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बौद्ध तपोस्थली में उपासकों ने की पूजा
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गंध कुटि पर पूजन अर्चन करते अनुयायी।
- फोटो : SRAWASTI
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को अनुयायियों से गुलजार रही। विभिन्न देशों से आए 450 सदस्यीय दल ने गंध कुटि पर विशेष पूजन किया। इस दौरान अनुयायियों ने भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो के नेतृत्व में विश्व शांति की कामना की। इसके बाद तपोस्थली के विभिन्न मूमेंटों का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की।
बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को बुद्धम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि के उद्घोष से गूंजती रही। इस दौरान श्रीलंका से आए 60, वर्मा से आए 120, थाईलैंड से आए 70 व 200 अन्य उपासकों ने गंधकुटि पर भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरों के नेतृत्व में विश्व शांति की कामना की।
पूजन के दौरान भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने बताया कि सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग की बात कही है। यह साधन है सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति व सम्यक समाधि। बुद्ध के अनुसार आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने के उपरांत मनुष्य की तृष्णा (चाहत) नष्ट हो जाती है, और उसे निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हो जाता है।
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बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य निर्वाण है। जिसका अर्थ है दीपक का बुझ जाना। अर्थात जीवन मरण चक्त्रस् से मुक्त हो जाना। बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति को सरल बनाने के लिए 10 शीलों पर बल दिया है। वह शील हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मद्य सेवन ना करना, असमय भोजन ना करना, सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना, धन संचय ना करना, स्त्रियों से दूर रहना व नृत्य गान आदि से दूर रहना। गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वालों के लिए प्रथम 5 शीलो और भिक्षुओं के लिए 10 शीलो का मानना अनिवार्य है। बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया।
अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म में समानता है। सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण गांधार शैली के अंतर्गत किया गया। बुद्ध की प्रथम मूर्ति संभवता मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी। पूजन के उपरांत सभी उपासकों ने शिवली स्तूप, कौशांबी कुटि, सभामंडप, सूर्य कुंड, संघाराम बिहार, अंगुलिमाल स्तूप, पूर्वा राम विहार का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की। इस मौके पर बौद्ध भिक्षु सुख सागर, नाग लोक, नाग सागर, बुध रत्न आदि मौजूद रहे।
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बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को बुद्धम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि के उद्घोष से गूंजती रही। इस दौरान श्रीलंका से आए 60, वर्मा से आए 120, थाईलैंड से आए 70 व 200 अन्य उपासकों ने गंधकुटि पर भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरों के नेतृत्व में विश्व शांति की कामना की।
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पूजन के दौरान भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने बताया कि सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग की बात कही है। यह साधन है सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति व सम्यक समाधि। बुद्ध के अनुसार आष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने के उपरांत मनुष्य की तृष्णा (चाहत) नष्ट हो जाती है, और उसे निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हो जाता है।
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बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य निर्वाण है। जिसका अर्थ है दीपक का बुझ जाना। अर्थात जीवन मरण चक्त्रस् से मुक्त हो जाना। बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति को सरल बनाने के लिए 10 शीलों पर बल दिया है। वह शील हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, मद्य सेवन ना करना, असमय भोजन ना करना, सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना, धन संचय ना करना, स्त्रियों से दूर रहना व नृत्य गान आदि से दूर रहना। गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वालों के लिए प्रथम 5 शीलो और भिक्षुओं के लिए 10 शीलो का मानना अनिवार्य है। बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया।
अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म में समानता है। सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण गांधार शैली के अंतर्गत किया गया। बुद्ध की प्रथम मूर्ति संभवता मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी। पूजन के उपरांत सभी उपासकों ने शिवली स्तूप, कौशांबी कुटि, सभामंडप, सूर्य कुंड, संघाराम बिहार, अंगुलिमाल स्तूप, पूर्वा राम विहार का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की। इस मौके पर बौद्ध भिक्षु सुख सागर, नाग लोक, नाग सागर, बुध रत्न आदि मौजूद रहे।