{"_id":"ce2874f8dd6871ac134e1135c027662c","slug":"torchlight-engaged-injection-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"टॉर्च की रोशनी में लगे इंजेक्शन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
टॉर्च की रोशनी में लगे इंजेक्शन
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 07 Dec 2015 11:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाज में लापरवाही को लेकर सख्त हिदायतों के बावजूद जिम्मेदार बाज नहीं आ रहे हैं। जिला अस्पताल में सोमवार को लापरवाही का ऐसा ही नजारा दिखा। घंटों तक मरीजों का उपचार टार्च और मोबाइल फोन की रोशनी में हुआ। पर्चियां बनी, दवाएं लिखी गई और इंजेक्शन लगाए गए।
अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही के आगे मरीज बेबस और तमाशबीन बने रहे। सवाल उठा तो जवाब यह मिला कि बिजली नहीं है और जनरेटर चलाने के लिए बजट नहीं है। जिला अस्पताल की बिजली सुबह करीब 11 बजे गुल हो गई। इसके बाद ओपीडी सहित वार्डों में अंधेरा छा गया।
डॉक्टरों के कई चेंबरों में तो खिड़कियों के जरिए कामकाज चलता रहा, मगर एंटी रैबिज कक्ष में अंधेरे के बीच ही उपचार जारी था। छोटे तंग कमरे में स्थित एंटी रैबिज कक्ष में खिड़की से पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंच रही थी। घुप्प अंधेरे में दिखना मुश्किल था।
विज्ञापन
दरवाजे पर लगी भीड़ हटाने के लिए कर्मचारियों ने अंधेरे में ही पर्ची बनाने, दवा लिखने और इंजेक्शन लगाया। इसके लिए मोबाइल फोन में मौजूद टार्च का सहारा लिया गया। करीब डेढ़ घंटे तक इसी तरह उपचार चलता रहा, इंजेक्शन लगते रहे। साढ़े 12 के बाद बिजली आने पर कमरे में रोशनी हुई। बता दें कि जिला अस्पताल में बिजली के लिए जनरेटर की व्यवस्था भी है।
इस मद में हर माह लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, बावजूद अंधेरे में इंजेक्शन लगाना समझ से परे रहा। पर्याप्त रोशनी के अभाव में कोई चूक होती तो कौन जिम्मेदार होता। बहरहाल, इस मामले में पूछताछ करने पर कर्मचारियों का कहना था कि बिजली नहीं है तो क्या करें। जनरेटर में तेल का बजट भी नहीं है। लोगों का उपचार तो करना ही है। सुरेश और आरती ने बताया कि एंटी रैबिज वैक्सीन कक्ष में बिजली नहीं थी और कर्मचारी टॉर्च और मोबाइल की रोशनी में सुई लगा रहे थे।
विज्ञापन
अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही के आगे मरीज बेबस और तमाशबीन बने रहे। सवाल उठा तो जवाब यह मिला कि बिजली नहीं है और जनरेटर चलाने के लिए बजट नहीं है। जिला अस्पताल की बिजली सुबह करीब 11 बजे गुल हो गई। इसके बाद ओपीडी सहित वार्डों में अंधेरा छा गया।
विज्ञापन
डॉक्टरों के कई चेंबरों में तो खिड़कियों के जरिए कामकाज चलता रहा, मगर एंटी रैबिज कक्ष में अंधेरे के बीच ही उपचार जारी था। छोटे तंग कमरे में स्थित एंटी रैबिज कक्ष में खिड़की से पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंच रही थी। घुप्प अंधेरे में दिखना मुश्किल था।
विज्ञापन
दरवाजे पर लगी भीड़ हटाने के लिए कर्मचारियों ने अंधेरे में ही पर्ची बनाने, दवा लिखने और इंजेक्शन लगाया। इसके लिए मोबाइल फोन में मौजूद टार्च का सहारा लिया गया। करीब डेढ़ घंटे तक इसी तरह उपचार चलता रहा, इंजेक्शन लगते रहे। साढ़े 12 के बाद बिजली आने पर कमरे में रोशनी हुई। बता दें कि जिला अस्पताल में बिजली के लिए जनरेटर की व्यवस्था भी है।
इस मद में हर माह लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, बावजूद अंधेरे में इंजेक्शन लगाना समझ से परे रहा। पर्याप्त रोशनी के अभाव में कोई चूक होती तो कौन जिम्मेदार होता। बहरहाल, इस मामले में पूछताछ करने पर कर्मचारियों का कहना था कि बिजली नहीं है तो क्या करें। जनरेटर में तेल का बजट भी नहीं है। लोगों का उपचार तो करना ही है। सुरेश और आरती ने बताया कि एंटी रैबिज वैक्सीन कक्ष में बिजली नहीं थी और कर्मचारी टॉर्च और मोबाइल की रोशनी में सुई लगा रहे थे।