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हिंदू महासभा में सेठ जी और कांग्रेसी पं. नेहरू...पर मधुर रहे रिश्ते
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निर्भय चंद्र सेठ । संवाद
- फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। पं. नेहरू का शहीद नगरी शाहजहांपुर से गहरा नाता रहा है। वह दो बार शाहजहांपुर आए थे। पूर्व सांसद स्व. विशनचंद्र सेठ से उनके पारिवारिक संबंध रहे। खास यह कि विशनचंद्र सेठ सन् 38 में ही हिंदू महासभा में चले गए थे। बावजूद इसके नेहरू से उनके रिश्ते मधुर बने रहे। 14 नवंबर को उनकी जयंती पर स्व. विशनचंद्र सेठ के पुत्र निर्भय चंद्र सेठ ने सुनाए उनसे जुड़े संस्मरण।
भाजपा के वरिष्ठ नेता निर्भय चंद्र सेठ बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता स्व. विशनचंद्र सेठ के गहरे ताल्लुकात थे। छह फरवरी 1937 को जब पं. नेहरू चुनाव प्रचार के सिलसिले में शाहजहांपुर आए थे तो सिविल लाइंस स्थित उनके आवास पर रुके थे। कार से जिले के भ्रमण पर पं. नेहरू निकले थे। बताया जाता है कि तब नेहरू जी के लिए ब्रेड और बटर लखनऊ से मंगाया गया था। निर्भय चंद्र सेठ ने बताया कि 1938 में पिताजी कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा में शामिल हो गए थे। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू और विशनचंद्र सेठ के निजी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा था।
उस समय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह थी और व्यक्तिगत रिश्ते अपनी जगह पर। निर्भय चंद्र सेठ के मुताबिक 1952 में चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू फैक्टरी स्टेट मैदान में जनसभा को संबोधित करने आए थे। उस समय निर्भय चंद्र सेठ की उम्र महज 11 साल थी। प्रधानमंत्री ट्रेन से शाहजहांपुर पहुंचे थे। हजारों लोग उन्हें सुनने के लिए एकत्र हुए थे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि गोविंदगंज फाटक बंद करना पड़ा था। फाटक से वह तमाम सहपाठियों के साथ पैदल सभास्थल तक पहुंचे थे।
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पं. नेहरू ने क्या कहा, इतना तो याद नहीं, लेकिन यह जरूर स्मृति में है कि लोगों में उनका बहुत क्रेज था। लोग उन्हें सुनना चाहते थे। नेहरू जी 1957 में शाहजहांपुर-फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी दरबारी लाल शर्मा के लिए प्रचार करने आए थे। चुनाव में हिंदू महासभा के प्रत्याशी विशन चंद्र सेठ ने कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित कर दिया था। पं. नेहरू शाहजहांपुर की राजनीति में खासी दिलचस्पी और दखल रखते थे।
शाहजहांपुर से गुड़, सिरका और अचार मंगाते थे पं. नेहरू
निर्भय चंद्र सेठ बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू को पिता जी मां के हाथ का बना पांच-छह प्रकार का अचार, गुड़, सिरका आदि भेजा करते थे। इसे वह काफी पसंद करते थे। 60 के दशक में एक इंदिरा गांधी ने उन्हें पत्र भेजा था कि अचार खत्म हो गया है। पिता जी कह रहे हैं कि अचार भिजवा दें।
बेदार को मनाने आए थे नेहरू
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा ने बताया कि 1937 के विधानसभा चुनाव में बरेली-पीलीभीत-शाहजहांपुर-बदायूं एक ही विधानसभा सीट थी। यहां से कांग्रेस ने गोविंद वल्लभ पंत को प्रत्याशी बनाया था। हिंदू महासभा से भगवती सहाय बेदार प्रत्याशी थे। पं. नेहरू बेदार को मनाने आए थे कि वह पंत के खिलाफ चुनाव न लड़ें। मगर वह नहीं माने और पंत जी के खिलाफ चुनाव में उतर गए। गोविंद वल्लभ पंत 4910 वोट विजयी हुए, जबकि बेदार को सिर्फ 15 वोट मिले।
छात्र की आत्महत्या से आहत थे नेहरू जी
छह फरवरी 1937 में शाहजहांपुर आए पं. जवाहरलाल नेहरू ने टाउन हॉल में एक बैठक को संबोधित किया था। इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा ने बताया कि बैठक में मिशन स्कूल का एक छात्र जगतनारायण शर्मा भी पहुंचा था। यह बात पता चलने पर मिशन स्कूल के प्रिंसिपल रूफस चरन ने छात्र को बेंतों से पीटा। क्षुब्ध होकर जगतनारायण ने आत्महत्या कर ली थी।
