Gyanvapi Survey: अभिलेखों की तलाश और इमारत के आर्किटेक्चर का होगा सर्वे, 15 दिनों के अंदर तैयार होगा रेखाचित्र
Gyanvapi Survey: पुरातत्वविद का कहना है कि एएसआई की टीम सर्वे के दौरान दो महत्वपूर्ण बिंदुओं का ध्यान रखेगी। एक तो अभिलेख और दूसरा इमारत का ढांचा। परिसर में कहीं न कहीं ऐसा अभिलेख जरूर होगा, जिस पर इमारत के कालखंड का वर्णन हो।
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ज्ञानवापी के सर्वे में ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक का भी इस्तेमाल होगा। एएसआई की टीम का पूरा ध्यान इमारत के आर्किटेक्चर और अभिलेखों की तलाश पर होगा। सर्वे के 15 दिनों के अंदर ज्ञानवापी का रेखाचित्र तैयार हो जाएगा। इससे पता चले जाएगा कि इमारत का प्राचीन कालीन स्वरूप कैसा व कितना भव्य रहा है। यह कहना है बीएचयू के इतिहासकार व पुरातत्वविद प्रो. अशोक कुमार सिंह का। वह कोर्ट कमिश्नर की कार्रवाई के दौरान ज्ञानवापी परिसर जा चुके हैं। प्रारंभिक सर्वे का हिस्सा भी रहे हैं।
पुरातत्वविद का कहना है कि एएसआई की टीम सर्वे के दौरान दो महत्वपूर्ण बिंदुओं का ध्यान रखेगी। एक तो अभिलेख और दूसरा इमारत का ढांचा। परिसर में कहीं न कहीं ऐसा अभिलेख जरूर होगा, जिस पर इमारत के कालखंड का वर्णन हो। यह एक दस्तावेजी सबूत होगा। शिलालेख या फिर किसी लिखित दस्तावेज की तलाश की जाएगी। हर कालखंड में शैलियां बदलती हैं।
जीपीआर तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका
शिलालेख या दस्तावेज के अध्ययन से यह पता चलेगा कि इमारत किस कालखंड से जुड़ी है। बिना नुकसान पहुंचाए ज्ञानवापी की दीवारों, खंभों और स्ट्रक्चर का भी सर्वे किया जा सकता है। मौजूदा स्ट्रक्चर की दीवारों पर जो भी चिन्ह हैं, वह सर्वे में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। प्रो. सिंह ने कहा कि यह निर्माण कब का है, यह साबित करना पड़ेगा। इसमें जीपीआर तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नागर शैली में निर्मित है इमारत
पुरातत्वविद प्रो. अशोक ने कहा कि फिलहाल जो साक्ष्य हैं, उसे देखकर लगता है कि इमारत का निर्माण नागर शैली का है। नागर शैली की शुरूआत गुप्त काल से होती है। उत्तर भारत में जितने भी मंदिर हैं, सभी नागर शैली में निर्मित हैं। गुप्त काल चार सौ से पांच सौ ईस्वी पूर्व का माना जाता है। हालांकि, इमारत इतनी पुरानी है या नहीं, यह तो जांच का विषय है। लेकिन, इसकी शैली देखकर लगता है कि इसे आठवीं और नौवीं शताब्दी में बनाया गया होगा।
इमारत के ढांचे को ही दूसरा रूप देने का प्रयास किया गया
कोर्ट कमिश्नर की कार्रवाई के दौरान ज्ञानवापी परिसर में गए प्रो. अशोक सिंह ने बताया कि उस कालखंड की इमारत इतनी भव्य और मजबूत थी कि उसका स्वरूप पूरी तरह से नहीं बदला जा सका। इमारत के ढांचे को ही दूसरा रूप देने का प्रयास किया गया। हालांकि, बहुत हद तक सफलता नहीं मिल सकी थी। ज्ञानवापी का पिछला ढांचा देखकर यह तथ्य साफ हो जाता है। तहखाने का हर खंभा साक्ष्य के तौर पर देखा जा सकता है। एएसआई को जल्द ही ढेर सारे साक्ष्य मिल जाएंगे। इसके जरिये नतीजों पर पहुंचा जा सकेगा। तय किया जा सकेगा कि किसका दावा सही और किसका गलत है।