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स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है 10 हजार खर्च
ब्यूरो, अमर उजाला/शामली।
Updated Tue, 17 Apr 2018 12:36 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। जिलाधिकारी इंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि स्कूलो चलो अभियान को असली सफलता तब मिलेगी, जब परिषदीय विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक खुद में सुधार करें और अभिभावकों में ऐसा भरोसा कायम करें कि उनके बच्चों को सरकारी स्कूल में बेहतर शिक्षा मिल रही है।
सोमवार को कलक्ट्रेट में स्कूल चलो अभियान की समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक शिक्षिकाओं का वेतन सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों से बहुत कम है, फिर भी अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ज्यादा पढ़ाते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को ड्रेस, बैग, जूते-जुराब और मिड डे मील तक मिलता है तथा पब्लिक स्कूलों की तरह फीस भी नहीं ली जाती है।
सरकारी स्कूल के अध्यापक के वेतन और अन्य खर्च का आंकलन करें, तो सरकारी स्कूल के एक बच्चे पर करीब 10 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च होता है, लेकिन फिर भी पब्लिक स्कूलों की अपेक्षा सरकारी स्कूलों में बच्चों के कम नामांकन होना कई सवाल खड़े करता है। इससे स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों पर अभिभावकों को उतना भरोसा नहीं है। इसलिए जरूरी है कि अध्यापक खुद में सुधार करें। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने में गंभीरता बरतें तथा संकल्प लें कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को संस्कारवान तथा शिक्षा में अग्रणी बनाएंगे। जिले में बहुत से ऐसे सरकारी स्कूल भी हैं, जिनमें पढ़ाने वाले अध्यापकों ने अच्छे प्रयास करके स्कूल का नाम रोशन किया है, ऐसे अध्यापकों से अन्य को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।
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चेतावनी दी कि यदि इस कार्य में अध्यापक अध्यापिका गंभीरता नहीं लाएंगे और स्कूलों में बच्चों के नामांकन कम होंगे, तो उन्हें स्थानांतरित कर ऐसे विद्यालयों में भेज दिया जाएगा जहां बच्चों की संख्या ज्यादा है। अंग्रेजी माध्यम से चयनित विद्यालयों में जल्दी ही फर्नीचर की व्यवस्था कराई जाएगी।
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सोमवार को कलक्ट्रेट में स्कूल चलो अभियान की समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक शिक्षिकाओं का वेतन सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों से बहुत कम है, फिर भी अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ज्यादा पढ़ाते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को ड्रेस, बैग, जूते-जुराब और मिड डे मील तक मिलता है तथा पब्लिक स्कूलों की तरह फीस भी नहीं ली जाती है।
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सरकारी स्कूल के अध्यापक के वेतन और अन्य खर्च का आंकलन करें, तो सरकारी स्कूल के एक बच्चे पर करीब 10 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च होता है, लेकिन फिर भी पब्लिक स्कूलों की अपेक्षा सरकारी स्कूलों में बच्चों के कम नामांकन होना कई सवाल खड़े करता है। इससे स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों पर अभिभावकों को उतना भरोसा नहीं है। इसलिए जरूरी है कि अध्यापक खुद में सुधार करें। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने में गंभीरता बरतें तथा संकल्प लें कि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को संस्कारवान तथा शिक्षा में अग्रणी बनाएंगे। जिले में बहुत से ऐसे सरकारी स्कूल भी हैं, जिनमें पढ़ाने वाले अध्यापकों ने अच्छे प्रयास करके स्कूल का नाम रोशन किया है, ऐसे अध्यापकों से अन्य को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।
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चेतावनी दी कि यदि इस कार्य में अध्यापक अध्यापिका गंभीरता नहीं लाएंगे और स्कूलों में बच्चों के नामांकन कम होंगे, तो उन्हें स्थानांतरित कर ऐसे विद्यालयों में भेज दिया जाएगा जहां बच्चों की संख्या ज्यादा है। अंग्रेजी माध्यम से चयनित विद्यालयों में जल्दी ही फर्नीचर की व्यवस्था कराई जाएगी।