यह समाचार पं. नेहरू तक पहुंचा तो उन्हें बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने 24 फरवरी को इलाहाबाद से एक वक्तव्य जारी किया ‘मुझे शाहजहांपुर से अत्यंत कष्टदायक समाचार मिला है। मिशन स्कूल के एक छात्र को सार्वजनिक रूप से बेतों से मारा गया, क्योंकि उसने मेरी बैठक में भाग लिया। बाद में उसने आत्महत्या कर ली।’ उन्होंने तानाशाही शिक्षा प्रणाली के खिलाफ भी रोष प्रकट किया था।
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भाजपा के वरिष्ठ नेता निर्भय चंद्र सेठ बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता स्व. विशनचंद्र सेठ के गहरे ताल्लुकात थे। छह फरवरी 1937 को जब पं. नेहरू चुनाव प्रचार के सिलसिले में शाहजहांपुर आए थे तो सिविल लाइंस स्थित उनके आवास पर रुके थे। कार से जिले के भ्रमण पर पं. नेहरू निकले थे। बताया जाता है कि तब नेहरू जी के लिए ब्रेड और बटर लखनऊ से मंगाया गया था। निर्भय चंद्र सेठ ने बताया कि 1938 में पिताजी कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा में शामिल हो गए थे। इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू और विशनचंद्र सेठ के निजी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा था।
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उस समय राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह थी और व्यक्तिगत रिश्ते अपनी जगह पर। निर्भय चंद्र सेठ के मुताबिक 1952 में चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू फैक्टरी स्टेट मैदान में जनसभा को संबोधित करने आए थे। उस समय निर्भय चंद्र सेठ की उम्र महज 11 साल थी। प्रधानमंत्री ट्रेन से शाहजहांपुर पहुंचे थे। हजारों लोग उन्हें सुनने के लिए एकत्र हुए थे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि गोविंदगंज फाटक बंद करना पड़ा था। फाटक से वह तमाम सहपाठियों के साथ पैदल सभास्थल तक पहुंचे थे।
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पं. नेहरू ने क्या कहा, इतना तो याद नहीं, लेकिन यह जरूर स्मृति में है कि लोगों में उनका बहुत क्रेज था। लोग उन्हें सुनना चाहते थे। नेहरू जी 1957 में शाहजहांपुर-फर्रुखाबाद संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी दरबारी लाल शर्मा के लिए प्रचार करने आए थे। चुनाव में हिंदू महासभा के प्रत्याशी विशन चंद्र सेठ ने कांग्रेस प्रत्याशी को पराजित कर दिया था। पं. नेहरू शाहजहांपुर की राजनीति में खासी दिलचस्पी और दखल रखते थे।
शाहजहांपुर से गुड़, सिरका और अचार मंगाते थे पं. नेहरू
निर्भय चंद्र सेठ बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू को पिता जी मां के हाथ का बना पांच-छह प्रकार का अचार, गुड़, सिरका आदि भेजा करते थे। इसे वह काफी पसंद करते थे। 60 के दशक में एक इंदिरा गांधी ने उन्हें पत्र भेजा था कि अचार खत्म हो गया है। पिता जी कह रहे हैं कि अचार भिजवा दें।
बेदार को मनाने आए थे नेहरू
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा ने बताया कि 1937 के विधानसभा चुनाव में बरेली-पीलीभीत-शाहजहांपुर-बदायूं एक ही विधानसभा सीट थी। यहां से कांग्रेस ने गोविंद वल्लभ पंत को प्रत्याशी बनाया था। हिंदू महासभा से भगवती सहाय बेदार प्रत्याशी थे। पं. नेहरू बेदार को मनाने आए थे कि वह पंत के खिलाफ चुनाव न लड़ें। मगर वह नहीं माने और पंत जी के खिलाफ चुनाव में उतर गए। गोविंद वल्लभ पंत 4910 वोट विजयी हुए, जबकि बेदार को सिर्फ 15 वोट मिले।
छात्र की आत्महत्या से आहत थे नेहरू जी
छह फरवरी 1937 में शाहजहांपुर आए पं. जवाहरलाल नेहरू ने टाउन हॉल में एक बैठक को संबोधित किया था। इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा ने बताया कि बैठक में मिशन स्कूल का एक छात्र जगतनारायण शर्मा भी पहुंचा था। यह बात पता चलने पर मिशन स्कूल के प्रिंसिपल रूफस चरन ने छात्र को बेंतों से पीटा। क्षुब्ध होकर जगतनारायण ने आत्महत्या कर ली थी।
यह समाचार पं. नेहरू तक पहुंचा तो उन्हें बहुत कष्ट हुआ। उन्होंने 24 फरवरी को इलाहाबाद से एक वक्तव्य जारी किया ‘मुझे शाहजहांपुर से अत्यंत कष्टदायक समाचार मिला है। मिशन स्कूल के एक छात्र को सार्वजनिक रूप से बेतों से मारा गया, क्योंकि उसने मेरी बैठक में भाग लिया। बाद में उसने आत्महत्या कर ली।’ उन्होंने तानाशाही शिक्षा प्रणाली के खिलाफ भी रोष प्रकट किया था।

नानक चंद्र मेहरोत्रा । संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR