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Shahjahanpur News: मरीज की हालत गंभीर है... जान बचाना चाहते हो तो निजी अस्पताल लेकर चलो
Thu, 17 Apr 2025 12:28 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Thu, 17 Apr 2025 12:28 AM IST
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राजकीय मेडिकल कॉलेज के सामने खड़ीं निजी एंबुलेंस। संवाद
- फोटो : -जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड में भर्ती बच्चे। संवाद
शाहजहांपुर। आपके मरीज की हालत काफी गंभीर है। अगर उसकी जान बचाना चाहते हो तो सरकारी में ठीक इलाज नहीं मिलेगा। उसे निजी अस्पताल में लेकर चलो। ज्यादा देर की तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। कुछ इस तरह से गंभीर हाल में राजकीय मेडिकल काॅलेज रेफर किए गए मरीजों के तीमारदारों पर दबाव बनाया जा रहा है।
बताते हैं कि कमीशनखाेर ट्राॅमा सेंटर से नंबर लेकर परिचितों को काॅल करते हैं। इससे कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध लग रही है। 13 अप्रैल की देर रात खुटार क्षेत्र में हरिमोहन कार दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो गए। उन्हें पुलिस ने सीएचसी भेजा, जहां से उन्हें राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस से मेडिकल कॉलेज पहुंचने के बाद साथ में गए उनके परिचित के पास एक व्यक्ति ने काॅल की। उसने खुद के जिला अस्पताल से होने की बात कहते हुए घायल के परिजनों से बात कराने के लिए कहा। उनके भाई से फोन पर बात की।
उसने मरीज की हालत काफी गंभीर बताते हुए कहा कि तुरंत बरेली या लखनऊ रेफर करने की जरूरत है, जल्दी आ जाओ। कहा कि आधे घंटे में मरीज को लेकर वहां से निकल जाइए। इसके बाद एक एंबुलेंस के चालक ने भी फोन कर मरीज को तत्काल दूसरी जगह ले जाने का दबाव बनाया। उनसे यह तक कह दिया कि लगता है कि वे लोग अपने मरीज को बचाना ही नहीं चाहते हैं।
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वहीं, घायल के साथ आए व्यक्ति ने भाई को फोन करके बताया कि मरीज की हालत देखने में ठीक लग रही है, बातचीत भी कर रहा है। डॉक्टर के आने पर विचार-विमर्श कर कोई फैसला लेंगे। डॉक्टर ने मरीज को देखने के बाद कहा कि स्थिति इतनी खराब नहीं है कि रेफर किया जाए। प्राथमिक उपचार के बाद घायल को भर्ती कर लिया। घायल का मेल सर्जिकल वार्ड में इलाज चल रहा है और उसकी स्थिति ठीक है।
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शाहजहांपुर में नहीं हैं न्यूरो सर्जन
-घायल के भाई के पास एक निजी एंबुलेंस चालक ने फोन करके कहा कि पूरे शाहजहांपुर में कहीं न्यूरो सर्जन नहीं है। मरीज को बचाना है तो बरेली या लखनऊ लेकर चलो। कई फोन करने के बाद भी जब परिजनों के रेफर कराने का मन नहीं देखा तब जाकर फोन करने बंद किए।
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कमीशन का चलता है खेल
ट्राॅमा सेंटर के आसपास कई ऐसे लोग रहते हैं, जो निजी एंबुलेंस चालक के साथ सांठगांठ कर मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाने का काम करते हैं। वे खुद को जिला अस्पताल का कर्मचारी बताकर मरीज की हालत गंभीर बताते हुए भयभीत करने का प्रयास करते हैं। इसके बाद खुद ही निजी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं। आमतौर पर सरकारी सेवाओं पर कम भरोसा करने वाले लोग उनके झांसे में आ जाते हैं। सबसे ज्यादा बरेली के निजी अस्पतालों से सेटिंग होती है। मरीज के इलाज में खर्च होने वाली रकम से उन्हें हिस्सा भी पहुंचता है।
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कॉलेज प्रशासन अनभिज्ञ
राजकीय मेडिकल कॉलेज में हर समय गार्ड रहते हैं। पुलिस चौकी भी बनी हुई है। इसके बावजूद तमाम ऐसे लोग सक्रिय रहते हैं, जो लोगों को बरगलाकर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। इसकी भनक मेडिकल कॉलेज प्रशासन को न लगना हैरान करने वाली बात है। दिन में भीड़ रहती है, मगर रात के समय सिर्फ मरीज व तीमारदार ही रह जाते हैं। अधिकतर हादसे के गंभीर मामले रात में ही पहुंचते हैं। इसके बाद भी मरीज के तीमारदारों पर दबाव बनाने वालों पर कार्रवाई नहीं की जाती। इससे स्टाफ भी संदेह के दायरे में आता है।
