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मोहर्रम पर किया गया मजलिसों का आयोजन
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संवाद न्यूज एजेंसी
कैराना। मोहर्रम पर इमाम बारगाह व अजाखानों में मजलिस का आयोजन किया गया। इस दौरान शिया समुदाय के लोगों ने पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद कर शोक मनाया।
मोहर्रम का चांद नजर आते ही कैराना की इमामबारगाहों व अजाखानों में मजलिसों का आयोजन किया गया। शनिवार रात करीब 10 बजे नगर के बड़े इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन कुरान पाक की तिलावत से मोहम्मद माहिर हुसैन ने किया। सोजखानी कुर्रत मेहंदी, हैदर तथा मोहम्मद अफजल ने की। मजलिस में आजमगढ़ से तशरीफ लाए मौलाना जावेद नजफी ने खिताब करते हुए कहा कि माहे मोहर्रम गम का महीना हैं। जिसमें रसूले मकबूल के नवासे इमाम हुसैन को कर्बला में भूखा व प्यासा शहीद किया।
दूसरी मजलिस रविवार सुबह 10 बजे रजा अली खां के अजाखाने में आयोजित की गई। जिसमें मुदस्सिर जैदी ने हमनवां के साथ मरसिया पढ़ा तथा मौलाना रजी बिस्वानी ने खिताब करते हुए कहा कि कर्बला की जंग हक और बातिल के दरमियान थी। हुसैन हक पर थे। जो दीने इस्लाम बचाना चाहते थे, लेकिन यजीदी लश्कर ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में 1400 साल पहले उनके घर वालों के साथ शहीद कर दिया था। इमाम हुसैन ने अपनी शहादत से पूरी दुनिया को यह पैगाम दिया था कि कभी भी जुल्म के सामने सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। इसी वजह से हम हर बरस इमाम हुसैन का गम मनाते हैं। मोहर्रम में काला लिबास पहना जाता है। काला कपड़ा गम की अलामत है। इसलिए मोहर्रम के दौरान शिया समुदाय के लोग इमाम हुसैन के गम में काले कपड़े पहनते हैं।
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उन्होंने बताया कि मुहर्रम महीने के शुरू के 10 दिन को आशरा ए मोहर्रम कहा जाता है। हजरत इमाम हुसैन की शहादत मोहर्रम की दसवीं तारीख को हुई है। इसलिए एक मोहर्रम से लेकर 10 मोहर्रम तक मातम मजलिस व जुलूस का सिलसिला जारी रहता है। हमें इमाम की कुर्बानी से सबक लेना चाहिए। वसी हैदर साकी ने मजलिस का संचालन किया। फैसल अली व बाकर ने नोहेखानी की। इस अवसर पर मुतवल्ली काजिम हुसैन, रजा अली खां, कौसर जैदी, अली हैदर जैदी, मोहम्मद अली, सरवर हुसैन, हाजी शाहिद हुसैन, जावेद रजा, रजी हैदर, शबाब हैदर, शादाब हैदर, मोहम्मद मेहंदी, जाफर अब्बास, शारिक अली, जमाल हैदर हुसैन आदि मौजूद रहे।
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कैराना। मोहर्रम पर इमाम बारगाह व अजाखानों में मजलिस का आयोजन किया गया। इस दौरान शिया समुदाय के लोगों ने पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद कर शोक मनाया।
मोहर्रम का चांद नजर आते ही कैराना की इमामबारगाहों व अजाखानों में मजलिसों का आयोजन किया गया। शनिवार रात करीब 10 बजे नगर के बड़े इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन कुरान पाक की तिलावत से मोहम्मद माहिर हुसैन ने किया। सोजखानी कुर्रत मेहंदी, हैदर तथा मोहम्मद अफजल ने की। मजलिस में आजमगढ़ से तशरीफ लाए मौलाना जावेद नजफी ने खिताब करते हुए कहा कि माहे मोहर्रम गम का महीना हैं। जिसमें रसूले मकबूल के नवासे इमाम हुसैन को कर्बला में भूखा व प्यासा शहीद किया।
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दूसरी मजलिस रविवार सुबह 10 बजे रजा अली खां के अजाखाने में आयोजित की गई। जिसमें मुदस्सिर जैदी ने हमनवां के साथ मरसिया पढ़ा तथा मौलाना रजी बिस्वानी ने खिताब करते हुए कहा कि कर्बला की जंग हक और बातिल के दरमियान थी। हुसैन हक पर थे। जो दीने इस्लाम बचाना चाहते थे, लेकिन यजीदी लश्कर ने इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में 1400 साल पहले उनके घर वालों के साथ शहीद कर दिया था। इमाम हुसैन ने अपनी शहादत से पूरी दुनिया को यह पैगाम दिया था कि कभी भी जुल्म के सामने सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। इसी वजह से हम हर बरस इमाम हुसैन का गम मनाते हैं। मोहर्रम में काला लिबास पहना जाता है। काला कपड़ा गम की अलामत है। इसलिए मोहर्रम के दौरान शिया समुदाय के लोग इमाम हुसैन के गम में काले कपड़े पहनते हैं।
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उन्होंने बताया कि मुहर्रम महीने के शुरू के 10 दिन को आशरा ए मोहर्रम कहा जाता है। हजरत इमाम हुसैन की शहादत मोहर्रम की दसवीं तारीख को हुई है। इसलिए एक मोहर्रम से लेकर 10 मोहर्रम तक मातम मजलिस व जुलूस का सिलसिला जारी रहता है। हमें इमाम की कुर्बानी से सबक लेना चाहिए। वसी हैदर साकी ने मजलिस का संचालन किया। फैसल अली व बाकर ने नोहेखानी की। इस अवसर पर मुतवल्ली काजिम हुसैन, रजा अली खां, कौसर जैदी, अली हैदर जैदी, मोहम्मद अली, सरवर हुसैन, हाजी शाहिद हुसैन, जावेद रजा, रजी हैदर, शबाब हैदर, शादाब हैदर, मोहम्मद मेहंदी, जाफर अब्बास, शारिक अली, जमाल हैदर हुसैन आदि मौजूद रहे।