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गणतंत्र के 70 सालः इस क्रांतिकारी ने अंग्रेज थानेदार को थाने में ही जला दिया था जिंदा

Sun, 27 Jan 2019 10:09 AM IST
shashikant misra अंकुर शुक्ला, अमर उजाला, वाराणसी
अंकुर शुक्ला, अमर उजाला, वाराणसी Published by: shashikant misra Updated Sun, 27 Jan 2019 10:09 AM IST
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Freedom fighter burnt british inspector alive on the police station
bk banerjee - फोटो : amar ujala
देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाले वीर सपूतों के बलिदानों को भुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण की बाजी लगा दी थी। इनमें पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में 1927 में जन्मे और अब काशी में रह रहे स्वतंत्रता सेनानी वीके बनर्जी किशोरावस्था में अपने रिश्तेदार के घर मुजफ्फरपुर (बिहार) आए थे।
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यहां अगस्त क्रांति में देश का साथ दे रहे युवाओं के साथ मिलकर मीनापुर पुलिस चौकी पर जैक फ्लैग उतारकर तिरंगा फहरा रहे थे कि झंडे की गांठ फंस गई। जिसे खोलने के लिए एक बच्चे को पोल पर चढ़ाया गया, तभी अंग्रेज थानेदार ने उसे गोली मार दी।
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इससे बौखलाए देश प्रेमियों ने उसे दौड़ाकर अरहर के खेत में पकड़ लिया। थाने में लाकर लाठियों की गठ्ठर बनाकर उसे थाने सहित जिंदा जला दिया। इस दौरान पहुंची अंग्रेजी सेना से युवाओं की मुठभेड़ हुई, जिसमें वह पकड़ लिए गए।
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जेलों में जगह न होने पर सभी को समीप के एक स्कूल में बंद किया गया, मगर भोर में वह किसी तरह भाग निकले और नेपाल चले गए। यहां से वापस रक्सौल में आकर रेलवे के तार को काटते हुए पकड़ लिए गए। इस पर डेढ़ साल की जेल और 16 बेत की सजा सुनाई गई। जिसे उन्होंने मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, पटना और भागलपुर जेल में काटा। 

जेल में किया ध्वजारोहण

Freedom fighter burnt british inspector alive on the police station
dhanya kumar - फोटो : amar ujala
मध्य प्रदेश के सागर जनपद के खोरई गांव में जन्में धन्य कुमार जैन के बड़े भाई पंडित महेंद्र कुमार नयाचार्य वाराणसी में स्यादबाद विद्यालय भदैनी में अध्यापक थे। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद 23-24 वर्ष की आयु में धन्य कुमार आगे की पढ़ाई के लिए यहां आ गए और दाखिला लिए।

इसी समय अगस्त क्रांति शुरू हो गई, जिसमें विद्यालय के अध्यापक और विद्यार्थी राष्ट्रहित में अपना योगदान करने लगे। इस समय समाचार पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लग गया था। ऐसे में धन्य कुमार ने मुल्तानी मिट्टी को गुथकर उसे पैड बनाया।

इस पर बैगनी स्याही से अंग्रेजी सरकार द्वारा किए जुल्म के पर्चे तैयार कर उसे वितरित करना शुरू किया। वह गोदौलिया स्थित सिनेमा हॉल में पकड़ लिए गए और चार माह की सजा सुनाई गई। जिला जेल में वो नेता जी सुभाष चंद्र बोस के सेनापतियों में से एक देवकी नंदन दीक्षित के संपर्क में आए।

26 जनवरी 1942 को कैदियों के सफेद वर्दी को फाड़कर उस पर जेल के खपरैल, आम के पत्ते से रंग कर तिरंगा बनाया। साथ ही दीवारों पर खपरैल से भारत माता की कलाकृति तैयार की, फिर जेल में आम की पेड़ पर तिरंगा फहरा कर जयकारे लगाने लगे कि अंग्रेजों ने पकड़कर फिर बंद कर दिया। 
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