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बड़े समुदाय के वोटरों पर भाजपा लगा रही जुगत

Sat, 22 Jan 2022 10:57 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 22 Jan 2022 10:57 PM IST
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BJP is trying hard on the voters of the big community
श्रावस्ती। कुर्मी वोटर जिले में कभी भाजपा के एकाधिकार वाले वोटरों की श्रेणी में आते थे। लेकिन 2012 के चुनाव से लगातार कुर्मी वोटरों का साथ भाजपा से छूटता जा रहा है। इस परिवर्तन का कारण जिले की राजनीति में इस वर्ग के वोटरों व उनके नेताओं को तरजीह न देना बताया जा रहा है। वहीं पार्टी इसका मंथन कर रही है कि एक बड़े समुदाय वाले वोटरों को फिर से कैसे पार्टी की डोर में बांधा जाए।
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जिले की राजनीति में तीन जातियां प्रमुख हैं। जो राजनैतिक समीकरण को पल-पल बदलती हैं। इसमें सबसे बड़ी जाति के रूप में अल्पसंख्यकों का वोट है। जो भिनगा विधानसभा में लगभग 92 हजार तो श्रावस्ती विधानसभा में करीब एक लाख है। दूसरे स्थान में ब्राह्मण मतदाता हैं जो सभी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करते हैं। यदि इन जातीय गुणा गणित को देखा जाए तो भिनगा विधानसभा में ब्राह्मण वोट 52,138 व श्रावस्ती विधानसभा में 94,836 है। इन दो बढ़ी जातियों के बाद कुर्मी समुदाय का वोट आता है।
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यदि जातीय गुणा गणित व एकजुटता के आधार पर अधिकतम मतदान प्रतिशत की दृष्टिकोण से देखा जाए तो भिनगा विधानसभा में कुर्मी मतदाता 40,150 व श्रावस्ती विधानसभा में 32856 हैं। यह वोटर भाजपा के गठन के साथ ही उनके मूल आधार के रूप में थे। इसका कारण यह भी बताया जा रहा है कि श्रावस्ती की दोनों विधानसभा सीटें पहले बहराइच लोकसभा क्षेत्र के अधीन थीं। इस लोकसभा सीट पर भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से रुद्रसेन चौधरी का यहां अच्छा खासा प्रभाव था। वह कई बार इस सीट से लोकसभा पहुंचे, जबकि दो बार उनके पुत्र पदमसेन चौधरी को इसी सीट से लोकसभा जाने का मौका मिला। लेकिन 2009 के परिसीमन में श्रावस्ती लोकसभा क्षेत्र का गठन हुआ। जिसमें जिले की देनों सीटें समायोजित हो गईं।
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यही वह समय था जब इस जिले की राजनित में कुर्मी नेताओं का वर्चस्व खत्म हो गया। इसी के बाद धीरे-धीरे स्थिति यह आई कि भाजपा का चाहे संगठन हो या फिर दोनों विधानसभा सीटों पर भाजपा की ओर से टिकट वितरण। सब में इस जाति को तवज्जों नहीं मिली। धीरे-धीरे हालात बदलते-बदलते 2012 का समय आया। जिसमें पहली बार सपा ने भिनगा विधानसभा सीट पर कुर्मी समुदाय की इंद्राणी वर्मा को मैदान में उतारा। वह इस चुनाव में सफल रहीं। लेकिन इस सफलता को देखने के बाद भी भाजपा की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया। न तो आगामी चुनाव में भाजपा ने इस समुदाय को तवज्जो दी और न ही संगठन में। लेकिन कुछ दिन पूर्व संजय कैराती को कुछ दिनों के लिए भाजपा में जिलाध्यक्ष बनाया। लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें पद से हटा दिया। इसको लेकर कुर्मी नेताओं का आरोप है कि पूरे जिले में क्षेत्रीय वोटरों की संख्या करीब 25 हजार है। उन्हें संगठन से लेकर सरकार तक में तवज्जो मिलती है। जैसे देखा जाए तो संगठन में कई क्षत्रिय पदाधिकारी हैं तो पांच में से एक क्षत्रिय ब्लॉक प्रमुख है।

वहीं विधानसभा चुनाव में इन्हें चुनाव लड़ने का मौका भी मिला। ऐसे ही ब्राह्मण के प्रतिनिधित्व को देखा जा तो जिलाध्यक्ष, एक विधायक, एक जिला पंचायत अध्यक्ष व एक ब्लाक प्रमुख सहित संगठन के कई पदों पर आसीन हैं। वहीं कुर्मी समुदाय की संख्या अधिक होने के बाद भी उन्हें कहीं तरजीह नहीं मिली।
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