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घृणा को घृणा से नहीं बल्कि प्रेम से जीते.....
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कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली स्थित चाइना मंदिर परिसर में शनिवार शाम विशाल धम्म परिषद का आयोजन किया गया। यंग बोधिसत्व सोसायटी इंडिया की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कुशीनगर के शील प्रकाश महाथेरो रहे। विशिष्ट अतिथि थाईलैंड के डॉ. सुथेप महाथेरो रहे। कार्यक्रम की शुरूआत भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर की गई।
बौद्ध भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने कहा कि भगवान बुद्ध करुणा व मैत्री के सागर थे। उन्होंने कहा था घृणा को घृणा से नहीं बल्कि प्रेम से जीतना चाहिए। मनुष्य को धैर्यवान बनना चाहिए। उसे किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। डॉ. सुथेप महाथेरो ने कहा मनुष्य को संतोष से काम लेना चाहिए तथा स्वास्थ्य को बनाए रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध ने जात-पात के भेदभाव का विरोध किया। सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में इधर-उधर घूमे, कठोर तपस्या की और बाद में बोधगया पहुंचे। वहां एक वृक्ष के नीचे साधना करने बैठ गए। कठोर साधना करते हुए छह वर्षों बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तभी से वह बुद्ध कहलाने लगे। उन्होंने 25 वर्ष श्रावस्ती में बिताया। इसलिए श्रावस्ती का महत्व अधिक है।
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प्रकाश महाथेरो ने कहा कि संसार में दुख ही दुख है। दुख का कारण सांसारिक वस्तुओं के लिए इच्छा और कामना है। दुख से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को अष्ट मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा किसी को सताओ नहीं, सबसे प्रेम और भाईचारे का व्यवहार करो, दूसरों की भलाई करो, मन को स्वच्छ रखो, धैर्य से काम करो, किसी का अपमान मत करो, जात पात को मत अपनाओ।
कार्यक्रम को भिक्षु देवेंद्र ने भी संबोधित किया। सम्मेलन में कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, जौनपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर, दिल्ली के साथ ही श्रीलंका, थाईलैंड, तिब्बत, भूटान के बौद्ध भिक्षु के साथ ही अशोक कुमार बौद्ध, पवन कुमार सिंह बौद्ध, नीलम अंबेडकर, जनार्दन राजभर, शिव शंकर गौतम आदि मौजूद रहे।
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बौद्ध भिक्षु श्रद्धालोक महाथेरो ने कहा कि भगवान बुद्ध करुणा व मैत्री के सागर थे। उन्होंने कहा था घृणा को घृणा से नहीं बल्कि प्रेम से जीतना चाहिए। मनुष्य को धैर्यवान बनना चाहिए। उसे किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। डॉ. सुथेप महाथेरो ने कहा मनुष्य को संतोष से काम लेना चाहिए तथा स्वास्थ्य को बनाए रखना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध ने जात-पात के भेदभाव का विरोध किया। सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में इधर-उधर घूमे, कठोर तपस्या की और बाद में बोधगया पहुंचे। वहां एक वृक्ष के नीचे साधना करने बैठ गए। कठोर साधना करते हुए छह वर्षों बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। तभी से वह बुद्ध कहलाने लगे। उन्होंने 25 वर्ष श्रावस्ती में बिताया। इसलिए श्रावस्ती का महत्व अधिक है।
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प्रकाश महाथेरो ने कहा कि संसार में दुख ही दुख है। दुख का कारण सांसारिक वस्तुओं के लिए इच्छा और कामना है। दुख से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को अष्ट मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा किसी को सताओ नहीं, सबसे प्रेम और भाईचारे का व्यवहार करो, दूसरों की भलाई करो, मन को स्वच्छ रखो, धैर्य से काम करो, किसी का अपमान मत करो, जात पात को मत अपनाओ।
कार्यक्रम को भिक्षु देवेंद्र ने भी संबोधित किया। सम्मेलन में कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, जौनपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर, दिल्ली के साथ ही श्रीलंका, थाईलैंड, तिब्बत, भूटान के बौद्ध भिक्षु के साथ ही अशोक कुमार बौद्ध, पवन कुमार सिंह बौद्ध, नीलम अंबेडकर, जनार्दन राजभर, शिव शंकर गौतम आदि मौजूद रहे।