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कलयुग में श्रवण बना दिव्यांग बेटा
Tue, 28 May 2019 11:15 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 28 May 2019 11:15 PM IST
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अपनी बूढ़ी मां को ट्राइसाइकिल से घर ले जाता सुबाष।
- फोटो : अमर उजाला
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उसका बाजार। हालातों के आगे जब साथ न जुबान होती है, पहचान लेती है खामोशी में हर दर्द वो सिर्फ मां होती है। यह सटीक लाइन विकास खंड उसका के कोल्हुआ निवासी 70 वर्षीय वृद्ध मां सुरसती और 37 वर्षीय दिव्यांग बेटे सुबाष के हालात को देखकर स्वत: स्पष्ट हो जाता है।
रोज की भांति मंगलवार को भी दिव्यांग पुत्र सुबाष अपनी ट्राइसाइकिल से उसे शहर से चार किलोमीटर दूर कोल्हुआ स्थित घर ले जा रहा था। वह हाथ से पैडल मारते-मारते जब थक जाता तो उसी ट्राइसाइकिल के पीछे बैठी उसकी मां पैरों से धक्का देती है। जब उनसे पूछा तो पता चला कि यह उनकी रोजमर्रा की कहानी है। सुरसती ने आंखों में आंसू लिए बताया कि एक बेटा और एक बेटी है। पति का देहांत पहले ही हो चुका था, सुबाष अभी सात वर्ष का था तो उसे मस्तिष्क ज्वर ने अपनी चपेट में ले लिया और पूरी जिंदगी एक गहरा जख्म देते हुए दिव्यांग कर गया। अब बेटे और बेटी दोनों की जिम्मेदारी सुरसती पर आ गई।
उसने भी हार नहीं मानी और लोगों के घर चौका बर्तन कर जीवन यापन करने लगी, जैसे-तैसे बेटी के हाथ तो पीले किए। घर में अब सुबाष और उसकी मां रहती है, वृद्धावस्था पेंशन मिलती है लेकिन, महंगाई के दौर में दो लोगों का गुजारा मुश्किल से होता है। उसे चिंता इस बात की है कि मेरे बाद दिव्यांग बेटे का क्या होगा। सुबाष दिव्यांग तो है, लेकिन उसके जज्बे में कोई कमी नहीं है, वह मां की सेवा के साथ-साथ भारत मां की भी सेवा करना चाहता है। उसके ट्राइसाइकिल में तिरंगा झंडा हर पल लहराता है।
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रोज की भांति मंगलवार को भी दिव्यांग पुत्र सुबाष अपनी ट्राइसाइकिल से उसे शहर से चार किलोमीटर दूर कोल्हुआ स्थित घर ले जा रहा था। वह हाथ से पैडल मारते-मारते जब थक जाता तो उसी ट्राइसाइकिल के पीछे बैठी उसकी मां पैरों से धक्का देती है। जब उनसे पूछा तो पता चला कि यह उनकी रोजमर्रा की कहानी है। सुरसती ने आंखों में आंसू लिए बताया कि एक बेटा और एक बेटी है। पति का देहांत पहले ही हो चुका था, सुबाष अभी सात वर्ष का था तो उसे मस्तिष्क ज्वर ने अपनी चपेट में ले लिया और पूरी जिंदगी एक गहरा जख्म देते हुए दिव्यांग कर गया। अब बेटे और बेटी दोनों की जिम्मेदारी सुरसती पर आ गई।
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उसने भी हार नहीं मानी और लोगों के घर चौका बर्तन कर जीवन यापन करने लगी, जैसे-तैसे बेटी के हाथ तो पीले किए। घर में अब सुबाष और उसकी मां रहती है, वृद्धावस्था पेंशन मिलती है लेकिन, महंगाई के दौर में दो लोगों का गुजारा मुश्किल से होता है। उसे चिंता इस बात की है कि मेरे बाद दिव्यांग बेटे का क्या होगा। सुबाष दिव्यांग तो है, लेकिन उसके जज्बे में कोई कमी नहीं है, वह मां की सेवा के साथ-साथ भारत मां की भी सेवा करना चाहता है। उसके ट्राइसाइकिल में तिरंगा झंडा हर पल लहराता है।
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