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चौसठ्ठी देवी को गुलाल अर्पण से करेंगे धूलिवंदन
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बनारसी फगुआ के सूत्र जटाजूट के आघात से प्रकट चौंसठ योगिनियों के वंदन-अभिनंदन से जुड़े हैं। काशी आज भी पांच सौ साल से चली आ रही परंपरा को निभा रही है और मां चौसठ्ठी देवी को पहला गुलाल अर्पित करके होली उत्सव की धूलिवंदन करती है। रंग फाग के बाद देवी चौसठ्ठी का दरबार जगाया जाता है और दशाश्वमेध तीर्थ के पास स्थित माता के मंदिर में जाकर काशीवासी उनके श्रीचरणों में अबीर-गुलाल अर्पित कर मुक्ति की कामना करते हैं।
श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि अष्टधातु की प्रतिमा के रूप में काल भैरव व एकदंत विनायक के साथ भद्र काली के सम्मुख विराज रही देवी चौसट्ठी ने चूंकि चैत्र कृ ष्ण प्रतिपदा को ही अपनी पीठिका ग्रहण की थी इसलिए लोक मान्यताओं ने धूलिवंदन की इस विशेष तिथि को देवी के अनुरंजन तिथि के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पुराणों और काशी खंड में भी इन चौंसठ योगिनियों की कथा का वर्णन मिलता है। न सिर्फ शहर से बल्कि गांवों से भी धूलिवंदन के लिए होली के दिन गाजे-बाजे के साथ श्रद्धालुओं के जत्थे चौसट्ठी यात्रा के लिए निकलते थे और देवी के दरबार में रौनकों के उत्सवी रंग भरते थे। लोकाचारी मान्यताओं के अनुसार चौसट्ठी देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाए बगैर काशी में रंगोत्सव की पूर्णता ही नहीं मानी जाती है।
शिव की कृपा से पूजित हैं 64 योगिनियां
पौराणिक गाथा के अनुसार काशी के महाप्रतापी राजा दिवोदास ने एक समय काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ के आधिपत्य को चुनौती देते हुए न सिर्फ अपना वर्चस्व बनाया, बल्कि नगरी के शिवतत्व को क्षीण करने का भी प्रयास किया। उसे अपदस्थ करने के लिए भगवान शिव ने कैलाश शिखर से पहले अष्ट भैरवों व छप्पन विनायकों को काशी भेजा जो बाद में यहीं स्थापित हो गए। इसी क्रम में 64 योगिनियों ने भी काशी प्रवास किया व बाबा विश्वनाथ के दोबारा काशी पधारने के बाद उनकी कृपा से यहीं पूजित व प्रतिष्ठित हुईं।
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साधकों को मिलती हैं सिद्धियां
सनातन परंपरा की बात करें तो काशी नगरी सभी मत-मतांतरों की साधना भूमि रही है। इसी क्रम में चौसट्ठी सिद्धपीठ को भी तंत्र पीठ की प्रतिष्ठा प्राप्त है। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी, स्वामी भास्करानंद, देवरहवा बाबा व नारायण दत्त श्रीमाली जैसे हठी साधकों ने यहां सिद्धि प्राप्त की और अपने चमत्कारों से लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
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श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि अष्टधातु की प्रतिमा के रूप में काल भैरव व एकदंत विनायक के साथ भद्र काली के सम्मुख विराज रही देवी चौसट्ठी ने चूंकि चैत्र कृ ष्ण प्रतिपदा को ही अपनी पीठिका ग्रहण की थी इसलिए लोक मान्यताओं ने धूलिवंदन की इस विशेष तिथि को देवी के अनुरंजन तिथि के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। पुराणों और काशी खंड में भी इन चौंसठ योगिनियों की कथा का वर्णन मिलता है। न सिर्फ शहर से बल्कि गांवों से भी धूलिवंदन के लिए होली के दिन गाजे-बाजे के साथ श्रद्धालुओं के जत्थे चौसट्ठी यात्रा के लिए निकलते थे और देवी के दरबार में रौनकों के उत्सवी रंग भरते थे। लोकाचारी मान्यताओं के अनुसार चौसट्ठी देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाए बगैर काशी में रंगोत्सव की पूर्णता ही नहीं मानी जाती है।
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शिव की कृपा से पूजित हैं 64 योगिनियां
पौराणिक गाथा के अनुसार काशी के महाप्रतापी राजा दिवोदास ने एक समय काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ के आधिपत्य को चुनौती देते हुए न सिर्फ अपना वर्चस्व बनाया, बल्कि नगरी के शिवतत्व को क्षीण करने का भी प्रयास किया। उसे अपदस्थ करने के लिए भगवान शिव ने कैलाश शिखर से पहले अष्ट भैरवों व छप्पन विनायकों को काशी भेजा जो बाद में यहीं स्थापित हो गए। इसी क्रम में 64 योगिनियों ने भी काशी प्रवास किया व बाबा विश्वनाथ के दोबारा काशी पधारने के बाद उनकी कृपा से यहीं पूजित व प्रतिष्ठित हुईं।
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साधकों को मिलती हैं सिद्धियां
सनातन परंपरा की बात करें तो काशी नगरी सभी मत-मतांतरों की साधना भूमि रही है। इसी क्रम में चौसट्ठी सिद्धपीठ को भी तंत्र पीठ की प्रतिष्ठा प्राप्त है। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी, स्वामी भास्करानंद, देवरहवा बाबा व नारायण दत्त श्रीमाली जैसे हठी साधकों ने यहां सिद्धि प्राप्त की और अपने चमत्कारों से लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।