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कम पढ़े लिखे बुनकरों के लिए जी का जंजाल बना GST

Tue, 27 Jun 2017 12:47 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,मऊ
ब्यूरो,अमर उजाला,मऊ Updated Tue, 27 Jun 2017 12:47 AM IST
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GST creates problem for less educated weavers
बुनकर
एक जुलाई से जीएसटी अमल में आ जाएगा। इस खबर से बुनकर मजदूर खासे परेशान हैं। कारण कि बुनकरों द्वारा तैयार कपड़ों पर भी पांच फीसदी जीएसटी  है। समस्या जीएसटी नहीं बल्कि उसके लिए कागजी कार्रवाई है। नई कर प्रणाली उनके जी का जंजाल बन गया है।
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जीएसटी के नियमों के मुताबिक हैंडलूम अथवा पावरलूम पर तैयार करने वाले बुनकर जब अपना माल लेकर आढ़तियों के पास जाएंगे तो उन्हें हर बार एक फार्म भरना होगा। उन्हें अपना पैन नंबर, टीन नंबर और जीसएटी नंबर देना होगा।
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यह कागजी कार्रवाई वे स्वयं पूरी नहीं कर सकते, क्योंकि यहां का कम पढ़े लिखे या अशिक्षित बुनकर अपना बैंक एकाउंट नंबर तक याद नहीं रख पाता है तो वह फार्म भरने की प्रक्रिया कैसे पूरी कर सकता है।
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मऊ में हथकरघा और पावरलूम से बनने वाले कपड़े और साड़ियों पर जीएसटी लागू होने से बुनाई उद्योग के चौपट होने का कारोबारी अंदेशा जता रहे हैं। जिले में बुनकरी का सारा कारोबार मजदूरों के जरिए होता है।

इक्का दुक्का बड़े कारोबारियों को छोड़ दिया जाए तो यहां पर एक परिसर में चलने वाली फैक्ट्रियां नहीं हैं। जनपद मुख्यालय से लेकर छोटे बड़े कस्बों व बाजारों में घर-घर हैंडलूम या पावरलूम लगे हैं। इन पर बुनकर साड़ियां और कपड़े तैयार करते हैं और उन्हें थोक आढ़तियों को बेचते हैं।

अब सरकार ने इनके द्वारा तैयार कपड़ों पर पांच फीसदी जीएसटी लगा दिया है। कारोबारियों का कहना है कि कुटीर उद्योग जुड़े अधिकांश बुनकर अशिक्षित हैं। नई कर प्रणाली उनके जी का जंजाल बन गया है।

यदि सस्ती साड़ियों के बनने में व्यवधान आएगा तो कम आय वर्ग के लोगों के लिए मुश्किल आएगी, क्योंकि बाहर की बनी साड़ियां निम्न आय वर्ग के लोगों की क्रय क्षमता से दूर होती हैं। 

जिला मुख्यालय पर लगभग डेढ़ लाख और पूरे जिले में लगभग चार लाख पावरलूम और हैंडलूम हैं। अकेले जिला मुख्यालय पर लगभग सवा लाख बुनकर हैं। इन लोगों की आजीविका का एकमात्र जरिया बुनकरी है।

बुनकर आढ़तियों द्वारा दी गई डिजाइन के आधार पर सिर्फ मजदूरी पर साड़ियां, लुंगी और अन्य कपड़े तैयार करते हैं। अब हैंडलूम और पावरलूम पर तैयार कपड़ों पर भी सरकार ने पांच प्रतिशत का जीएसटी टैक्स लगा दिया है।

इससे बुनाई क्षेत्र में खलबली मची है। अब तक यह क्षेत्र किसी भी प्रकार के टैक्स से अछूता था। आढ़तिया जमाल अर्पण कहते हैं कि मऊ की बुनाई पूरी तरह से जॉब वर्क पर आधारित है। यहां पर घर-घर में मशीनों पर काम होता है। कोई फैक्ट्री नहीं हैं। कम पढ़ा ल‌िखा  बुनकर कागजी कार्रवाई पूरी नहीं कर पाएगा। ऐसे में कारोबार का चौपट होना लाजिमी है। 

बनारसी साड़ी उद्योग पर खास असर नहीं

GST creates problem for less educated weavers
साड़ी
मऊ जिले के मुहम्मदाबाद गोहना क्षेत्र के खैराबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में बनारसी साड़ियां तैयार होती हैं। इन्हें तैयार करने वाले स्वयं डिजाइन तैयार कराने से लेकर उनकी प्रोसेसिंग और अन्य सारी प्रक्रिया पूरी करते हैं।

जानकारों का कहना है कि यदि इन पर पांच प्रतिशत टैक्स भी लगे तो इन पर कुछ खास असर नहीं पड़ने वाला। हां, ये साड़ियां पहले से कुछ मंहगी जरूर हो जाएंगी। 
देश भर में है मऊ की साड़ियों की मांग 
जनपद मुख्यालय से लेकर कोपागंज, अदरी, घोसी, मुहम्मदाबाद गोहना, वलीदपुर, सिपाह इब्राहिमाबाद में हैंडलूम और पावरलूम पर साड़ियां, लुंगियां, कम कीमत वाले मोटे कपड़े  बुनकरों द्वारा हाथ से तैयार किए जाते हैं। इन कपड़ों की मांग असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों वाले बाजारों में सबसे अधिक है। अच्छी और कीमती साड़ियों की मांग सूरत, बंगलूरू जैसे बड़े शहरों में ज्यादा है। 

हैंडलूम, पावरलूम के कपड़े देश में पहली बार टैक्स के दायरे में

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GST
थोक कारोबारी जमाल अर्पण कहते हैं कि देश में अब तक बुनकरों द्वारा हाथ से तैयार होने वाले कपड़ों पर कोई टैक्स नहीं लगता था। अब पहली बार सरकार ने इसे कर के दायरे में लाया है। कर लगने से कोई खास दिक्कत नहीं थी मगर कच्चे माल पर भी जीएसटी और तैयार कपड़ों पर जीएसटी है इस प्रकार इस क्षेत्र को दोहरा कर देना पडे़गा।

आढ़तियों को बढ़ेगी परेशानी 
 मऊ जिला मुख्यालय पर ऐसे आढ़तियों की संख्या भी खासी है जो कच्चा माल बाहर से मंगाते हैं और बुनकर मजदूरों को देकर साड़ियां, लुंगियां और कपड़े तैयार कराते हैं। फिर उन्हें निर्धारित मजदूरी देकर साड़ियां और कपड़े लेते हैं। बुनकरों को केवल मजदूरी ही मिलती है।

खरीदे हुए माल को आढ़तिये आर्डर के मुताबिक बाहर भेजते हैं। अब जीएसटी के नये प्रावधान के अनुसार इन्हें तैयार होने वाली साड़ियों, लुंगियों और अन्य सभी प्रकार के कपड़ों के बारे में पूरा व्यौरा तैयार करना होगा और इन्हें निर्धारित फार्म पर अंकित करना होगा।

बुनकर मजदूरों द्वारा तैयार माल के बाबत फार्म भरने की प्रकिया भी अब इन्हीं आढ़तियों को पूरी करनी होगी। इसे ये आढ़तिए सिरदर्द मान रहे हैं और इसका विरोध कर रहे हैं। 
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