{"_id":"6774429658c8f141ab03e796","slug":"narauthas-jhabar-is-no-longer-buzzing-with-foreign-birds-shahjahanpur-news-c-122-1-sbly1038-134644-2025-01-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shahjahanpur News: विदेशी पक्षियों से अब गुलजार नहीं हो रहा नरौठा का झाबर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shahjahanpur News: विदेशी पक्षियों से अब गुलजार नहीं हो रहा नरौठा का झाबर
Wed, 01 Jan 2025 12:44 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
Updated Wed, 01 Jan 2025 12:44 AM IST
विज्ञापन
खुटार के नरौठा झाबर के ऊपर उड़ता मेहमान पक्षी। संवाद
खुटार। गांव नरौठा देवीदास में झाबर की जमीन अब विदेशी पक्षियों से गुलजार नहीं हो रही है। शिकारियों की नजर पड़ने से मेहमान पक्षियों की संख्या अब यहां कम हो गई है। वन विभाग भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है।
पूरनपुर रोड के पास राजकीय मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र से मैलानी रोड के बीच लगभग 162.5 एकड़ में विशाल झाबर है। इसकी सीमाएं मुरादुपर, नरौठा, कुंइयां, लालपुर, गुरघिया को छूती हैं। कभी इस झाबर में पानी भरा रहता था, लेकिन बारिश कम होने और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने से अब यहां पानी बेहद कम रह गया है। जिन देशों में भीषण ठंड पड़ने लगती है, वहां के पक्षी यहां बड़े क्षेत्र में पानी भरे रहने और जलवायु अनुकूल होने के कारण चले आते थे।
स्थानीय लोग विदेशी मेहमान पक्षियों को मुर्गाबी, नकटा, टिकारी, बुड़ार, पड़रा, सिलही आदि बोलते हैं। ये पक्षी होली तक यहां रहते हैं, लेकिन बीते कुछ सालों में झाबर पर आने वाले मेहमान पक्षियों का लोग खाने के लिए शिकार करने लगे। धीरे-धीरे उन्हें यहां असुरक्षा का अहसास होने लगा। वहीं, झाबर के काफी क्षेत्र पर अवैध कब्जा होने और जलस्रोत सूखने से पानी भी कम हो गया है।
विज्ञापन
इस कारण दो-तीन साल से मेहमान पक्षियों की संख्या काफी घट गई। इस बार तो मेहमान पक्षी नाममात्र के ही आए हैं।
--
ऐसे करते हैं शिकार
आसपास के गांवों के कुछ लोग सुबह होते ही झाबर पहुंच जाते हैं। यह ऐसा समय होता है, जब पक्षी भी रातभर के भूखे होने से झाबर में घूमकर अपनी भूख मिटाते हैं। लोग घास और झाबर में खड़ी नरई के रंग से मिलती महीन प्लास्टिक की डोरी के फंदे बनाकर पानी के बीच लगा देते हैं।
जैसे ही पक्षी अपनी गर्दन फंदे में डालता है और आगे बढ़ता है, फंदा कस जाता है। इसके बाद पक्षी की जान निकल जाती है। दोपहर में शिकारी इन्हें पानी से उठा ले जाते हैं। फिर इन्हें गांवों में ले जाकर बेच देते हैं। एक पक्षी 150 से 300 रुपये में बिक जाता है। यह धंधा यहां सर्दी के हर सीजन में किया जाता है।
--
इन धाराओं में होती है कार्रवाई
अधिवक्ता सुधीर त्रिवेदी ने बताया कि विदेशी और प्रतिबंधित पक्षियों का शिकार करने वाले लोगों के खिलाफ वर्ल्ड लाइफ एक्ट 1972 के तहत धारा 52, 53 और 54 के तहत मुकदमा दर्ज होता है। करीब दो साल तक जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने का प्रावधान है। पांच साल तक की सजा हो सकती है।
--
पिछले वर्ष मिली थी जानकारी, पर पुष्टि नहीं
