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Sonebhadra News: अपनी ही धरोहरों को नहीं संजो पा रहा पुरातत्व विभाग
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घोरावल। पुरातत्विक धरोहरों के संरक्षण के लिए दूसरों को जागरुक करने में जुटा पुरातत्व विभाग खुद अपनी धरोहर की सुरक्षा नहीं कर पा रहा। घोरावल के आमडीह में बना राजकीय संग्रहालय बदहाल है। भवन जर्जर हो चुका है। जगह-जगह दरारें पड़ चुकी हैं। बाउंड्री का एक हिस्सा ढह चुका है। यहां रखी धरोहरें नष्ट हो रही हैं, मगर उसका कोई पुरसाहाल नहीं है।
शिवद्वार और आस पास के इलाकों में दुर्लभ कलाकृतियों एवं मूर्तियों का भंडार विद्यमान है। ये कलाकृतियां शिवद्वार, सतद्वारी, बर कन्हरा और आसपास के गांवों व सोढ़रीगढ़ किला में बिखरी थीं। आदिम सभ्यता के साक्षी इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए शिवद्वार से सटे आमडीह गांव में 18 जून 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने राजकीय स्थलीय संग्रहालय का शिलान्यास किया था।
11वें वित्त आयोग की योजना से उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय लखनऊ के जरिए निर्मित इस संग्रहालय का लोकार्पण मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन संस्कृति मंत्री सुभाष पांडे ने 3 सितंबर 2009 को किया था। यहां बड़ी संख्या में प्राचीन एवं मध्यकाल के ऐतिहासिक महत्व की खंडित-अखंडित दुर्लभ प्रतिमाओं व अन्य कलाकृतियों का संग्रह है।
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इनमें शिव, दुर्गा, यक्ष, यक्षिणियों, तंत्र मंत्र से संबंधित, धार्मिक चिह्न आदि शामिल हैं। मूर्तियों को देखने से स्वतः ही स्पष्ट होता है कि सैकड़ों वर्ष पहले सोनभद्र जनपद का शिवद्वार क्षेत्र मूर्तिकला एवं शिल्पकला के क्षेत्र में कितना विकसित रहा है। शुभारंभ होने के बाद कुछ समय तक सही तरीके से संचालित हुआ, लेकिन इधर कई वर्षों से यह दुर्व्यवस्था का शिकार है। यहां पहले दो सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन इस समय यहां कोई नहीं आता। अक्सर ताला लटकता रहता है।
शुभारंभ के बाद से ही संग्रहालय उपेक्षा का शिकार है। अगर इस संग्रहालय को सही तरीके से संचालित किया जाए तो बड़ी संख्या में पर्यटक इसे देखकर हमारे ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में जान सकते हैं। इतिहास व पुरातत्व विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है। -रमाकांत दुबे, रहवासी।
यह संग्रहालय ग्राम पंचायत की आय का एक प्रमुख श्रोत हो सकता है, लेकिन उद्घाटन के बाद से ही विभाग इसकी कोई सुध नहीं ले रहा। उम्मीद थी कि यहां प्राचीन धरोहरों का संरक्षण होगा, मगर अभी तो संग्रहालय को खुद संरक्षण की जरूरत है। यहां शोध कार्य किया जाए तो इतिहास के तमाम नए रहस्य सामने आ सकते हैं। -शिवप्रसाद बैसवार।
हाल ही में यहां का कार्यभार मिला है। जल्द ही मौके पर पहुंचकर संग्रहालय का निरीक्षण करते हुए सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रबंध कराया जाएगा। संग्रहालय की बेहतरी के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। - डॉ. रामनरेश पाल, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, वाराणसी।
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शिवद्वार और आस पास के इलाकों में दुर्लभ कलाकृतियों एवं मूर्तियों का भंडार विद्यमान है। ये कलाकृतियां शिवद्वार, सतद्वारी, बर कन्हरा और आसपास के गांवों व सोढ़रीगढ़ किला में बिखरी थीं। आदिम सभ्यता के साक्षी इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए शिवद्वार से सटे आमडीह गांव में 18 जून 2005 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने राजकीय स्थलीय संग्रहालय का शिलान्यास किया था।
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11वें वित्त आयोग की योजना से उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय लखनऊ के जरिए निर्मित इस संग्रहालय का लोकार्पण मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन संस्कृति मंत्री सुभाष पांडे ने 3 सितंबर 2009 को किया था। यहां बड़ी संख्या में प्राचीन एवं मध्यकाल के ऐतिहासिक महत्व की खंडित-अखंडित दुर्लभ प्रतिमाओं व अन्य कलाकृतियों का संग्रह है।
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इनमें शिव, दुर्गा, यक्ष, यक्षिणियों, तंत्र मंत्र से संबंधित, धार्मिक चिह्न आदि शामिल हैं। मूर्तियों को देखने से स्वतः ही स्पष्ट होता है कि सैकड़ों वर्ष पहले सोनभद्र जनपद का शिवद्वार क्षेत्र मूर्तिकला एवं शिल्पकला के क्षेत्र में कितना विकसित रहा है। शुभारंभ होने के बाद कुछ समय तक सही तरीके से संचालित हुआ, लेकिन इधर कई वर्षों से यह दुर्व्यवस्था का शिकार है। यहां पहले दो सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन इस समय यहां कोई नहीं आता। अक्सर ताला लटकता रहता है।
शुभारंभ के बाद से ही संग्रहालय उपेक्षा का शिकार है। अगर इस संग्रहालय को सही तरीके से संचालित किया जाए तो बड़ी संख्या में पर्यटक इसे देखकर हमारे ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में जान सकते हैं। इतिहास व पुरातत्व विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है। -रमाकांत दुबे, रहवासी।
यह संग्रहालय ग्राम पंचायत की आय का एक प्रमुख श्रोत हो सकता है, लेकिन उद्घाटन के बाद से ही विभाग इसकी कोई सुध नहीं ले रहा। उम्मीद थी कि यहां प्राचीन धरोहरों का संरक्षण होगा, मगर अभी तो संग्रहालय को खुद संरक्षण की जरूरत है। यहां शोध कार्य किया जाए तो इतिहास के तमाम नए रहस्य सामने आ सकते हैं। -शिवप्रसाद बैसवार।
हाल ही में यहां का कार्यभार मिला है। जल्द ही मौके पर पहुंचकर संग्रहालय का निरीक्षण करते हुए सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रबंध कराया जाएगा। संग्रहालय की बेहतरी के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। - डॉ. रामनरेश पाल, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, वाराणसी।