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नगर व सिधौली विधायक ने सपा का थामा दामन

Sun, 31 Oct 2021 12:33 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 31 Oct 2021 12:33 AM IST
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Nagar and Sidhauli MLA joined SP
सीतापुर। आखिरकार जिस बात की चर्चाएं सियासी गलियारों में काफी वक्त से चल रहीं थीं, उस पर शनिवार को मुहर लग गई। सीतापुर नगर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक राकेश राठौर और बसपा के टिकट से सिधौली सीट से विधानसभा चुनाव जीतने वाले विधायक डॉ. हरगोविंद भार्गव ने शनिवार को सपा का दामन थामकर धीरे से जोर का झटका दिया है। हालांकि, लंबे समय से इसकी सुगबुगाहट चल रही थी।
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विधायकों के साइकिल पर सवार होने के बाद राजनीतिक चश्मे से देखें तो दोनों सीटों पर अब नए सिरे से पार्टियों को समीकरण बनाने पड़ेंगे। इसको लेकर पार्टियों में अंदर ही अंदर मंथन का दौर शुरू हो गया है। विधानसभा का चुनाव करीब है। ऐसे में सियासत की नई स्क्रिप्ट लिखने की तैयारी शुरू हो गई है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि दोनों विधायकों का पाला बदलने का यह नया दांव क्या गुल खिलाता है।
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राजनीतिक पंडितों की माने तो चुनावी मौसम में मौजूदा विधायकों के सपा में जाने से पार्टी को मजबूती तो मिलेगी, लेकिन यह कितना असरदार साबित होगी, यह कहना अभी जल्दबाजी है।
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दीपावली से पहले चर्चाओं की फुलझड़ी
दीपावली चार नवंबर को है। लोग फुलझड़ी जलाकर रोशनी के पर्व को मनाएंगे, लेकिन शनिवार को दोनों विधायकों के सपा में शामिल होने के बाद फिलहाल सियासी गलियारों में चर्चाओं की फुलझड़ी तेज हो गई है। हर कोई अपने-अपने तरीके से गुणा-गणित लगा रहा है।
दिल से तो 12 सितंबर को ही जुड़ गए थे
विधायक राकेश राठौर ने भले ही शनिवार को सपा ज्वाइन की हो, लेकिन देखा जाए तो 12 सितंबर को लखनऊ में राकेश राठौर और अखिलेश यादव की हुई मुलाकात के बाद ही उनके पार्टी में जाने की अटकलें शुरू हो गई थीं। तब विधायक राकेश ने कहा था कि वह सामान्य मुलाकात थी। अब सपा में शामिल होने के बाद अटकलें सच साबित हुईं।
कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी के हो गए थे खिलाफ
विधायक बनने के बाद से ही राकेश राठौर मुखर हो गए थे। इसकी बड़ी वजह भाजपा सरकार की नीतियां और व्यवस्थाएं उन्हें रास न आना रहीं। इसी वजह से वह मुखालफत करने लगे थे। शुरुआती दौर की बात है, जब जिले के तत्कालीन एसपी मृगेंद्र सिंह थे, उस समय एक कार्यकर्ता की बाइक विधायक के कहने पर दरोगा ने नहीं छोड़ी थी तो वे विरोध में आ गए थे। नवीन गल्ला मंडी के पास ठेले वाले के साथ घटना को लेकर मंडी चौकी का कार्यकर्ताओं के साथ घेराव कर नाराजगी जाहिर की थी। इसी के बाद से उन्होंने धीरे-धीरे पार्टी से किनारा कर लिया था।
रास नहीं आ रहीं थी सरकार की नीतियां
कार्यकर्ताओं के खातिर स्थानीय प्रशासन के खिलाफ खड़े होने वाले विधायक राकेश राठौर को सरकार की नीतियां रास नहीं आने पर मोदी और योगी को लेकर भी निशाना साधा था, फिर बात चाहे कोरोना काल में प्रधानमंत्री के ताली-थाली बजाओ संदेश को लेकर टिप्पणी करना हो या फिर लखनऊ से आई एक कॉल पर विकास संबंधी सवाल को लेकर लखनऊ में गड्ढे नहीं दिखने की बात हो।
यही नहीं शोपीस बने ट्रॉमा सेंटर पर बोलने से राजद्रोह लगने बात हो। इन सब बातों के ऑडियो, वीडियो वायरल हो चुके हैं, जो यह साफ संकेत दे रहे थे कि सरकार का सिस्टम विधायक को रास नहीं आ रहा था।
सपा के मजबूत गढ़ में लगाई थी सेंध
2017 विधानसभा चुनाव से पहले नगर विधानसभा सपा की मजबूत सीट रही है। राधेश्याम जायसवाल लगातार चार बार नगर विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं, लेकिन 2017 के चुनाव में मोदी लहर में राधेश्याम अपनी सीट बचाने में कामयाब नहीं हुए। 20 साल बाद इस सीट पर फिर से कमल खिलाने का काम राकेश राठौर ने किया।
वह जीते भले ही मोदी लहर में हो, लेकिन कहीं न कहीं श्रेय तो उन्हें जाता ही है। सपा के कद्दावर मजबूत नेता राधेश्याम जायसवाल से सीट छीनकर 20 साल का वनवास काटने वाली भाजपा की झोली में डालने वाले राकेश राठौर को पार्टी से मलाल हुआ तो उन्होंने किनारा कर लिया।
...तो राधेश्याम और मनीष बदल सकते हैं पाला
विधायक राकेश राठौर और हरगोविंद भार्गव के सपा में शामिल होने के बाद सियासी गलियारों में चर्चाएं यह भी तेज हो गई हैं कि सपा के पूर्व विधायक राधेश्याम और सिधौली से सपा के पूर्व विधायक मनीष रावत अपना नया ठिकाना तलाश सकते हैं। इसके लिए वह पाला बदलने का कदम उठा सकते हैं। राजनीतिक घटनाक्रम में हुए बदलाव के बाद ऐसे कयास तेजी से लगाए जा रहे हैं। हर किसी की जुबां पर ऐसी बातें हैं।

...तो रोमांचक होगा मुकाबला
लगातार चार बार सपा की झोली में सीट डालने वाले नेता अगर पाला बदलेंगे तो नगर विधानसभा सीट पर मुकाबला रोमांचक होगा। एक तरह से कहें तो वह पुराने भाजपाई भी माने जाते हैं। वजह, 1995 में वह नगर पालिका के अध्यक्ष भी भाजपा के टिकट पर ही बने थे। टिकट दिलाने में उनके राजनीतिक गुरू का अहम योगदान रहा। हालांकि, बाद में लगातार पांच बार विधायक रहने वाले अपने गुरू के ही खिलाफ आमने-सामने चुनावी जंग लड़कर उन्हें हरा दिया था और सपा की झोली में यह सीट डाल दी थी।
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