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मालिक से बगावत कर ‘वफादारों’ ने ठोंकी ताल

Mon, 08 Mar 2021 12:14 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 08 Mar 2021 12:14 AM IST
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'Faithfuls' beat their back by rebelling against the boss
सिधौली तहसील की ग्राम पंचायत गोधना में पिछले कई पंच वर्षीय से सीट सामान्य ओबीसी थी, लेकिन इस बार आरक्षण की वजह से सीट एससी हो गई। अब यहां के पूर्व प्रधान अपने नौकर को लड़ाना चाहते थे, लेकिन एससी सीट होते ही 17 सालों से साथ रहने वाला नौकर बागी हो गया। उसने उनका साथ छोड़ दिया और खुद प्रधानी का चुनाव लड़ने की तैयारी में तेजी से जुट गया है।
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ग्राम पंचायत टिकौली में पिछले कई सालों से सामान्य और ओबीसी सीट थी, लेकिन इस बार सीट एससी हो गई है। ऐसे में पूर्व प्रधान ने नौकर को लड़ाने की प्लानिंग की थी, पर सीट बदलते ही नौकर ही बदल गया। 24 घंटे आगे-पीछे लगा रहने वाले व्यक्ति की अब परछाई नहीं मिल रही है। दरवाजे पर चौकीदारी करने वाला व्यक्ति अब झांकने तक नहीं आ रहा है। बताते हैं कि उसने रास्ता ही बदल दिया है। खुद प्रधानी लड़ने के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया है।
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सीतापुर। कहते हैं राजनीति में सब संभव है...। गंवई सियासत भी कुछ इसी डगर पर चल पड़ी है। लंबे समय से मालिक के इशारे पर अपनी जान की परवाह नहीं करने वाले वफादार नौकर भी अब सत्ता के लिए बागी होते दिख रहे हैं। सुनकर चौंकना लाजिमी है, पर हकीकत यही है। जिले में पंचायत चुनाव के आरक्षण के बाद सीटों में फेरबदल से गंवई सियासत का रुख एकदम बदल सा गया है। नौकरों ने भरोसा तोड़कर खुद चुनावी मैदान फतह करने का ऐलान कर दिया है, ऐसे में मालिक मझधार में फंस गए हैं। अब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।
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गांव की सरकार पर लंबे समय से हुकूमत करने वाले कई दिग्गज प्रधानों को इस बार भी पूरा यकीन था कि सीट उनके मन माफिक ही आने वाली है। इसलिए वह गांव की सत्ता पर फिर से काबिज होने के सियासी जमीन तैयार कर रहे थे। उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि इस बार का आरक्षण उनकी राजनीति की फसल का सफाया कर देगी। सोचा भले ही न हो, लेकिन हुआ ठीक वही।
शासन ने पहले से ही इस बार 1995 से लेकर 2015 तक के पंचायत चुनाव की समीक्षा करने के बाद तय किया था कि जो गांव कभी एससी, ओबीसी नहीं हुए, उन्हें जनसंख्या के आधार पर उस सीट के लिए आरक्षित किए जाने का संकेेत मिलने लगे थे। ऐसे में कई दावेदार बेचैन हो गए थे, लेकिन बेचैनी उनकी बढ़ी थी, जिनके पास सीटों के बदलने के बाद आरक्षण का कोई विकल्प नहीं था, पर वे पूर्व प्रधान (मौजूदा दावेदार) बेफिक्र थे, जिनके पास आरक्षण का विकल्प था।
उन्होंने प्लानिंग कर ली थी कि अगर सीटों में उलटफेर होता है तो वह अपने घर में दशकों से काम करने वाले नौकर पर ही आरक्षण का दांव लगा देंगे। सियासी जमीन तो पहले से ही तैयार है। नौकर को आगे लाकर चुनाव जीत लेंगे और फिर पांच साल गांव की सत्ता पर राज करेंगे, लेकिन जिले कई दावेदारों के ये ख्वाब अधूरे ही रह गए। उनके मंसूबों पर करीबी, घर-परिवार की तरह रिश्ता रखने वाले नौकर ने ही पानी फेर दिया।
मसलन, मालिक के भरोसे को तोड़कर नौकर ने उन्हें मझधार में छोड़ दिया। मालिक से बगावत कर खुद प्रधान बनने का ख्वाब लेकर चुनावी मैदान में ताल ठोंक दी है। ऐसे में कई संभावित दावेदार अब सिर पकड़कर बैठ गए हैं। उन्हें अब आगे का कोई रास्ता नहीं दिख कर रहा है। यही वजह है कि चुनाव दिलचस्प होता दिख रहा है। खुलकर नहीं, अंदर ही अंदर गांव के लोगों में चर्चाएं आम हैं।

मालिक के ही दांव-पेंच से चुनाव जीतने की तैयारी
जानकारों की माने तो मालिक का दामन छोड़कर खुद चुनाव जीतने के लिए सियासी पिच पर उतरने वाले नौकर मालिक के ही फार्मूले पर चल पड़े हैं। लंबे समय तक उनके साथ में रहने की वजह से सारे दांव-पेंच भी उन्हें आ गए हैं। मालिकों के पास बैठकर ही उन्होंने प्रधानी की एबीसीडी सीख ली है। अब वही दांव और फार्मूला अख्तियार कर वह अपने मालिक को ही सियासी पिच पर बोल्ड करने की जुगत में बिसात बिछाने में लग गए हैं।
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