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बिना बताए पहुंच गए अयोध्या, गोलियों से बाल-बाल बचे

Sat, 01 Aug 2020 12:09 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 01 Aug 2020 12:09 AM IST
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Ayodhya reached without telling, narrowly escaped from bullets
शामलीे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में जिले के कई लोगों ने खूब संघर्ष किया। अब, जब राम मंदिर के शिलान्यास का दिन नजदीक है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। ऐसे ही श्रीराम भक्तों में शामिल हैं कस्बा बनत निवासी प्रमोद कुमार उर्फ प्रमोद पटवारी। 1990 में कारसेवकों पर हुई गोलीबारी में वे बाल-बाल बचे थे। इसके बावजूद 1992 में फिर घरवालों को बिना बताए अयोध्या पहुंच गए और विवादित ढांचा गिराए जाने के दौरान वहां मौजूद रहे। उस समय उनकी उम्र 22-23 वर्ष रही होगी।
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प्रमोद बताते हैं कि अयोध्या का पूरा वाक्या उनकी आंखों के सामने आज भी घूमता है। वह हजारों कारसेवकों के साथ सरयू में स्नान कर रहे थे। नदी पर बना पुल भी खचाखच भरा था। तभी ऊपर से गुजरते एक हेलीकॉप्टर से अंधाधुंध फायरिंग की गई। गोली लगने और कुचलने से न जाने कितने ही कारसेवकों की मौत हो गई। उन्हें मलैंडी गांव का एक पीएसी जवान खींचकर ले गया और अपने कैंप में छिपा दिया। पूरी रात संदूकों के बीच में सोमदत्त शर्मा व एक अन्य के साथ बैठे रहे। अगले दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तीन दिन जेल में रहने के बाद घर लौटे। करीब आठ दिन तक भूखे-प्यासे रहकर उन्होंने समय काटा। 1992 में जलालपुर में गोशाला के अध्यक्ष स्वामी भजनानंद (वर्तमान में शुकतीर्थ स्थित स्वामी भजनानंद आश्रम के संचालक) के साथ उन्हें भी कारसेवा में पहुंचने के लिए पत्र मिला। परिजनों को बिना बताए वे बिजनौर पहुंचे और ट्रेन से लखनऊ होते हुए अयोध्या चले गए। विवादित ढांचा गिराए जाने का पूरा वाक्या उन्होंने अपनी आंखों से देखा। करीब ढाई हजार लोग विवादित स्थल पर डटे हुए थे। चार घंटे के भीतर ही वहां सब कुछ हो गया। प्रमोद बताते हैं कि वहां से एक पत्थर लेकर आए थे। उसमें फारसी में कुछ लिखा था। अब वह उनके पास नहीं है। प्रमोद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के भी काफी नजदीक रहे। 1996 में शामली में आने पर पूर्व प्रधानमंत्री का उन्होंने स्वागत किया था। इसके अलावा भी उनसे मिलते रहते थे।
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