{"_id":"5f1c29508ebc3e74a90b73d8","slug":"demand-for-cancellation-of-proposal-of-privatization-of-purvanchal-vidyut-vitran-nigam-sonbhadra-news-vns5377718173","type":"story","status":"publish","title_hn":"पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का प्रस्ताव रद्द करने की मांग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का प्रस्ताव रद्द करने की मांग
विज्ञापन
अनपरा। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का प्रस्ताव रद्द किया जाए। ऊर्जा निगमों के बिजली कर्मचारियों, जूनियर इंजीनियरों व अभियंताओं को विश्वास में लेकर बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण में चल रहे सुधार के कार्यक्रम सार्वजनिक क्षेत्र में ही जारी रखे जाएं। इससे आम जनता को सस्ती और गुणवत्ता परक बिजली मिल सकेगी।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति पदाधिकारियों, प्रांतीय संयोजक शैलेंद्र दुबे, प्रभात सिंह, जीवी पटेल, अनपरा संयोजक रोहित राय आदि ने कहा कि पांच अप्रैल 2018 को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की उपस्थिति में पॉवर कॉर्पोरेशन प्रबंधन ने संघर्ष समिति से समझौता किया है कि प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र में कोई निजीकरण नहीं किया जाएगा। ऐसे में अब निजीकरण की बात करना समझौते का खुला उल्लंघन है। संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा निगमों में कहीं भी निजीकरण करने की कोशिश हुई तो इसका प्रबल विरोध होगा और बिजली कर्मी आंदोलन करने को बाध्य होंगे। उन्होंने कहा कि नौकरशाही के दबाव में किया गया बिजली बोर्ड का विघटन और निगमीकरण पूरी तरह विफल रहा है। वर्ष 2000 में बिजली बोर्ड के विघटन के समय मात्र 77 करोड़ रुपये का सालाना घाटा था, जो अब 95000 करोड़ रूपये से अधिक हो गया है। इसके बावजूद निगमीकरण पर पुनर्विचार करने के बजाए प्रबंधन निजीकरण का प्रस्ताव देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहता है जिससे बिजली कर्मियों में भारी रोष है।
विज्ञापन
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति पदाधिकारियों, प्रांतीय संयोजक शैलेंद्र दुबे, प्रभात सिंह, जीवी पटेल, अनपरा संयोजक रोहित राय आदि ने कहा कि पांच अप्रैल 2018 को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की उपस्थिति में पॉवर कॉर्पोरेशन प्रबंधन ने संघर्ष समिति से समझौता किया है कि प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र में कोई निजीकरण नहीं किया जाएगा। ऐसे में अब निजीकरण की बात करना समझौते का खुला उल्लंघन है। संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि ऊर्जा निगमों में कहीं भी निजीकरण करने की कोशिश हुई तो इसका प्रबल विरोध होगा और बिजली कर्मी आंदोलन करने को बाध्य होंगे। उन्होंने कहा कि नौकरशाही के दबाव में किया गया बिजली बोर्ड का विघटन और निगमीकरण पूरी तरह विफल रहा है। वर्ष 2000 में बिजली बोर्ड के विघटन के समय मात्र 77 करोड़ रुपये का सालाना घाटा था, जो अब 95000 करोड़ रूपये से अधिक हो गया है। इसके बावजूद निगमीकरण पर पुनर्विचार करने के बजाए प्रबंधन निजीकरण का प्रस्ताव देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना चाहता है जिससे बिजली कर्मियों में भारी रोष है।
विज्ञापन