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ये तरीके अपनाएं, रबी की फसल पर लगने वाले रोग से बचाएं
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Soil treatment protects Rabi crops from many diseases
सहारनपुर। यदि आप अपने खेतों में रबी की फसलों को भूमि जनित रोगों से बचाना चाहते हैं तो मृदा शोधन की तकनीक को अपनाएं। इससे एक ओर जहां रबी की फसल लहलहाएगी तो रोगों से भी फसलों की दूरी बनी रहेगी।
मृदा शोधन रबी फसलों को भूमि जनित कई रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। मिट्टी में पाए जाने वाले कई रोगों के विषाणु गेहूं में करनाल बंट एवं जड़ गलन और दलहनी फसलों मटर, चना मसूर आदि में बिल्ट आदि रोग कारक होते हैं। इसके चलते ही कृषि वैज्ञानिक किसानों को बुआई से पहले मृदा शोधन करने के लिए जागरूक कर रहे हैं।
स्वस्थ भूमि में ही फसलों का अच्छा उत्पादन होता है। इसके लिए किसानों को फसल की बुआई से पहले मृदा का शोधन करना चाहिए। बुआई से पहले भूमि शोधन नहीं होने से फसल में कई प्रकार के रोगों के लगने की आशंका रहती है। जिसका फसल उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर और कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि भूमि में कई रोगों के विषाणु रहते हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो न सिर्फ फसल पर लगने वाले कीटनाशकों की मात्रा बढ़ने से उसकी लागत बढ़ जाती है, वहीं फसल का उत्पादन भी प्रभावित होता है। केवीके प्रभारी ने बताया कि किसानों को पहली फसल के रोगग्रस्त अवशेषों को खेत से बाहर निकालकर उसे गड्ढे में डालकर उस पर मिट्टी डाल देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि सिर्फ मृदा शोधन करके ही फसल को कई रोगों से मुक्ति दिलाई जा सकती है। जिससे न सिर्फ फसल की लागत कम रहती है, वहीं उत्पादन भी बेहतर होता है।
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जैव कारकों से करें मृदा शोधन
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉक्टर आईके कुुशवाहा ने बताया कि मृदा शोधन के लिए ट्राइकोडर्मा, बिवेरिया बेसियाना, मेटाराइजियम और सूडोमोनास आदि जैव कारकों का प्रयोग मुफीद रहता है। किसानों को इन जैव कारकों की दो किलोग्राम मात्रा को 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर दो सप्ताह तक छाया में रख देना चाहिए। यह मात्रा एक एकड़ खेत के लिए पर्याप्त रहती है। इसको शाम के समय खेत में डालकर खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। ये जैव कारक खेत में फैलकर रोगों के विषाणुओं को नष्ट कर देते हैं। जिससे फसल का कई रोगों से बचाव हो सकता है।
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मृदा शोधन रबी फसलों को भूमि जनित कई रोगों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। मिट्टी में पाए जाने वाले कई रोगों के विषाणु गेहूं में करनाल बंट एवं जड़ गलन और दलहनी फसलों मटर, चना मसूर आदि में बिल्ट आदि रोग कारक होते हैं। इसके चलते ही कृषि वैज्ञानिक किसानों को बुआई से पहले मृदा शोधन करने के लिए जागरूक कर रहे हैं।
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स्वस्थ भूमि में ही फसलों का अच्छा उत्पादन होता है। इसके लिए किसानों को फसल की बुआई से पहले मृदा का शोधन करना चाहिए। बुआई से पहले भूमि शोधन नहीं होने से फसल में कई प्रकार के रोगों के लगने की आशंका रहती है। जिसका फसल उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर और कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि भूमि में कई रोगों के विषाणु रहते हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो न सिर्फ फसल पर लगने वाले कीटनाशकों की मात्रा बढ़ने से उसकी लागत बढ़ जाती है, वहीं फसल का उत्पादन भी प्रभावित होता है। केवीके प्रभारी ने बताया कि किसानों को पहली फसल के रोगग्रस्त अवशेषों को खेत से बाहर निकालकर उसे गड्ढे में डालकर उस पर मिट्टी डाल देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि सिर्फ मृदा शोधन करके ही फसल को कई रोगों से मुक्ति दिलाई जा सकती है। जिससे न सिर्फ फसल की लागत कम रहती है, वहीं उत्पादन भी बेहतर होता है।
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जैव कारकों से करें मृदा शोधन
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉक्टर आईके कुुशवाहा ने बताया कि मृदा शोधन के लिए ट्राइकोडर्मा, बिवेरिया बेसियाना, मेटाराइजियम और सूडोमोनास आदि जैव कारकों का प्रयोग मुफीद रहता है। किसानों को इन जैव कारकों की दो किलोग्राम मात्रा को 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर दो सप्ताह तक छाया में रख देना चाहिए। यह मात्रा एक एकड़ खेत के लिए पर्याप्त रहती है। इसको शाम के समय खेत में डालकर खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। ये जैव कारक खेत में फैलकर रोगों के विषाणुओं को नष्ट कर देते हैं। जिससे फसल का कई रोगों से बचाव हो सकता है।