फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   BHU, freedom

बीएचयू बना था आजादी का मतवाला

Fri, 12 Aug 2016 02:09 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी Updated Fri, 12 Aug 2016 02:09 AM IST
विज्ञापन
BHU, freedom
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
7-8 अगस्त 1942 की रात। मुंबई में कांग्रेस कमेटी की बैठक में महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद कर दिया था। पराधीनता से कराह रहा देश एकजुट होकर आजादी की खातिर मर-मिटने के लिए तैयार था। एक तरफ गांधीजी का अहिंसावादी रास्ता था तो दसरी तरफ क्रांतिकारियों का एलान-ए-जंग। क्रांति मशाल की आग से बीएचयू भी अछूता नहीं रह सका। बीएचयू के विद्यार्थी कक्षाओं का बहिष्कार कर सड़कों पर आ गए थे और आजादी मांग रहे थे।
विज्ञापन


ऐसे माहौल में नौजवान हो चले बीएचयू का लहू भी खौल रहा था। हॉस्टल में विद्यार्थियों के मन में आजादी को लेकर जोश-जुनून चरम पर था। विश्वविद्यालय के गेट पर धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया था। 9 अगस्त की रात बीएचयू के प्रो. यूए असरानी को गिरफ्तार कर लिया गया। दो दिन बाद 10 अगस्त को स्टाफ और विद्यार्थियों की बैठक बुलाई गई, जिसमें आजादी के आंदोलन पर खुली चर्चा हुई। उस वक्त कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे। नौजवानों को सलाह दी गई कि हिंसा से दूर रहें, शांति बनाए रखें लेकिन हर तरफ हिंसा, उपद्रव की आंच जब बनारस पहुंची तो बीएचयू को भी एक महीने के लिए बंद करना पड़ा।
विज्ञापन


मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र की रिसर्च अधिकारी डॉ. ऊषा त्रिपाठी बताती हैं कि 12 अगस्त की दोपहर का ही वह दिन था। मालवीय जी ने विद्यार्थियों से सवाल किया, ‘क्या आप गांधीजी की शिक्षा में विश्वास करते हैं’? शंखनाद सा हुआ और आवाज आई ‘हां’। उस शंखनाद में खौलते लहू की तपिश महामना ने भांप ली। समझाया, स्टेशन, बस अड्डों और बाजारों में तोड़फोड़ से आजादी नहीं मिलेगी लेकिन विद्यार्थियों को शांत रखना असंभव लगा इसलिए एक महीने के लिए बीएचयू बंद कर दिया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


बावजूद इसके 300 विद्यार्थी छात्रावास में बने रहे। प्रो. राधेश्याम शर्मा व डॉ. केएन गैरोला विश्वविद्यालय में गुप्त रूप से विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते रहे लेकिन अचानक 19 अगस्त को सुबह पांच बजे मुख्य द्वार का ताला तोड़कर अंग्रेज बीएचयू में प्रवेश कर गए। हॉस्टल से छात्रों को जबरन बाहर निकाला गया और सैनिकों ने वहां कब्जा कर लिया। दो महीने तक बीएचयू में अंग्रेजों के बूटों की आवाज गूंजती रही। यहां सैनिक अस्पताल बनाए जाने की बात कही जाने लगी लेकिन तत्कालीन कुलपति राधाकृष्णन के प्रयासों से 26 अक्तूबर को सरकार ने सेना और पुलिस को बीएचयू से हटा लिया।


‘बाबूजी, हमने सीने पर खाई हैं गोलियां’
आजादी की फिजा में सांस लेने की चाहत रखने वाले बीएचयू के छात्रों ने 13 अगस्त, 1942 को शस्त्रागार के दफ्तार पर छापा मारने की कोशिश की थी। इसी दौरान बीएचयू के छात्रों ने जुलूस भी निकाला था। जुलूस चौक के लिए कूच कर रहा था कि हरिश्चंद्र घाट की त्रिमुहानी पर पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। 25-26 विद्यार्थियों को छर्रे लगे। उस वक्त महामना मुंबई में थे। फौरन बनारस पहुंचे। अस्पताल में भर्ती छात्रों को देखने पहुंचे। विद्यार्थियों ने महामना से कहा, ‘बाबूजी, हमने गोलियां पीठ पर नहीं सीने पर खाई हैं, तनिक भी चिंतित न होइए’। इस पर महामना की आंखें भर आई थीं और उन्होंने उन्हें गले लगा लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed