राचीन कला-शिल्प के कायाकल्प के संकेत मिले हैं। ज्ञान प्रवाह के द्वितीय तल पर स्थित संग्रहालय के सभागार में बद्री प्रसाद विश्वकर्मा, काशीनाथ विश्वकर्मा, गणेश विश्वकर्मा, नंदकिशोर सिंह, राम जियावन समेत करीब 10 हस्तशिप्ल्पी टेराकोटा पर कारीगरी, मोम की आकृतियां, धातुओं पर ढलाई, लकड़ी के खिलौने, धातुओं और पत्थरों पर नक्काशी पीएम के सामने करते नजर आएंगे।
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ज्ञान प्रवाह के सहायक निदेशक नीरज पांडेय ने बताया कि एसपीजी को इन कारीगरों की सूची जल्द सौंप दी जाएगी। नजर डालें तो भारतीय कला की प्रमुख शैलियों का ज्ञान प्रवाह अनूठा संग्रह है। संग्रहालय में बीकानेर शैली की कलाओं विशेष संग्रह किया गया है। 1435 की नेवारी चित्रित पोथी के अलावा तिब्बती, नेपाली चित्रित थंका, ताड़पत्र भी यहां संग्रहणीय है। इसके अलावा संग्रहालय में काष्ठ पटली, शाहनामा, कल्पसूत्र, जहांगीर के सिंह आखेट, राग-रागिनियों के चित्रों के अलावा जरदोजी में गोटा-किनारी के वस्त्र, 1825 में निर्मित पश्मीना शाल, कसीदाकारी ऊंची चंदोवा, फारसी कशीदाकारी, तोरण फारसी कसीदाकारी, आहत मुद्राएं, औजार, हाथी की झूलदार मखमल की कशीदाकारी देखने लायक है। पद्मश्री बिमला पोद्दार और सुरेश नेवटिया के प्रयासों से इस कला केंद्र की स्थापना हो सकी।