हिंदू भी करते हैं व्रत, रखते हैं ताजिया

Siddhartha nagar Updated Thu, 22 Nov 2012 12:00 PM IST
डुमरियागंज। आस्था की न कोई जाति होती है, न धर्म होता है। इस क्षेत्र में कई हिंदू परिवार भी मोहर्रम को पूरी आस्था के साथ मनाता है। इसकी मिसाल यहां के रमवापुर उर्फ नेबुआ, धनोहरी, भटगंवा सहित कई गांवों में देखने को मिलती है, जहां मुसलमान ही नहीं, हिंदू भी ताजिया रखते हैं।
रमवापुर उर्फ नेबुआ गांव के संतोष श्रीवास्तव हर साल ताजिया रखते हैं। उनका कहना है कि उनके यहां ताजिया कब से रखा जाता है, यह उन्हें नहीं पता है। उनके दादा के जमाने से ही ताजिया रखा जाता है। उन्होंने कहा कि वह इसी आस्था को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इस काम में उन्हें पूरे गांव का सहयोग मिलता है। उन्होंने बताया कि ताजिया रखने को लेकर कभी भी कोई विवाद नहीं हुआ। इसी तरह मन्नीजोत क्षेत्र के सेमरा बनकसिया गांव निवासी संतराम और भानू ने बताया कि मोहर्रम की नौवी को गांव और क्षेत्र के अन्य जगह के लोग व्रत रखकर आस्था के साथ इस त्योहार को मनाते हैं। क्षेत्र के राम मिलन, सहजराम, बुधई आदि ने बताया कि मोहर्रम की दसवीं के दिन जुलूस निकालकर दोनों समुदाय के लोग ताजिया को लेकर कर्बला पर आते हैं, जहां उसे श्रद्धा के साथ दफन कर दिया जाता है। इस दौरान पूरा क्षेत्र गमगीन रहता है। कलीचक गांव के ज्वाला प्रसाद शुक्ला ने बताया कि वह पिछले तीस वर्षों से ताजिया रखते हैं। पूरे परिवार का इस पर्व में विश्वास है। सभी पूरी आस्था के साथ इसे मनाते हैं। गांव वालों के उत्साह को देखकर इलाके के लोग उनके सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल देते हैं। इसी तरह क्षेत्र के धनोहरी, अंदुआ शनिचरा, सेखुई गोवर्धन, हिजुरा, मंगराव, बिजवार बढ़ई, पेड़ारी, खुरपहवा, भटगंवा, मछिया सहित दर्जनों गांवों में कई वर्षों से ताजिया रखा जाता है।

दसवीं पर होता है बड़े मेले का आयोजन
डुमरियागंज। क्षेत्र के हिंदू बाहुल्य गांवों में भी मोहर्रम की दसवीं पर दशहरा की तरह मेले का आयोजन किया जाता है। क्षेत्र के कलीचक, डुमिरयागंज, सरोथर कठौतिया, बिस्कोहर बाजार, नेबुआ गांव में कर्बला पर मेला लगता है। मेले में आस-पास के गांवों के लोगों की भीड़ आती है।

आग के शोलों पर चल करते हैं मातम
डुमरियागंज। हल्लौर गांव के मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ हिंदू भी मातम में शामिल होते हैं। राजन, गुड्डू, वाल्मीकि, लोटन, रमेश, दीपक सहित कई लोगों ने बताया कि वे लोग पूरी अकीदत के साथ आग के शोलों पर चलकर मातम करते हैं।

ताजियों पर उकेरते हैं मदीने का अक्श
डुमरियागंज। हल्लौर से सटे भटगंवा गांव निवासी साल के बहिरू उर्फ रामसरन बकरीद से ही मोहर्रम की तैयारी में जुट जाते हैं। वह पिछले करीब 50 वर्षों से ताजियों का निर्माण करते आ रहे हैं। अब भी वह अपने बूढ़े हाथों से ताजियों पर मदीने का अक्श उकेरते हैं। मोहर्रम के दौरान हजरत इमाम हुसैन की याद में 50 से 70 ताजिया का निर्माण वह करते हैं। उनके द्वारा बनाए गए ताजियों पर नक्काशी और छपाई की कारीगरी का कोई जवाब नहीं रहता है।

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