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नवाब तालाब सिर्फ बचा नाम, फैला गंदगी का साम्रराज्य
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कैराना में मुगलकालीन नवाब तालाब का महल बना खंडहर।
- फोटो : SHAMLI
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कैराना। दानवीर राजा कर्ण की बसाई नगरी कैराना में इतिहास की धरोहर मुगलकालीन नवाब तालाब आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। तालाब का अस्तित्व ही विलुप्त होने के कगार पर है। तालाब में घास उगी है और चारों ओर गंदगी का साम्राज्य है।
दानवीर राजा कर्ण की बसाई धर्म नगरी कैराना में पानीपत-खटीमा मार्ग से 200 मीटर अंदर प्राचीन नवाब तालाब है। मुगल सम्राट जहांगीर के समय में 16वीं शताब्दी में करीब 140 बीघा जमीन पर बनाया गया नवाब तालाब अब बदहाल है।
चार साल पहले तक नवाब तालाब में बेशक गंदा पानी ही था, लेकिन आज यह पूरी तरह सूख चुका है। तालाब में घास और झाड़ियां उगी हैं। तालाब में जिधर देखो उधर ही केवल गंदगी दिखाई देती है। तालाब की गंदगी पर आवारा पशु विचरण करते है। तालाब के पश्चिम छौर पर बना महल आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। हालात यह हो गए कि आने वाले समय में नवाब तालाब का केवल किताबों में ही नाम रह जाए।
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मुगलकालीन नवाब तालाब का इतिहास
सम्राट अकबर की मौत के बाद 1605 में मुगल सम्राट जहांगीर ने शासन की बागडोर संभाली थी। क्षेत्र के बडे़ बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले नवाब तालाब साफ पानी से भरा रहता था। यमुना नदी से साफ पानी नवाब तालाब तक आता था। तालाब के किनारे भव्य बगीचा था और पश्चिम में महल बना था, जो आज खंडहर हो चुका है। यहां दूर-दूर से सैलानी आते थे। तालाब के बीच 22 गज का चबूतरा था, जिसे सुफफा-ए-माहताबी कहा जाता था। सम्राट जहांगीर ने अपनी आत्म कथा तुजुक-ए-जहांगीर में लिखा कि उन्होंने कुछ दिन कैराना में बिताए थे। कैराना में हकीम मुकर्रब खान के इलाज से खुश होकर उसे नवाब की उपाधि दे दी और उन्हें नवाब तालाब बनाने के लिए जमीन व धन दिया था। 16वीं शताब्दी में हकीम से नवाब बने मुकर्रब खान ने नवाब तालाब को निर्माण कराया था, जो आज सिर्फ नाम से ही जाना जाता है। अस्तित्व तो खत्म हो चुका है।
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बाबू हुकुम सिंह ने नवाब तालाब के सुंदरीकरण का उठाया था बीड़ा
कैराना। दिवंगत सांसद बाबू हुकुम सिंह ने नवाब तालाब के सुंदरीकरण का बीड़ा उठाया था। बाबू हुकुम सिंह के प्रयासों से 2014 में तत्कालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह ने नवाब तालाब का निरीक्षण किया था। उन्होंने नवाब तालाब के सुंदरीकरण के लिए शासन का प्रस्ताव भी भेजा था, लेकिन सपा शासन में उनका प्रयास सिरे नहीं चढ़ सका। 2017 में सूबे में भाजपा सरकार आई, तो उन्होंने अपने प्रयास फिर से तेज कर दिए, लेकिन इसी बीच फरवरी 2018 में बाबू हुकुम सिंह दुनिया को अलविदा कह गए और उनका नवाब तालाब के सुंदरीकरण का प्रयास केवल कागजों में ही सिमट कर रह गया।
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दानवीर राजा कर्ण की बसाई धर्म नगरी कैराना में पानीपत-खटीमा मार्ग से 200 मीटर अंदर प्राचीन नवाब तालाब है। मुगल सम्राट जहांगीर के समय में 16वीं शताब्दी में करीब 140 बीघा जमीन पर बनाया गया नवाब तालाब अब बदहाल है।
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चार साल पहले तक नवाब तालाब में बेशक गंदा पानी ही था, लेकिन आज यह पूरी तरह सूख चुका है। तालाब में घास और झाड़ियां उगी हैं। तालाब में जिधर देखो उधर ही केवल गंदगी दिखाई देती है। तालाब की गंदगी पर आवारा पशु विचरण करते है। तालाब के पश्चिम छौर पर बना महल आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। हालात यह हो गए कि आने वाले समय में नवाब तालाब का केवल किताबों में ही नाम रह जाए।
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मुगलकालीन नवाब तालाब का इतिहास
सम्राट अकबर की मौत के बाद 1605 में मुगल सम्राट जहांगीर ने शासन की बागडोर संभाली थी। क्षेत्र के बडे़ बुजुर्ग बताते हैं कि कई दशक पहले नवाब तालाब साफ पानी से भरा रहता था। यमुना नदी से साफ पानी नवाब तालाब तक आता था। तालाब के किनारे भव्य बगीचा था और पश्चिम में महल बना था, जो आज खंडहर हो चुका है। यहां दूर-दूर से सैलानी आते थे। तालाब के बीच 22 गज का चबूतरा था, जिसे सुफफा-ए-माहताबी कहा जाता था। सम्राट जहांगीर ने अपनी आत्म कथा तुजुक-ए-जहांगीर में लिखा कि उन्होंने कुछ दिन कैराना में बिताए थे। कैराना में हकीम मुकर्रब खान के इलाज से खुश होकर उसे नवाब की उपाधि दे दी और उन्हें नवाब तालाब बनाने के लिए जमीन व धन दिया था। 16वीं शताब्दी में हकीम से नवाब बने मुकर्रब खान ने नवाब तालाब को निर्माण कराया था, जो आज सिर्फ नाम से ही जाना जाता है। अस्तित्व तो खत्म हो चुका है।
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बाबू हुकुम सिंह ने नवाब तालाब के सुंदरीकरण का उठाया था बीड़ा
कैराना। दिवंगत सांसद बाबू हुकुम सिंह ने नवाब तालाब के सुंदरीकरण का बीड़ा उठाया था। बाबू हुकुम सिंह के प्रयासों से 2014 में तत्कालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह ने नवाब तालाब का निरीक्षण किया था। उन्होंने नवाब तालाब के सुंदरीकरण के लिए शासन का प्रस्ताव भी भेजा था, लेकिन सपा शासन में उनका प्रयास सिरे नहीं चढ़ सका। 2017 में सूबे में भाजपा सरकार आई, तो उन्होंने अपने प्रयास फिर से तेज कर दिए, लेकिन इसी बीच फरवरी 2018 में बाबू हुकुम सिंह दुनिया को अलविदा कह गए और उनका नवाब तालाब के सुंदरीकरण का प्रयास केवल कागजों में ही सिमट कर रह गया।