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चौरीचौरा की घटना के बाद अंग्रेजों के निशाने पर रहे बुधई

Wed, 03 Feb 2021 11:24 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 03 Feb 2021 11:24 PM IST
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after chaurichaura incident budhai was on target of british
शोहरतगढ़ कस्बा स्थित शहीद बुधई स्मारक का गुख्य द्वार। - फोटो : SIDDHARTHNAGAR
चौरीचौरा की घटना के बाद अंग्रेजों के निशाने पर रहे बुधई
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शोहरतगढ़ में घोड़े की टॉप से कुचलकर हुई थी बुधई की मौत
्रलखनऊ में इलाज के दौरान मित्र परमेश्वर दत्त की मृत्यु हुई थी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। चौरीचौरा संघर्ष का जिले से भी गहरा नाता है। चौरीचौरा थाने पर राष्ट्रवादियों के हमले से बौखलाई ब्रिटिश हुकूमत ने हर जगह दमन शुरू कर दिया गया था। शोहरतगढ़ कस्बे में भी अंग्रेजों ने कांग्रेस दफ्तर पर हमला बोल दिया था। अंग्रेजों के दमन का शिकार हुए बुधई की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी। जबकि इनके अभिन्न मित्र रहे परमेश्वर दत्त पांडेय की मौत बाद में लखनऊ में इलाज के दौरान हुई थी।
बस्ती गजेटियर के मुताबिक स्वतंत्रता आंदोलनों के दौरान शोहरतगढ़ का इलाका सेनानियों के लिए पनाहगाह बना था। उस समय इस स्थान पर देश को आजाद करने के लिए गतिविधियां संचालित हो रहीं थीं। पुलिस भी इस स्थान को संवदेनशील मानते हुए अक्सर इस जगह छापा मारती रहती थी। उस समय बुधई हरिजन (गांधी जी का दिया हुआ उपनाम) और उनके अभिन्न मित्र परमेश्वर दत्त पांडेय भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे और बीस से अधिक बार जेल जा चुके थे। चार फरवरी 1922 को गोरखपुर के चौरीचौरा में थाने पर हमले के बाद शोहरतगढ़ इलाके के क्रांतिकारी भी उत्साहित थे और यहां भी अंग्रेजों को शिकस्त देने की योजनाएं बनाईं जा रही थीं। इसकी भनक अंग्रेजी हुकूमत को लग गई। चौरीचौरा संघर्ष के कुछ दिन बाद ही अंग्रेजों ने शोहरतगढ़ में कांग्रेस दफ्तर को घेर कर जला दिया। इसका विरोध बुधई हरिजन और उनके मित्र परमेश्वरदत्त पांडेय सहित अन्य कांग्रेसियों ने किया। अंग्रेजी हुकूमत ने विरोध करने वालों पर घुड़सवार दस्ता छोड़ दिया। मार खाने के बाद जमीन पर गिरे बुधई को घोड़ों की टॉप से रौंद दिया गया। वह मौके पर ही शहीद हो गए। परमेश्वरदत्त पांडेय घुड़सवार दस्ते के कोड़ों की मार खाकर बेहोश हो गए। उन्हें किसी तरह बचा कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। गहरी चोटों के कारण कुछ दिन बाद वह भी शहीद हो गए। उनकी याद में शोहरतगढ़ कस्बे में शहीद स्मारक बनाया गया है।
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महात्मा गांधी ने जिक्र किया था
वर्ष 1922 के चौरीचौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने अपने पत्र नवजीवन में लिखा था कि चौराचौरा कांड में उत्तर खलीलाबाद के साथ ही शोहरतगढ़ की जनता ने शांति से साथ दिया। इसका जिक्र बस्ती के गजेटियर में है। इसके बाद अक्तूबर 1923 में महात्मा गांधी ने चरखा फंड के लिए धन एकत्र करने के लिए बस्ती के हथियागढ़ के मैदान में 20 हजार से अधिक व्यक्तियों की सभा की थी। जहां उन्हें पांच हजार की थैली भेंट की गई थी।
