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जिला अस्पताल में स्ट्रेचर का अकाल, गोद में ढोए जा रहे मरीज

Fri, 26 Aug 2022 12:15 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Fri, 26 Aug 2022 12:15 AM IST
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stretcher famine in district hospital, patients being carried in lap
जिला अस्पताल में वृद्ध महिला को उठाकर ले जाते तीमारदार। संवाद - फोटो : SIDDHARTHNAGAR
जिला अस्पताल में स्ट्रेचर का अकाल, गोद में ढोए जा रहे मरीज
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सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल की बदहाल व्यवस्था मरीजों की तकलीफ बढ़ा रही है। हाल यह है कि अस्पताल में प्रसव के लिए आने वाली महिलाएं स्ट्रेचर के अभाव में वार्ड तक लगभग 100 मीटर पैदल चलने के लिए विवश हैं। इमरजेंसी वाले मरीजों को भी इसी प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
बुधवार शाम राज्यमंत्री रवींद्र जायसवाल के निरीक्षण से पहले स्ट्रेचर के अभाव में एक परिजन अपने मरीज को गोद में ले जाते हुए दिखा था। दूसरे दिन बृहस्पतिवार को मंत्री जिले में निरीक्षण और बैठकें कर रहे थे तो भी जिला अस्पताल में यहीं स्थिति नजर आई। जिले की 29 लाख की आबादी को बेहतर इलाज मिले, उसके लिए जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध कर दिया गया। बड़ी आबादी के इलाज की जिम्मेदारी उठाने वाले 330 बेड के अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिलने के बाद भी कई मूलभूत जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
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ऐसे में मरीज के साथ उनके तीमारदार को भी परेशान होना पड़ रहा है। अस्पताल में इमरजेंसी में आने वाले केस में ऐसा होता है कि स्ट्रेचर पर्याप्त न होने के कारण मरीजों को कई लोग मिलकर टांगकर लेकर जाते हुए देखे जाते हैं। इमरजेंसी गेट से वार्ड में लाने की तो दूरी कम है, लेकिन सबसे अधिक परेशानी प्रसव के लिए आने वाली गर्भवती महिलाओं को होती है।
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इन्हें वार्ड तक पहुंचने के लिए लगभग 100 मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इस दौरान इन्हें भारी कठिनाइयों से गुजरना पड़ रहा है। यहीं हाल इमरजेंसी से जनरल और सर्जिकल वार्ड में मरीजों को शिफ्ट करने के बाद होती है। अगर दूसरी मंजिल पर सर्जिकल वार्ड में मरीज को जाना है और स्ट्रेचर नहीं है तो उसे बड़ी कठिनाई होती है। इसके अलावा सिटी स्कैन, एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड के लिए जाते समय मरीजों को स्ट्रेचर के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। अधिकांश लोग विवश होकर गोदी में टांगकर मरीजों को लेकर जाते हैं।
ऐसी हैं असुविधाएं
साठ वर्षीय शकुंतला देवी के पैर में गंभीर जख्म है। परिवार के लोग उन्हें किसी तरह से बाइक से इमरजेंसी गेट तक तो लाए, लेकिन जब कुछ देर तक स्ट्रेचर नहीं मिला तो तीन लोग मिलकर उन्हें उठाकर वार्ड में ले जा सके। इसी प्रकार प्रसव पीड़ा से परेशान एक गर्भवती पहुंची। चार पहिया वाहन से इमरजेंसी गेट तक तो वह पहुंच गई, लेकिन स्ट्रेचर जब उपलब्ध नहीं हुआ तो दो महिलाओं ने उसे सहारा दिया। फिर 100 मीटर पैदल चलकर प्रसूता गृह तक पहुंची। दोनों मरीजों के तीमारदारों ने व्यवस्था पर सवाल उठाए, लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कोई असर नहीं है।
सामान्य दिन में आते हैं 30-40 गंभीर मरीज
अस्पताल में पूरे जनपद के अलावा नेपाल, महाराजगंज, संतकबीरनगर जनपद के भी गंभीर मरीज आते हैं। सामान्य दिन में 30-40 गंभीर मरीज आते हैं। वहीं, मौसम में बदलाव के बाद इमरजेंसी में इनकी संख्या 70-80 पहुंच जाती है। ऐसे में अस्पताल में स्ट्रेचर की कमी का होना बड़ी समस्या है।
लैब तक जाने की नहीं है कोई व्यवस्था
अगर किसी गंभीर मरीज को तत्काल ब्लड और यूरिन की जांच की जरूरत हो तो वह लैब तक नहीं पहुंच सकता है। पहली समस्या है कि स्लैब की सीढ़ी नहीं बनी है। ऐसे में स्ट्रेचर मिल भी जाए तो मरीज लैब तक नहीं पहुंच पाएगा। अस्पताल प्रशासन की ओर से मरीजों की सुविधा के लिए कोई पहल नहीं की जा रही है।
293 कर्मचारी, मगर हेल्प डेस्क पर एक भी नहीं
मेडिकल कॉलेज से संबद्ध संयुक्त जिला अस्पताल में आउटसोर्सिंग के माध्यम से 293 कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं, लेकिन हेल्प डेस्क पर एक भी कर्मचारी नहीं मिलता है, जहां से जरूरतमंद मरीजों को मदद मिल सके। कोई मरीज असहाय हो और उसके साथ पर्याप्त सहयोगी न हो तो मदद मिलना संभव ही नहीं है। अव्यवस्था के कारण स्ट्रेचर, व्हील चेयर मिलना संभव नहीं होता है। पहचानपत्र के आधार पर मरीज के परिजन के स्ट्रेचर का आवंटन हो और फिर वापस करने की व्यवस्था हो तो समस्या दूर हो जाएगी। जिला अस्पताल के चीफ फार्मासिस्ट ओपी चौधरी ने बताया कि सभी वार्ड, ओटी में पर्याप्त स्ट्रेचर, व्हील चेयर है, लेकिन वे नहीं बता सके कि कुल कितने स्ट्रेचर, व्हील चेयर हैं।

स्ट्रेचर, व्हील चेयर वितरण की व्यवस्था बेहतर की जाएगी। परिजन ने कर्मचारी से मांगा नहीं होगा और खुद ही मरीज को गोद में उठा लिया होगा। आउटसोर्सिंग कर्मियों की भर्ती हो गई है। हेल्प डेस्क पर पर्याप्त कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाएगी।
- डॉ. एके झा, प्रभारी सीएमएच
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