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स्वतंत्रता दिवस: जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया वे गुमनाम हुए, संजो कर रखे हैं अंग्रेज अफसरों के नाम

Thu, 15 Aug 2024 04:14 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र।
अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 15 Aug 2024 04:14 PM IST
सार

Independence Day 2024: सोनभद्र के जिला मुख्यालय को अग्रेज अफसर डब्ल्यूबी रॉबर्ट्स ने बसाया था। भारत की आजादी में अपनी जान न्योछावर करने वाले शहीदों के नाम पर इस जिले में कोई मोहल्ला नहीं है। मिर्जापुर की बात करें तो अंग्रेज कलेक्टर पी. विल्ढम के नाम से बसा हुआ है। देश की आजादी के अवसर पर ऐसी ही जानकारियों के लिए पढ़ें अमर उजाला की ये खास रिपोर्ट...

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Special on Independence Day sacrificed for country names of British officers are preserved
आदर्श कोतवाली रॉबर्ट्सगंज। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया, जिन्होंने लहू ने सींचा था चिरागे वतन, जगमगा रहे हैं मकबरे उनके, बेचा करते थे जो शहीदों के कफ़न... सोनांचल के वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से जुड़े स्थलों की स्थिति पर ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। 

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स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले सेनानियों के नाम पर यहां कोई मोहल्ला भी नहीं, जबकि अंग्रेज अधिकारियों के नाम पर नगर और बड़े कस्बे आबाद हैं। 
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विडंबना है कि आजादी के 75 वर्षों बाद भी हम उसी पहचान को ओढ़े हुए हैं। गुलामी की इन निशानियों को मिटाने के लिए कभी कोई आवाज़ भी नहीं उठती। सोनभद्र का जिला मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज में है। अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यूबी रॉबर्ट्स ने इसे बसाया था। तब देश पर अंग्रेजी हुकूमत थी। लिहाज़ा, इसका नामकरण उसी अधिकारी के नाम पर हो गया था। 
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आजादी के बाद भी वही नाम क़ायम है। इसी नाम से तहसील है और कोतवाली भी। लोकसभा और विधानसभा की सीट का भी यही नाम है। पहले इसी नाम से नगर पालिका और रेलवे स्टेशन भी था। काफ़ी जद्दोजहद के बाद नगर पालिका और स्टेशन के रिकॉर्ड में नाम बदल पाया, लेकिन अन्य अभिलेखों में आज भी रॉबर्ट्सगंज ही क़ायम है। 

कुछ ऐसा है इतिहास
बनारस या कहीं अन्य से बस चलती है तो वह भले ही सोनभद्र डिपो में रुकती है, मगर टिकट रॉबर्ट्सगंज का ही बनता है। बिजली निगम का डिवीजन भी रॉबर्ट्सगंज के नाम से है। इसी नाम से महिला थाना भी। ऐसे ही एक अन्य कस्बा है विंढमगंज। 

झारखंड सीमा पर स्थित इस कस्बे का नामकरण भी मिर्जापुर के तत्कालीन कलेक्टर पी. बिल्ढम के नाम पर है। बुजुर्ग कहते हैं कि क्षेत्र के भ्रमण पर आए अंग्रेज अधिकारी बिल्ढम ने ही अपने नाम पर इस कस्बे को बसाया था। वैसे सरकारी अभिलेखों में यह बुटबेढ़वा ग्राम पंचायत का हिस्सा है, लेकिन आम चलन में लोग इसे विंढमगंज के रूप में ही जानते हैं। 

इसी नाम से चोपन-गढ़वा रूट पर रेलवे स्टेशन भी है। एक अन्य कस्बा म्योरपुर भी कैप्टन म्योर के नाम पर है। तापीय परियोजनाएं और कोयले की खदानें समेत प्रचूर खनिज संपदा इसी क्षेत्र में है। गाहे-बगाहे बाहर से आने वाले लोग जब इन कस्बों के नाम की चर्चा करते हैं तो आजादी पर इतराने वाले लोग भी गुलामी की पहचान के कारण झेंप जाते हैं।

1854 में बसा था राबर्ट्सगंज
विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक एवं इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी मिर्जापुर गजेटियर का उल्लेख करते हैं।वे कहते हैं, वर्ष 1846 के पहले मिर्जापुर का कुसाचा तहसील शाहगंज में संचालित था। बरसात में यह क्षेत्र बेलन नदी के उफनाने से जलमग्न हो जाता था। तब नदी पर पुल भी नहीं था। लिहाजा, मिर्जापुर से उसका संपर्क कट जाता था। 

राजस्व वसूली और प्रशासनिक कार्यों में दिक्कत होती थी। अदालगंज के मुखिया भूरा लाल ने मिर्जापुर के कलेक्टर को पत्र लिखकर स्थानीय समस्याओं से अवगत कराते हुए तहसील को दूसरी जगह स्थानांतरित करने का सुझाव दिया। 

कलेक्टर ने उस पत्र पर कार्रवाई करते हुए मिर्जापुर के डिप्टी कलेक्टर डब्ल्यू बी रॉबर्ट को नई तहसील की स्थापना के लिए भूमि सर्वे के लिए भेजा। सर्वे के बाद उन्होंने ऐसी भूमि का चयन किया जो कछुए की आकार का था और बरसात का पानी चारों तरफ से निकल जाता। यहीं पर मेन चौक के पास रॉबर्ट्सगंज कस्बे की स्थापना हुई। बाद में शाहगंज में स्थित कुसाचा तहसील को यहां स्थानांतरित किया और 1854 में इसका का नाम डब्ल्यू बी रॉबर्ट के नाम पर रॉबर्ट्सगंज हो गया।

प्रवास करने आए और अपने नाम पर बसा दिया कस्बा
वर्ष 1901 में पी बिल्ढम मिर्जापुर के कलेक्टर बनकर आए। दुद्धी क्षेत्र के स्थानीय समस्याओं के निदान, आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने का काम शुरू किया। दुद्धी क्षेत्र की गतिविधियों पर अध्ययन किया। यहां की गरीबी, लाचारी, बेबसी, आदिवासियों की दशा देखकर उन्हें निशुल्क राशन, मिट्टी का तेल, कपड़ा आदि का वितरण कराया और संचालित पाठशाला का निरीक्षण किया। 

वर्ष 1905 में दोबारा इस क्षेत्र में आए और सड़कों आदि का निर्माण करने का वादा किया। मूड़ी सेमर के पास जहां उन्होंने प्रवास किया, वहीं अपने नाम पर बिल्ढमगंज बसा दिया, जो बाद में विंढमगंज हो गया।

लेफ्टिनेंट गर्वनर थे डब्ल्यू म्योर
वर्ष 1870-71 में संयुक्त प्रांत आगरा-अवध के लेफ्टिनेंट गवर्नर मिस्टर डब्ल्यू म्योर दुद्धी के प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार एवं भूमि समस्याओं के निदान के लिए आए। कुछ दिन रह कर यहां के लोगों से संवाद स्थापित कर यहां की स्थानीय समस्याओं को जाना। जहां पर वह रुके, उस स्थान पर एक गांव बसाया जो उनके नाम पर म्योरपुर के रूप में कस्बा और अब ब्लाक, थाना समेत प्रमुख क्षेत्र बन गया है।

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