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रामलीला मंचन जीने का तरीका सिखाती है, बढ़ता है ज्ञान
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जलालाबाद। करीब पिछले 150 वर्षों से कस्बे में रामलीला का मंचन होता आ रहा है। पहले कस्बे के साथ देहात क्षेत्र के कई गांवों के ग्रामीण रामलीला मंचन देखने के लिए बैलगाड़ी और पैदल आते थे।
रामलीला कस्बे के मोती बाजार स्थित रामलीला भवन पर होती थी। बाजार में सड़क व दुकानों के बड़े-बड़े चबूतरे, छतों पर महिलाएं बैठकर रामलीला का आनंद लेती थीं। रात्रि 8:00 बजे से रात्रि दो से तीन बजे तक रामलीला चलती थी, उस समय बिना माइक के रामलीला होती थी। दर्शक अपने घरों से चादर, टाट के बोरे लाकर बिछा लेते थे। अब समिति बैठने के लिए दरें बिछवाती। रामलीला में आए बुजुर्ग और महिलाओं का कहना है कि रामलीला मंचन देखने से भगवान के प्रति श्रद्धा भक्ति के साथ ज्ञान बढ़ता है और मनुष्य के जीवन को जीने की शिक्षा मिलती है।
कस्बे के मोहल्ला दरबार निवासी 70 वर्षीय बाबूराम नायक ने बताया कि वह पिछले 55 वर्षों से नियमित रूप से रामलीला देखते हुए चले आ रहे हैं, परिवार साथ में रहता है। इसके अलावा मोहल्ला गंगा आर्य नगर निवासी 90 वर्षीय रामदत्त आहूजा ने बताया कि वह रामलीला देखने के साथ कई साल तक रामलीला में राम, सीता, मंदोदरी, कौशल्या, तारा, शबरी, विश्वामित्र, गुरु वशिष्ठ आदि की भूमिका निभाते आ रहे हैं। आज भी रामलीला में देखने जाते हैं और मौका मिलता है तो भूमिका भी निभाते हैं। प्रताप नगर निवासी 85 वर्षीय राधेश्याम बजाज का कहना है कि वह पिछले 50 वर्षों से रामलीला देखते आ रहे हैं। मुझे आज भी ज्ञान भक्ति श्रद्धा की प्राप्ति होती है।
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50 वर्षीय श्यामलाल कश्यप ने बताया कि पिता पलटू राम के साथ रामलीला देखने जाता था, तो मुझे रिहर्सल में सुग्रीव की भूमिका हेतु अभिनय के लिए चुना गया था। तब से लगातार में रावण, सुग्रीव, मंत्रा, नारद आदि की भूमिका निभाता आ रहा हूं और प्रतिदिन परिवार के साथ रामलीला को देखता हूं। आर्य नगर निवासी 80 वर्षीय चरण लाल बजाज का कहना है कि बचपन से रामलीला से जुड़ा हूं। मैंने हनुमान, केवट, सुतीक्षण आदि की भूमिका निभाई है। 75 वर्षीय लाला महेंद्र कुमार क्षेत्र के प्रसिद्ध हलवाई है। उनका कहना है कि उनके पिताजी स्वर्गीय लच्छीराम नकलची नताखटिया की भूमिका निभाते थे तो हम भी तभी से रामलीला देख कर चले आ रहे हैं। मनोरंजन के साथ भक्ति भाव श्रद्धा की भावना रहती है।
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रामलीला कस्बे के मोती बाजार स्थित रामलीला भवन पर होती थी। बाजार में सड़क व दुकानों के बड़े-बड़े चबूतरे, छतों पर महिलाएं बैठकर रामलीला का आनंद लेती थीं। रात्रि 8:00 बजे से रात्रि दो से तीन बजे तक रामलीला चलती थी, उस समय बिना माइक के रामलीला होती थी। दर्शक अपने घरों से चादर, टाट के बोरे लाकर बिछा लेते थे। अब समिति बैठने के लिए दरें बिछवाती। रामलीला में आए बुजुर्ग और महिलाओं का कहना है कि रामलीला मंचन देखने से भगवान के प्रति श्रद्धा भक्ति के साथ ज्ञान बढ़ता है और मनुष्य के जीवन को जीने की शिक्षा मिलती है।
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कस्बे के मोहल्ला दरबार निवासी 70 वर्षीय बाबूराम नायक ने बताया कि वह पिछले 55 वर्षों से नियमित रूप से रामलीला देखते हुए चले आ रहे हैं, परिवार साथ में रहता है। इसके अलावा मोहल्ला गंगा आर्य नगर निवासी 90 वर्षीय रामदत्त आहूजा ने बताया कि वह रामलीला देखने के साथ कई साल तक रामलीला में राम, सीता, मंदोदरी, कौशल्या, तारा, शबरी, विश्वामित्र, गुरु वशिष्ठ आदि की भूमिका निभाते आ रहे हैं। आज भी रामलीला में देखने जाते हैं और मौका मिलता है तो भूमिका भी निभाते हैं। प्रताप नगर निवासी 85 वर्षीय राधेश्याम बजाज का कहना है कि वह पिछले 50 वर्षों से रामलीला देखते आ रहे हैं। मुझे आज भी ज्ञान भक्ति श्रद्धा की प्राप्ति होती है।
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50 वर्षीय श्यामलाल कश्यप ने बताया कि पिता पलटू राम के साथ रामलीला देखने जाता था, तो मुझे रिहर्सल में सुग्रीव की भूमिका हेतु अभिनय के लिए चुना गया था। तब से लगातार में रावण, सुग्रीव, मंत्रा, नारद आदि की भूमिका निभाता आ रहा हूं और प्रतिदिन परिवार के साथ रामलीला को देखता हूं। आर्य नगर निवासी 80 वर्षीय चरण लाल बजाज का कहना है कि बचपन से रामलीला से जुड़ा हूं। मैंने हनुमान, केवट, सुतीक्षण आदि की भूमिका निभाई है। 75 वर्षीय लाला महेंद्र कुमार क्षेत्र के प्रसिद्ध हलवाई है। उनका कहना है कि उनके पिताजी स्वर्गीय लच्छीराम नकलची नताखटिया की भूमिका निभाते थे तो हम भी तभी से रामलीला देख कर चले आ रहे हैं। मनोरंजन के साथ भक्ति भाव श्रद्धा की भावना रहती है।