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चार स्थलों पर विशेष कार्यक्रम
चौरीचौरा शताब्दी महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर बृहस्पतिवार को जिले में भी विशेष कार्यक्रम आयोजित हैं। शोहरतगढ़ कस्बा स्थित शहीद बुधई स्मारक स्थल, बढ़नी ब्लॉक के ढेबरुआ थाना गेट के बगल शहीदों के नाम स्मारक ग्राम ढेबरुआ, बांसी तहसील क्षेत्र के चंद्रशेखर आजाद पार्क एवं गांधी चबूतरा ग्राम तेजगढ़, डुमरियागंज के अमरगढ़ ताल अंतर्गत माली मैनहा मुस्तहकम स्थल शामिल हैं। बृहस्पतिवार को जिले के चयनित चार स्थलों पर सुबह 8:30 बजे स्कूली बच्चों की प्रभातफेरी, 10 बजे वंदेमातरम का गायन, 10:15 बजे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं शहीदों के परिजनों का सम्मान किया जाएगा। इसके अलावा स्वतंत्रता संग्राम स्थलों, शहीद स्मारकों, शैक्षणिक संस्थाओं पर सायं 5:30 बजे से छह बजे तक पुलिस बैंड की ओर से राष्ट्रधुन बजाई जाएगी। सायं 6:30 बजे दीप प्रज्जवलन का कार्यक्रम होगा।
फोटो-
आजादी के परवानों की वीरता से होंगे रूबरू
अमरगढ़ ताल को मिला शहीद स्थल का दर्जा
आज ताल किनारे होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। डुमरियागंज का अमरगढ़ ताल फिरंगियों की बर्बरता एवं कहर का मूक गवाह है। अंग्रेजों ने हजारों वीर सपूतों को मार कर इनकी लाशें, इसी ताल में डाल दी थीं। 1857 के आंदोलन में वीर सपूतों की बहादुरी का भी यहां का जर्रा-जर्रा गवाह बना। जवानों ने दो बार ब्रिटिश सेना को शिकस्त दी। बांबे आर्मी कमांडर आफ चीफ ऐल्ड्रिन गुशन को मौत के घाट उतार कर अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए थे। आजादी के परवानों ने वीरता की ऐसी दास्तान लिखी कि आने वाली पीढ़ी उन्हें अदब से नमन करती रहेगी।

1857 में जब आजादी की पहली लड़ाई पूरे देश के पैमाने पर मुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर की अगुवाई में लड़ी जा रही थी, तो डुमरियागंज के करीब अंग्रेजी सेनाओं एवं आजादी के लड़ाकों, जिन्हें अंग्रेजों ने विद्रोही (पिंडारी) की संज्ञा दी थी, के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई। इस लड़ाई के मैदान को गैजेटियर में न्योता के नाम से दर्शाया गया है। इसको आज भी गांव के लोग इसी नाम से पुकारते हैं। क्षेत्रीय वीर सपूतों ने दो-दो बार अंग्रेजी सेना को शिकस्त दी। इसको देख पूरी हुकूमत हिल गई। अंग्रेजी हुकूमत ने बांसी, बस्ती, बलरामपुर के राजा से सैन्य मदद लेकर चौतरफा हमला कर दिया। फिर अंग्रेजों ने कहर ढाया, हजारों जवानों को मार कर उनकी लाशों को डुमरियागंज डाक बंगला के पीछे स्थित अमरगढ़ ताल में फेंक दिया था, जबकि बांबे आर्मी के कमांडर ऑफ चीफ की कब्र लड़ाई के मैदान में ही बना दी गई, जो आज भी मौजूद है। कब्र पर लगे काले पत्थर पर उसका संक्षिप्त इतिहास अंग्रेजी भाषा में अंकित है।
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