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वाराणसी: भारत माता मंदिर में प्रयोगशाला और वेधशाला का सपना अधूरा, काशी विद्यापीठ के संस्थापक ने पत्र लिखकर बताई थी मन की पीड़ा

Thu, 10 Feb 2022 11:11 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Thu, 10 Feb 2022 11:11 AM IST
सार

काशी विद्यापीठ के संस्थापक राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने चाहते थे कि भारत माता मंदिर के एक ओर विज्ञान की प्रयोगशाला और उसके ऊपर वेधशाला व दूसरी तरफ पुस्तकालय भवन का निर्माण कराया जाए। रजत जयंती ग्रंथ में छपे राष्ट्ररत्न के पत्र में इस बात का खुलासा किया गया है। 

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dream of laboratory and observatory in Bharat Mata Mandir varanasi is incomplete founder of Kashi Vidyapith wrote letter
भारत माता मंदिर - फोटो : amar ujala

विस्तार

वाराणसी स्थित काशी विद्यापीठ के प्रतिष्ठापरक राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने देशप्रेम की भावना से विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। विद्यापीठ को भव्य स्वरूप देने के लिए उन्होंने ढेर सारे सपने देखे थे, लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सके। 101 साल बाद भी वह स्वप्न अधूरे ही हैं।

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काशी विद्यापीठ के रजत जयंती ग्रंथ में छपे राष्ट्ररत्न के पत्र में इस बात का खुलासा किया गया है। राष्ट्ररत्न ने काशी विद्यापीठ के  अध्यक्ष को लिखे गए अपने त्याग पत्र में कहा था कि वह विद्यापीठ की स्थापना होने के पूर्व वह राय जगन्नाथ दास का सातों चौकवाला मकान खरीदना चाहते थे।
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उस मकान में वह सार्वजनिक पुस्तकालय खोलना चाहते थे। मकान नहीं मिलने के कारण वह विचार मन में ही रह गया। उनकी मंशा थी कि काशी विद्यापीठ में स्थापित होने वाले पुस्तकालय में विद्यार्थियों के साथ-साथ जनसाधारण को भी इसका लाभ मिल सके। उन्होंने लिखा था कि काशी विद्यापीठ के संचालक महोदय मेरी इस इच्छा को पूरी करने में सहायता प्रदान करेंगे।

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पढ़ेंः काशी विद्यापीठ का 101वां स्थापना दिवस आज: वेदमंत्रों और कुरान की आयत के साथ बापू ने रखी थी नींव, तीन बार बदला गया नाम

आगे उन्होंने लिखा कि काशी विद्यापीठ के पास ही और भी जमीन मैंने खरीद रखी है, जिस पर भारत माता मंदिर का निर्माण हो रहा है। मेरी यह इच्छा है कि मंदिर की देखरेख का भार मंदिर बनने के बाद मेरी शर्तों के अनुसार काशी विद्यापीठ करे।

उस जमीन में इतना स्थान है कि मंदिर के एक ओर विज्ञान की प्रयोगशाला और उसके ऊपर वेधशाला व दूसरी तरफ पुस्तकालय भवन का निर्माण कराया जाए। उन्होंने आगे लिखा था कि पत्र लिखने के पीछे मेरी मंशा यही है कि कहीं मेरी यह इच्छाएं मन की मन में न रह जाएं और यह मेरे जीवन काल में कार्यान्वित न हो तो इसका पता भी मेरे पीछे किसी को न हो।

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