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बस धूल फांकने के लिए ही आई हैं अल्ट्रासाउंड मशीनें, चालू कब होंगी...?

Mon, 05 Sep 2022 10:06 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 05 Sep 2022 10:06 PM IST
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Ultrasound machines have come just to clear the dust, when will they start...?
सोनभद्र। अति पिछड़े जिले के मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की सारी कोशिशें बस कागजों पर ही चल रही हैं। करोड़ों खर्च कर भवन बने हैं तो उपकरण नहीं है और जहां उपकरण हैं, वहां उसे चलाने वाले नहीं। अल्ट्रासाउंड सेवा का भी ऐसा ही हाल है। महीनों पहले जिले की चार सीएचसी पर महंगी अल्ट्रासाउंड मशीनें भेजी गई थीं। सभी मशीनें सिर्फ धूल फांक रही हैं। किसी भी सीएचसी पर अब तक इसे इंस्टाल नहीं किया जा सका है और न ही किसी ऑपरेटर की तैनाती हुई है। ऐसे में ग्रामीणों को निजी केंद्रों की महंगी सेवाओं की शरण लेनी पड़ रही है। भौगोलिक क्षेत्रफल के लिहाज से प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला होने के कारण दूरदराज के इलाकों से जिला अस्पताल तक पहुंचने में 120-150 किमी तक की दूरी तय करनी पड़ती है। लिहाजा सीएचसी स्तर पर ही बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने की कोशिश जारी है। इसी के तहत जिले के चोपन, म्योरपुर, घोरावल सीएचसी और डिबुलगंज संयुक्त अस्पताल पर नई अल्ट्रासाउंड मशीन मंगाई गई थी। सीएचसी स्तर पर मशीनें होने से गर्भवती महिला व अन्य गंभीर मरीजों की जांच में सहूलियत होने का दावा किया गया था। निजी केंद्रों पर महंगी सेवाओं से आजिज लोग भी इस सुविधा से उत्साहित हुए। महीनों बाद भी यह मशीनें चालू नहीं हो पाई हैं। कुछ केंद्रों पर तो इसे इंस्टाल भी नहीं किया गया है। केंद्रों पर मशीन चलाने वाले किसी ऑपरेटर या रेडियोलाजिस्ट की तैनाती भी नहीं है। नतीजा महंगी मशीनें धूल फांक रही हैं और मरीज निजी केंद्रों में जेब ढीली कर रहे हैं। सीएचसी म्योरपुर में आठ माह पूर्व अल्ट्रासाउंड की मशीन मिली है। इसे इंस्टाल तो किया गया मगर चलाने के लिए ऑपरेटर व डॉक्टर नहीं मिले। सीएचसी घोरावल में मशीन मिलने के चार महीने वाद भी इंस्टाल नहीं हो सकी। अब इसमें तकनीकी दिक्कत बताते हुए वापस भेजने की बात कही जा रही है। चोपन सीएचसी में भी अल्ट्रासाउंड मशीन शोपीस बनी हुई है। संयुक्त चिकित्सालय डिबुलगंज में मशीन इंस्टाल तो हुआ चालू नहीं हो पाया है। यह वह क्षेत्र हैं, जहां दुर्गम व आदिवासी बहुल क्षेत्र के मरीज पहुंचते हैं। जच्चा-बच्चा के मौत की सर्वाधिक घटनाएं भी इन्हीं क्षेत्रों में है। बावजूद जिम्मेदार बेपरवाह हैं।
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