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Siddharthnagar News: भारतीय पोशाक से सरहद पार सजेंगे कान्हा, सीमा के दोनों ओर इंतजार
Wed, 02 Sep 2026 11:53 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 02 Sep 2026 11:53 PM IST
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पुलिस लाइन परिसर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सजावट करते लोग
- तौलिहवा, कृष्णनगर और बहादुरगंज बाजारों में बढ़ी चहल-पहल, नेपाली ग्राहक खरीद रहे बाल गोपाल की पोशाक और पूजा सामग्री
- तराई के गांवों में भजन-कीर्तन के साथ दही-हांडी की तैयारी, भारत में आधी रात पालने में विराजेंगे लड्डू गोपाल
सिद्धार्थनगर। भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। भारतीय पोशाकों से सरहद के पार कान्हा सजेंगे। इसके लिए सीमा पार नेपाल के तौलिहवा, कृष्णनगर, चंद्रौटा और बहादुरगंज बाजारों में भी कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर खरीदारी तेज हो गई है। भारतीय बाजारों में नेपाल से आने वाले ग्राहक बाल गोपाल की पोशाक, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, झूले और पूजा-सजावट का सामान खरीद रहे हैं। सीमा से जुड़े बाजारों में त्योहार की खरीदारी दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्तों की झलक दिखा रही है।
तौलिहवा बाजार में जन्माष्टमी की खरीदारी के लिए पहुंचे ग्राहक रमेश प्रसाद श्रेष्ठ ने बताया कि बाल गोपाल के लिए पोशाक और मुकुट लेने आए हैं। वहीं कृष्णनगर बाजार में सुनीता चौधरी पूजा की सामग्री और सजावट का सामान खरीदती नजर आईं। चंद्रौटा और बहादुरगंज बाजारों में भी जन्माष्टमी को लेकर दुकानों पर सजावटी सामान और बच्चों के लिए राधा-कृष्ण की पोशाकें उपलब्ध हैं।
भारत में जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। बाल कृष्ण को नए वस्त्र पहनाकर पालने में विराजमान कराया जाता है। अभिषेक के बाद आरती होती है और दूध, दही, माखन-मिश्री व फलों का भोग लगाया जाता है। मुदित खत्री बताते हैं कि उनके गांव में ‘हे कान्हा, तिमी आऊ न...’ जैसे नेपाली भजन मादल और झांझ की थाप के बीच देर रात तक गूंजते हैं।
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नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों और गांवों में विशेष तैयारी हो रही है। शोहरतगढ़ के राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि कई गांवों में रातभर सामुदायिक भजन-कीर्तन होता है। मादल और झांझ की थाप पर नेपाली, मैथिली और भोजपुरी भजनों की गूंज सुनाई देती है। बच्चों को राधा-कृष्ण के रूप में सजाया जाता है और आधी रात के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है।
बढ़नी के मुक्तेश्वर बताते हैं कि तराई के कुछ गांवों में दही-हांडी भी जन्माष्टमी का आकर्षण रहती है। बांस के खंभों के बीच मिट्टी की हांडी बांधकर युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती है। हालांकि सीमा से सटे सिद्धार्थनगर के अधिकांश हिस्सों में जन्माष्टमी का मुख्य केंद्र व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और आधी रात कृष्ण जन्मोत्सव ही रहता है।
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सीमा अलग, आस्था एक
- सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अविनाश प्रताप सिंह के अनुसार भारत-नेपाल सीमा भले ही दोनों देशों को अलग करती है लेकिन तराई क्षेत्र की लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में काफी समानता दिखाई देती है। जन्माष्टमी पर दोनों ओर घरों और मंदिरों में कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी झांकियां सजाई जाती हैं। दूध, दही और माखन का भोग लगाने से लेकर रात में कृष्ण जन्म के बाद आरती और प्रसाद वितरण तक कई परंपराएं एक जैसी हैं। यही वजह है कि त्योहार के दौरान सीमा के दोनों ओर बाजारों और गांवों में एक जैसा उत्साह दिखाई देता है।
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माखन-दही का भोग, लोक संस्कृति से जुड़ा उत्सव
- नेपाल के ग्रामीण इलाकों में जन्माष्टमी का जुड़ाव स्थानीय खानपान और लोक संस्कृति से भी है। दूध, दही और मक्खन के साथ स्थानीय अनाजों से तैयार सात्विक व्यंजन भोग में शामिल किए जाते हैं। कृष्ण जन्म के बाद प्रसाद पूरे गांव में बांटा जाता है। सुदूर-पश्चिमी नेपाल के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इसी दौरान गौरा पर्व की परंपराएं भी दिखाई देती हैं। महिलाओं की पूजा और देउडा लोकनृत्य जैसे आयोजन वहां के उत्सव को अलग सांस्कृतिक रंग देते हैं।
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बाजार बता रहे सीमा के पार का रिश्ता
- सिद्धार्थनगर के सीमावर्ती बाजारों में नेपाल से आने वाले ग्राहकों की खरीदारी इस सांस्कृतिक जुड़ाव की तस्वीर पेश कर रही है। बाल गोपाल की पोशाक, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और झूले जैसी चीजों की मांग दोनों ओर लगभग एक जैसी है। सीमा पर रोजमर्रा की आवाजाही के बीच त्योहार भी दोनों देशों के लोगों को जोड़ते हैं।
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पर्व: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
दिन: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी
अष्टमी तिथि शुरू: 4 सितंबर रात 2:25 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर रात 12:13 बजे
रोहिणी नक्षत्र शुरू: 4 सितंबर रात 12:29 बजे
रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 4 सितंबर रात 11:04 बजे
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- तराई के गांवों में भजन-कीर्तन के साथ दही-हांडी की तैयारी, भारत में आधी रात पालने में विराजेंगे लड्डू गोपाल
सिद्धार्थनगर। भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। भारतीय पोशाकों से सरहद के पार कान्हा सजेंगे। इसके लिए सीमा पार नेपाल के तौलिहवा, कृष्णनगर, चंद्रौटा और बहादुरगंज बाजारों में भी कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर खरीदारी तेज हो गई है। भारतीय बाजारों में नेपाल से आने वाले ग्राहक बाल गोपाल की पोशाक, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, झूले और पूजा-सजावट का सामान खरीद रहे हैं। सीमा से जुड़े बाजारों में त्योहार की खरीदारी दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक रिश्तों की झलक दिखा रही है।
तौलिहवा बाजार में जन्माष्टमी की खरीदारी के लिए पहुंचे ग्राहक रमेश प्रसाद श्रेष्ठ ने बताया कि बाल गोपाल के लिए पोशाक और मुकुट लेने आए हैं। वहीं कृष्णनगर बाजार में सुनीता चौधरी पूजा की सामग्री और सजावट का सामान खरीदती नजर आईं। चंद्रौटा और बहादुरगंज बाजारों में भी जन्माष्टमी को लेकर दुकानों पर सजावटी सामान और बच्चों के लिए राधा-कृष्ण की पोशाकें उपलब्ध हैं।
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भारत में जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। बाल कृष्ण को नए वस्त्र पहनाकर पालने में विराजमान कराया जाता है। अभिषेक के बाद आरती होती है और दूध, दही, माखन-मिश्री व फलों का भोग लगाया जाता है। मुदित खत्री बताते हैं कि उनके गांव में ‘हे कान्हा, तिमी आऊ न...’ जैसे नेपाली भजन मादल और झांझ की थाप के बीच देर रात तक गूंजते हैं।
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नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों और गांवों में विशेष तैयारी हो रही है। शोहरतगढ़ के राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि कई गांवों में रातभर सामुदायिक भजन-कीर्तन होता है। मादल और झांझ की थाप पर नेपाली, मैथिली और भोजपुरी भजनों की गूंज सुनाई देती है। बच्चों को राधा-कृष्ण के रूप में सजाया जाता है और आधी रात के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है।
बढ़नी के मुक्तेश्वर बताते हैं कि तराई के कुछ गांवों में दही-हांडी भी जन्माष्टमी का आकर्षण रहती है। बांस के खंभों के बीच मिट्टी की हांडी बांधकर युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती है। हालांकि सीमा से सटे सिद्धार्थनगर के अधिकांश हिस्सों में जन्माष्टमी का मुख्य केंद्र व्रत, पूजा, भजन-कीर्तन और आधी रात कृष्ण जन्मोत्सव ही रहता है।
सीमा अलग, आस्था एक
- सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अविनाश प्रताप सिंह के अनुसार भारत-नेपाल सीमा भले ही दोनों देशों को अलग करती है लेकिन तराई क्षेत्र की लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में काफी समानता दिखाई देती है। जन्माष्टमी पर दोनों ओर घरों और मंदिरों में कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी झांकियां सजाई जाती हैं। दूध, दही और माखन का भोग लगाने से लेकर रात में कृष्ण जन्म के बाद आरती और प्रसाद वितरण तक कई परंपराएं एक जैसी हैं। यही वजह है कि त्योहार के दौरान सीमा के दोनों ओर बाजारों और गांवों में एक जैसा उत्साह दिखाई देता है।
माखन-दही का भोग, लोक संस्कृति से जुड़ा उत्सव
- नेपाल के ग्रामीण इलाकों में जन्माष्टमी का जुड़ाव स्थानीय खानपान और लोक संस्कृति से भी है। दूध, दही और मक्खन के साथ स्थानीय अनाजों से तैयार सात्विक व्यंजन भोग में शामिल किए जाते हैं। कृष्ण जन्म के बाद प्रसाद पूरे गांव में बांटा जाता है। सुदूर-पश्चिमी नेपाल के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इसी दौरान गौरा पर्व की परंपराएं भी दिखाई देती हैं। महिलाओं की पूजा और देउडा लोकनृत्य जैसे आयोजन वहां के उत्सव को अलग सांस्कृतिक रंग देते हैं।
बाजार बता रहे सीमा के पार का रिश्ता
- सिद्धार्थनगर के सीमावर्ती बाजारों में नेपाल से आने वाले ग्राहकों की खरीदारी इस सांस्कृतिक जुड़ाव की तस्वीर पेश कर रही है। बाल गोपाल की पोशाक, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और झूले जैसी चीजों की मांग दोनों ओर लगभग एक जैसी है। सीमा पर रोजमर्रा की आवाजाही के बीच त्योहार भी दोनों देशों के लोगों को जोड़ते हैं।
पर्व: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
दिन: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
तिथि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी
अष्टमी तिथि शुरू: 4 सितंबर रात 2:25 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर रात 12:13 बजे
रोहिणी नक्षत्र शुरू: 4 सितंबर रात 12:29 बजे
रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 4 सितंबर रात 11:04 बजे