खुटार के रेंजर मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि गत वर्ष एक बार शिकार की जानकारी मिली थी, लेकिन जांच में पुष्टि नहीं हुई। विदेशी पक्षी पानी ज्यादा होने पर आते हैं। यहां पानी कम है। इस बार पीलीभीत के चूका बीच पर पक्षी ज्यादा पहुंच रहे हैं। खुटार क्षेत्र बफर जोन में आता है। अगर कोई शिकार करता है तो बरामद अवशेष जांच के लिए बरेली और देहरादून भेजे जाते हैं।
विज्ञापन
पूरनपुर रोड के पास राजकीय मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र से मैलानी रोड के बीच लगभग 162.5 एकड़ में विशाल झाबर है। इसकी सीमाएं मुरादुपर, नरौठा, कुंइयां, लालपुर, गुरघिया को छूती हैं। कभी इस झाबर में पानी भरा रहता था, लेकिन बारिश कम होने और प्राकृतिक जलस्रोत सूखने से अब यहां पानी बेहद कम रह गया है। जिन देशों में भीषण ठंड पड़ने लगती है, वहां के पक्षी यहां बड़े क्षेत्र में पानी भरे रहने और जलवायु अनुकूल होने के कारण चले आते थे।
विज्ञापन
स्थानीय लोग विदेशी मेहमान पक्षियों को मुर्गाबी, नकटा, टिकारी, बुड़ार, पड़रा, सिलही आदि बोलते हैं। ये पक्षी होली तक यहां रहते हैं, लेकिन बीते कुछ सालों में झाबर पर आने वाले मेहमान पक्षियों का लोग खाने के लिए शिकार करने लगे। धीरे-धीरे उन्हें यहां असुरक्षा का अहसास होने लगा। वहीं, झाबर के काफी क्षेत्र पर अवैध कब्जा होने और जलस्रोत सूखने से पानी भी कम हो गया है।
विज्ञापन
इस कारण दो-तीन साल से मेहमान पक्षियों की संख्या काफी घट गई। इस बार तो मेहमान पक्षी नाममात्र के ही आए हैं।
ऐसे करते हैं शिकार
आसपास के गांवों के कुछ लोग सुबह होते ही झाबर पहुंच जाते हैं। यह ऐसा समय होता है, जब पक्षी भी रातभर के भूखे होने से झाबर में घूमकर अपनी भूख मिटाते हैं। लोग घास और झाबर में खड़ी नरई के रंग से मिलती महीन प्लास्टिक की डोरी के फंदे बनाकर पानी के बीच लगा देते हैं।
जैसे ही पक्षी अपनी गर्दन फंदे में डालता है और आगे बढ़ता है, फंदा कस जाता है। इसके बाद पक्षी की जान निकल जाती है। दोपहर में शिकारी इन्हें पानी से उठा ले जाते हैं। फिर इन्हें गांवों में ले जाकर बेच देते हैं। एक पक्षी 150 से 300 रुपये में बिक जाता है। यह धंधा यहां सर्दी के हर सीजन में किया जाता है।
इन धाराओं में होती है कार्रवाई
अधिवक्ता सुधीर त्रिवेदी ने बताया कि विदेशी और प्रतिबंधित पक्षियों का शिकार करने वाले लोगों के खिलाफ वर्ल्ड लाइफ एक्ट 1972 के तहत धारा 52, 53 और 54 के तहत मुकदमा दर्ज होता है। करीब दो साल तक जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने का प्रावधान है। पांच साल तक की सजा हो सकती है।
पिछले वर्ष मिली थी जानकारी, पर पुष्टि नहीं
खुटार के रेंजर मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि गत वर्ष एक बार शिकार की जानकारी मिली थी, लेकिन जांच में पुष्टि नहीं हुई। विदेशी पक्षी पानी ज्यादा होने पर आते हैं। यहां पानी कम है। इस बार पीलीभीत के चूका बीच पर पक्षी ज्यादा पहुंच रहे हैं। खुटार क्षेत्र बफर जोन में आता है। अगर कोई शिकार करता है तो बरामद अवशेष जांच के लिए बरेली और देहरादून भेजे जाते हैं।

खुटार के नरौठा झाबर के ऊपर उड़ता मेहमान पक्षी। संवाद