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ऐसी कोई शिकायत आती है तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। अधिकतर मरीजों को लखनऊ के केजीएमयू रेफर किया जाता है। वहीं, बरेली में मानसिक अस्पताल के लिए भी रेफर किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर मरीज को सरकारी एंबुलेंस मुहैया कराई जाती है। निजी अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं दी जाती है।
डॉ. राजेश कुमार, प्राचार्य
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बताते हैं कि कमीशनखाेर ट्राॅमा सेंटर से नंबर लेकर परिचितों को काॅल करते हैं। इससे कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध लग रही है। 13 अप्रैल की देर रात खुटार क्षेत्र में हरिमोहन कार दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो गए। उन्हें पुलिस ने सीएचसी भेजा, जहां से उन्हें राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस से मेडिकल कॉलेज पहुंचने के बाद साथ में गए उनके परिचित के पास एक व्यक्ति ने काॅल की। उसने खुद के जिला अस्पताल से होने की बात कहते हुए घायल के परिजनों से बात कराने के लिए कहा। उनके भाई से फोन पर बात की।
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उसने मरीज की हालत काफी गंभीर बताते हुए कहा कि तुरंत बरेली या लखनऊ रेफर करने की जरूरत है, जल्दी आ जाओ। कहा कि आधे घंटे में मरीज को लेकर वहां से निकल जाइए। इसके बाद एक एंबुलेंस के चालक ने भी फोन कर मरीज को तत्काल दूसरी जगह ले जाने का दबाव बनाया। उनसे यह तक कह दिया कि लगता है कि वे लोग अपने मरीज को बचाना ही नहीं चाहते हैं।
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वहीं, घायल के साथ आए व्यक्ति ने भाई को फोन करके बताया कि मरीज की हालत देखने में ठीक लग रही है, बातचीत भी कर रहा है। डॉक्टर के आने पर विचार-विमर्श कर कोई फैसला लेंगे। डॉक्टर ने मरीज को देखने के बाद कहा कि स्थिति इतनी खराब नहीं है कि रेफर किया जाए। प्राथमिक उपचार के बाद घायल को भर्ती कर लिया। घायल का मेल सर्जिकल वार्ड में इलाज चल रहा है और उसकी स्थिति ठीक है।
शाहजहांपुर में नहीं हैं न्यूरो सर्जन
-घायल के भाई के पास एक निजी एंबुलेंस चालक ने फोन करके कहा कि पूरे शाहजहांपुर में कहीं न्यूरो सर्जन नहीं है। मरीज को बचाना है तो बरेली या लखनऊ लेकर चलो। कई फोन करने के बाद भी जब परिजनों के रेफर कराने का मन नहीं देखा तब जाकर फोन करने बंद किए।
कमीशन का चलता है खेल
ट्राॅमा सेंटर के आसपास कई ऐसे लोग रहते हैं, जो निजी एंबुलेंस चालक के साथ सांठगांठ कर मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाने का काम करते हैं। वे खुद को जिला अस्पताल का कर्मचारी बताकर मरीज की हालत गंभीर बताते हुए भयभीत करने का प्रयास करते हैं। इसके बाद खुद ही निजी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं। आमतौर पर सरकारी सेवाओं पर कम भरोसा करने वाले लोग उनके झांसे में आ जाते हैं। सबसे ज्यादा बरेली के निजी अस्पतालों से सेटिंग होती है। मरीज के इलाज में खर्च होने वाली रकम से उन्हें हिस्सा भी पहुंचता है।
कॉलेज प्रशासन अनभिज्ञ
राजकीय मेडिकल कॉलेज में हर समय गार्ड रहते हैं। पुलिस चौकी भी बनी हुई है। इसके बावजूद तमाम ऐसे लोग सक्रिय रहते हैं, जो लोगों को बरगलाकर निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। इसकी भनक मेडिकल कॉलेज प्रशासन को न लगना हैरान करने वाली बात है। दिन में भीड़ रहती है, मगर रात के समय सिर्फ मरीज व तीमारदार ही रह जाते हैं। अधिकतर हादसे के गंभीर मामले रात में ही पहुंचते हैं। इसके बाद भी मरीज के तीमारदारों पर दबाव बनाने वालों पर कार्रवाई नहीं की जाती। इससे स्टाफ भी संदेह के दायरे में आता है।
ऐसी कोई शिकायत आती है तो जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी। अधिकतर मरीजों को लखनऊ के केजीएमयू रेफर किया जाता है। वहीं, बरेली में मानसिक अस्पताल के लिए भी रेफर किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर मरीज को सरकारी एंबुलेंस मुहैया कराई जाती है। निजी अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं दी जाती है।
डॉ. राजेश कुमार, प्राचार्य