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जगन्नाथ मंदिर: काशी में यूपी का दूसरा सबसे ऊंचा शिखर वाला बनेगा मंदिर, तीन साल में बनकर होगा तैयार
Thu, 07 May 2026 03:21 PM IST
Pragati Chand
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Thu, 07 May 2026 03:21 PM IST
सार
Varanasi News: काशी में मिनी पुरी का सपना साकार होगा। अस्सी घाट पर जगन्नाथ कॉरिडोर के निर्माण की तैयारी तेज कर दी गई है। धौलपुर के नक्काशीदार पत्थर से मंदिर की शोभा बढ़ाएंगे।
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जगन्नाथ मंदिर का मॉडल
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
गंगा में स्नान करने वालों को नदी से ही श्री जगन्नाथ मंदिर के शिखर के दर्शन होंगे। इसके लिए शिखर को 65 मीटर यानी लगभग 213 फीट ऊंचा बनाने की तैयारी है। अभी तक काशी में एशिया का सबसे ऊंचा शिखर वाला मंदिर बीएचयू स्थित विश्वनाथ मंदिर है, जिसकी ऊंचाई 250 फीट है। अस्सी घाट पर जगन्नाथ मंदिर के निर्माण के बाद यह यूपी का दूसरा सबसे ऊंचा शिखर वाला मंदिर होगा।
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जगन्नाथ ट्रस्ट के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि दिसंबर 2029 तक मंदिर का निर्माण प्रस्तावित है। इसके निर्माण में पहले फेज में तकरीबन 30 करोड़ रुपये की लागत आएगी। बीते एक मई को मंदिर का शिलान्यास होने के बाद इसके निर्माण में तेजी आई है। इस कॉरिडोर की भव्यता को निखारने के लिए राजस्थान के धौलपुर से विशेष लाल, गुलाबी और सफेद पत्थर मंगवाए गए हैं।
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मंदिर में लाखों घन फुट पत्थरों का उपयोग दीवारों पर सुंदर नक्काशी, फर्श और खंभों के निर्माण के लिए किया जाएगा। धौलपुर के पत्थर अपनी मजबूती और राजसी चमक के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। जगन्नाथ मंदिर में गुरूकुल, धर्मशाला समेत अन्न क्षेत्र का भी निर्माण होगा। यहां भक्तों के रहने के साथ ही नि:शुल्क भोजन की भी व्यवस्था होगी। धर्मशाला में देशभर से आए श्रद्धालु अत्यंत कम कीमत पर मंदिर में ठहर सकेंगे।
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एक लाख वर्गफीट में सजेगा जगन्नाथ का दरबार
ट्रस्ट के मुताबिक, लगभग एक लाख वर्गफीट के विस्तृत क्षेत्र में प्रभु जगन्नाथ का दरबार सजेगा। मंदिर का निर्माण पारंपरिक नागर शैली में किया जाएगा, जिसमें दो ऊंचे शिखर होंगे। इसका डिजाइन ओडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर की याद दिलाएगा, लेकिन इसमें काशी की मौलिकता भी सुरक्षित रहेगी। परिसर में मुख्य प्रासाद के अलावा शिखर, यज्ञ मंडप और वेदाध्ययन कक्ष का भी निर्माण होगा। खास बात यह है कि मंदिर के तीनों प्राचीन विग्रह (मूर्तियां) यथावत रहेंगे। उससे किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
भक्ति और उपवास से जुड़ी है मंदिर की नींव
शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि 17वीं शताब्दी में जगन्नाथ पुरी के एक अनन्य भक्त ब्रह्मचारी जी पुरी नरेश से अनबन के बाद काशी चले आए थे। वे केवल जगन्नाथ जी का महाप्रसाद ही ग्रहण करते थे, जिसे पुरी से काशी पैदल लाया जाता था। कभी-कभी देरी होने पर उन्हें हफ्तों भूखा रहना पड़ता था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1790 में स्वयं भगवान जगन्नाथ ने भक्त के स्वप्न में आकर काशी में ही स्थापित होने की इच्छा जताई। इसके बाद भोसला रियासत के सहयोग से अस्सी में मंदिर का निर्माण हुआ और 1802 में पहली बार काशी में रथयात्रा उत्सव की शुरुआत हुई।
भक्ति और उपवास से जुड़ी है मंदिर की नींव
शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि 17वीं शताब्दी में जगन्नाथ पुरी के एक अनन्य भक्त ब्रह्मचारी जी पुरी नरेश से अनबन के बाद काशी चले आए थे। वे केवल जगन्नाथ जी का महाप्रसाद ही ग्रहण करते थे, जिसे पुरी से काशी पैदल लाया जाता था। कभी-कभी देरी होने पर उन्हें हफ्तों भूखा रहना पड़ता था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वर्ष 1790 में स्वयं भगवान जगन्नाथ ने भक्त के स्वप्न में आकर काशी में ही स्थापित होने की इच्छा जताई। इसके बाद भोसला रियासत के सहयोग से अस्सी में मंदिर का निर्माण हुआ और 1802 में पहली बार काशी में रथयात्रा उत्सव की शुरुआत हुई।