फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Siddharthnagar News ›   Trauma center is incomplete... immediate treatment is not available, life is in danger as soon as referral is made.

Siddharthnagar News: ट्रॉमा सेंटर अधूरा... नहीं मिलता तत्काल इलाज, रेफर होते ही खतरे में पड़ जाती जान

Fri, 27 Sep 2024 04:15 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Fri, 27 Sep 2024 04:15 PM IST
विज्ञापन
Trauma center is incomplete... immediate treatment is not available, life is in danger as soon as referral is made.
- रोजाना रेफर होते हैं दुर्घटना, हार्ट अटैक और लकवा के सात से आठ मरीज
विज्ञापन

- निजी एंबुलेंस संचालक वसूलते हैं मनमाना किराया, अधिकतर सरकारी एंबुलेंस बदहाल
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में ट्रॉमा सेंटर शुरू न होने से हादसे में गंभीर रूप से घायल, हार्ट अटैक और लकवा के शिकार लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में गोरखपुर रेफर किए जाने के बाद खतरा और बढ़ जाता है। तत्काल इलाज की जरूरत वाले इन मरीजों को जान जोखिम में डालकर तीन घंटे का सफर करना पड़ता है, वजह यह कि सरकारी एंबुलेंस बदहाल हैं तो निजी एंबुलेंस अप्रशिक्षित कर्मचारियों के भरोसे हैं।
सिद्धार्थनगर में ट्राॅमा सेंटर तो बना, लेकिन अभी इलाज की सुविधा नहीं शुरू हो सकी है। इसलिए तत्काल इलाज की जरूरत वाले मरीजों को रेफर करना पड़ता है। रोजाना सात से आठ मरीज रेफर किए जाते हैं। इलाज के लिए यहां से गोरखपुर रेफर किए जाने के बाद मरीजों की जान और ज्यादा सांसत में पड़ जाती है। आर्थिक चपत तो लगती ही है, जान का जोखिम उठाने के साथ मरीजों के साथ परिजनों को मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ती है। निजी एंबुलेंस संचालक गोरखपुर के लिए 4500-5500 रुपये वसूलते हैं। एंबुलेंस में भी ऑक्सीजन सिलिंडर के अलावा कोई अन्य चिकित्सा सुविधा नहीं होती। रास्ते में अगर मरीज की हालत बिगड़ जाए जो तात्कालिक इलाज भी नहीं मिल सकता क्योंकि चालक और उसके सहायक के अलावा कोई प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं रहता।
विज्ञापन

सरकारी एंबुलेंस की भी कमोबेश यही हालत है। इसमें प्रशिक्षित कर्मचारी तो रहते हैं, लेकिन एंबुलेंस अंदर से बदहाल हैं। स्ट्रेचर रस्सी से बंधा रहता है, तो बोतल टांगकर लगाई जाती है। कई ऐसी एंबुलेंस हैं, जिनका गेट भी रस्सी से बांधकर काम चलाया जाता है। ऐसे में मरीज किस तरह गोरखपुर तक पहुंचते होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

---
किराया 5500 रुपये तक, सुविधा के नाम पर सिर्फ ऑक्सीजन सिलेंडर
कई बार मरीज को लेकर जल्दी पहुंचने के चक्कर में तीमारदार निजी एंबुलेंस का सहारा ले लेते हैं। निजी एंबुलेंस संचालक ऑक्सीजन की सुविधा के नाम पर गोरखपुर तक की 80 किलोमीटर दूरी के लिए 4500-5500 रुपये लेते हैं। हालांकि एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर को छोड़कर कोई अन्य सुविधा नहीं होती। अगर मरीज की हालत बिगड़ जाए तो एंबुलेंस चालक और सहायक प्राथमिक इलाज भी नहीं कर सकते। जबकि नियम है कि एंबुलेंस में एक प्रशिक्षित कर्मचारी होना चाहिए।
00
सरकारी एंबुलेंस 59, अधिकतर बदहाल जिले में कुल 59 सरकारी एंबुलेंस हैं। इनमें 32 एंबुलेंस 102 नंबर की और 27 एंबुलेंस 108 सेवा की हैं। इनमें भी ज्यादातर बदहाल स्थिति में हैं। किसी का दरवाजा रस्सी से बांधकर बंद किया जाता है तो किसी में स्ट्रेचर और सीट जबरन रखी जाती है, वहीं कुछ में ग्लूकोज की बोतल मरीजों के हाथ में थमानी पड़ती है। मेडिकल कॉलेज परिसर में खड़ी एक एंबुलेंस की हकीकत जानी गई तो स्ट्रेचर और सीट बदहाल मिली। ग्लूकोज की बोतल लगाने की व्यवस्था भी नहीं थी।
---
ट्रॉमा सेंटर होता तो बच जाती बच्चे की जान
मोहाना थाना क्षेत्र के सिकरी चौराहे पर 18 सितंबर को सड़क पार कर रहे 10 साल के बच्चे को पिकअप ने टक्कर मार दी थी। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया। वहां से हायर सेंटर के लिए रेफर कर दिया गया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचने से पहले उसने दम तोड़ दिया। अगर ट्राॅमा सेंटर की सुविधा होती और तत्काल इलाज मिलता तो बच्चे की जान बच सकती थी।
00
युवक की चली गई थी जान
15 दिन पहले ढेबरुआ थाना क्षेत्र के रहने वाले रमेश कुमार सड़क हादसे का शिकार हो गए। उन्हें जिला अस्पताल से गोरखपुर मेडिकल कॉलेज भेजा गया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के गेट पर पहुंचकर उनकी मौत हो गई। सिर में गंभीर चोट थी और ऑपरेशन जरूरी था। जितना समय गोरखपुर पहुंचने में लगा, उतने में ऑपरेशन हो सकता था और रमेश की जान बच गई होती।

00
कोट
सीएसआर प्रोजेक्ट से ट्राॅमा सेंटर बनाया जा रहा है। 2.15 करोड़ रुपये का सामान खरीदने के लिए टेंडर हो गया है। इसमें 20 बेड का आईसीयू, दो वेंटिलेटर, सी आर्म मशीन, पोर्टेबल एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड मशीन समेत अन्य जरूरी उपकरणों की खरीद होनी है। एजेंसी को उपकरणों की आपूर्ति के लिए 15 अक्टूबर तक का समय दिया गया है। इसके बाद ट्रॉमा सेंटर मेें सेवा शुरू हो जाएगी।
- वीरेंद्र सिंह, सहायक सांख्यिकी अधिकारी
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed