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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Siddharthnagar News ›   Careful! Do not take sweets adulterated honey

सावधान! मिलावटी मिठाई न ले ले जान

Thu, 05 Nov 2015 11:28 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर Updated Thu, 05 Nov 2015 11:28 PM IST
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दीपावली के नजदीक आते ही मिलावटखोरों का रैकेट पूरी तरह से सक्रिय हो गया है। त्योहार पर मिठाई की भारी खपत को पूरा करने के लिए नकली मावा व कानपुरी मिठाइयों का धंधा जोर पकड़ता जा रहा है। मिलावटी मिठाइयों के धंधेबाजों की तरकीब के आगे सरकारी मशीनरी की सक्रियता नाकाफी साबित हो  रही है।
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दीपावली के मौके पर पटाखों के अलावा सबसे ज्यादा डिमांड लजीज व आकर्षक मिठाइयों की होती है। मिठाइयों की इसी    डिमांड को पूरा करने की आड़ में धंधेबाज, लोगों की सेहत से जमकर खिलवाड़ करते हैं। इस खेल में सबसे ज्यादा प्रयोग   नकली मावे का होता है। हर अच्छी मिठाई में आमतौर पर मावे का प्रयोग होता है। कानपुर मंडी में    बैठे धंधेबाज मिलावटी या सिंथेटिक मावे को बाजार में    खपाते हैं।
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मिलावटी मिठाई की भी हो रही आपूर्ति ःमावे के अलावा कानपुर मंडी से मिलावटी मिठाइयों की खेप भी बाजार में धड़ल्ले से खपाई जाती है। दिखने में असली से भी बेहतर दिखने वाली इन मिठाइयों में जमकर मिलावटखोरी होती है। बनाने में नकली मावे के प्रयोग के चलते इसकी कीमत कम होती है। जिसे बाजार में ऊंचे भाव में बेचकर दुकानदार तगड़ा मुनाफा कमाते हैं।
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इसकी होती है मिलावट ः खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार नकली मावे को बनाने में मिल्क पाउडर के साथ आलू या गंजी का प्रयोग किया जाता है। मावे में चिकनाई लाने के लिए उसमें वनस्पति तेल मिलाया जाता है और मिठास के लिए आवश्कतानुसार चीनी मिलाई जाती है।

ऐसे आता है जिले में नकली मावा
नकली मावे को नियत स्थानों तक पहुंचाने में जिस तरकीब का इस्तेमाल किया जाता है, उससे कारोबारियों या रैकेट से जुड़े लोगों तक पहुंचना सरकारी मशीनरी के लिए मुश्किल साबित होता है। धंधेबाज इसके लिए कानपुर से आने वाली रोडबेज बसों का सहारा लेते हैं। कानपुर मंडी से नकली मावा रोडबेज बस पर लाद दिया जाता है और इसकी जानकारी कंडक्टर को दे दी जाती है। इसके एवज में कंडक्टर को सौ से दो सौ रुपये दे दिया जाता है और माल कहां उतारा जाएगा इसकी जानकारी भी कंडक्टर को होती है। कानपुर मंडी से मावा लदने के बाद रैकेट से जुड़े लोग नियत स्थान के ग्राहक या दुकानदार को इसकी जानकारी देने के साथ बस के पहुंचने का समय व  नंबर भी नोट करा देते हैं। इस दौरान बस में लदा मावा कंडक्टर की देखरेख में नियत स्थान तक पहुंच जाता है और वहां पहले से मौजूद व्यक्ति आसपास की स्थिति सामान्य देखकर, कंडक्टर को इशारा करता हुआ माल को उतार लेता है। बीच में कहीं भी छापेमारी या धरपकड़ होने पर बस में मावा तो बरामद होता है लेकिन उसका कोई वारिस सामने नहीं आता है। कंडक्टर भी यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेता है कि उसे पता नहीं कि कब और किसने मावा लाकर बस में रख दिया। जिसके चलते छापेमारी में बरामद मावा लावारिस घोषित कर जब्त कर तो लिया जाता है लेकिन रैकेट से जुड़ा कोई भी शख्स पकड़ में नहीं आता।
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