हनुमान फाटक दंगे में बनारस को झुलसने से बचाया
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जनता और पार्टी के प्रति अब उस तरह के समर्पित नेता ढूंढने से नहीं मिलेंगे। अब क्षेत्रों में नेताओं के दौरे तब होते हैं, जब चुनाव आता है लेकिन तब ऐसा नहीं था। 1967 में वाराणसी संसदीय सीट से कांग्रेस के ईमानदार छवि के कद्दावर नेता और लगातार तीन बार सांसद रहे रघुनाथ सिंह को हराने वाले कामरेड सत्यनारायण सिंह की सादगी और जनसेवा के चर्चे आज भी बनारस की गलियों में आम हैं।
पार्टी दफ्तर उनके लिए तीर्थ के समान था। सीपीएम के संगठन के लिए जब उन्होंने जौनपुर (मड़ियाहूं) का अपना घर छोड़ा तब फिर दोबारा मुड़कर कभी वहां गए नहीं। दशाश्वमेध के पार्टी कार्यालय को ही उन्होंने अपना बसेरा भी बनाया और दफ्तर भी। इसी दफ्तर में फर्श पर बिछी दरी पर उन्होंने राजनीतिक तपस्वी की तरह जवानी से लेकर बुढ़ापा तक का जीवन गुजार दिया। उनका कभी कुर्ता फटा होता था तो कभी सदरी। सांसद बनने के बाद वह सुबह से शाम तक कार्यालय के बाहर की सीढ़ी से लगे चबूतरे पर बैठकर ही जनता की फरियाद सुनते थे। जेरगुलर मुहल्ले के निवासी कामरेड मोबिन अहमद बताते हैं कि 1967 में हनुमान फाटक में ताजिए के जुलूस को लेकर दंगा भड़क गया था। अलईपुर-दोषीपुरा के ताजिए गोला, हनुमान फाटक से होकर गुजरते थे। गोला में ताजिया लेकर चलने वाले किसी के चबूतरे पर चढ़ गए थे। इसी को लेकर बवाल हो गया। एक व्यक्ति की मौत हो गई। एक और आदमी गोली लगने से घायल हो गया था। बवाल के दौरान पुलिस ने फायरिंग की थी।
इसकी जानकारी मिलते ही सांसद सत्यनारायण सिंह गोला पहुंचे। उनके साथ कुछ कार्यकर्ता भी थे। उन्हें देख कंकड़ सिंह दारोगा ने रिवाल्वर तान ली। उन्होंने दरोगा से कहा कि हिम्मत हो तो चलाओ गोली। मैं आ रहा हूं। दारोगा को फोर्स लेकर पीछे हटना पड़ा। तब सत्यनारायण सिंह ने हनुमान फाटक इलाके में कैंप कर दोनों समुदायों के साथ दिन-रात बैठकें कीं। अंतत: बात बन गई और माहौल सामान्य हो गया।