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बीमार के लिए रोजा न रखने की छूट
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
Updated Wed, 22 Jun 2016 12:35 AM IST
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मोती मस्जिद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर में इमाम सहारनपुर कारी इसहाक़ गोरा अगुवाई में बनाई गई हेल्पलाइन पर कुछ ख़ास सवाल-जवाब।
सवाल : मिर्जापुर से शाहनावाज ने पूछा है कि उनका बेटा जाकिर जिसकी उम्र 25 वर्ष है, तक़रीबन एक साल से काफ़ी बीमार है, उसे डॉक्टर ने रोजा रखने को मना किया है, परंतु वह जबरदस्ती रोजा रखता है, ऐसे में शरीयत क्या कहती है?
जवाब : कोई व्यक्ति ज्यादा बीमार है रोजा रखने से रोग बढ़ने का ख़तरा रहता है और वह जबरदस्ती रोजा रखता है, ऐसा करना ग़लत है बल्कि शरीयत उसको सहूलत की इजाजत देती है कि वह रोजा न रखे, ठीक होने के बाद रोजे की कजा अदा करे।
सवाल : हारुन ने रामपुर स्टेट से मालूम किया कि उनके पिता जिनकी उम्र 51 वर्ष है। उन्हें नौकरी की वजह से सुबह से शाम तक काम में व्यस्त रहना पड़ता है, वे आराम भी नहीं कर सकते दिनभर काम-काज में सिर खपाते हैं। इधर से उधर माल रवाना करने में उन्हें भी माल उठाना रखना पड़ता है। इस सूरत में शरीयत रोजा छोड़ने की इजाजत देती है?
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जवाब : व्यस्तता तो हर एक को है, दुकानदार कारख़ाना का मालिक भी अपने दफ़्तर ओर कारोबारी अमूर की निगरानी में व्यस्त रहता है, नौकरी पेशे व्यक्ति को भी मशगुलियत रहती है, हर एक की मशगुलियत अलग-अलग तरह की है, कोई बहुत पहले घर आ जाता है और कोई जहां हो इफ्तार कर लेता है।
मगर ये तमाम मशगुलियतें रोजा रखने में जाइज नहीं होती। तमाम मुसलमान इस तरह के काम करते हुए तमाम रोजे रखते हैं और किसी की हालत का कोई अंदेशा भी नहीं होता। लिहाजा काम की मशगूललियत रोजे के लिए मानिए नहीं है।
सवाल : जोनपुर से इनाम ने पूछा कि मेरे पड़ोस की मस्जिद दो मंजिला है जिसने ऊपर नीचे अलग-अलग क़ुरान ए पाक तारावीह में सुने और सुनाये जा रहे हैं, लोगों को आपत्ति है कि ये ग़लत है, कारी साहब आप बताएं इस पर शरीयत का क्या हुकुम है?
जवाब : एक मस्जिद में दो हाफ़िज अलग-अलग नमाज ए तरावीह पढ़ा सकते हैं परंतु शर्त ये है कि एक दूसरे की आवाज न टकराए। बेहतर तरीक़ा यही है कि तमाम लोग एक ही हाफ़िज के पीछे नमाज ए तरावीह अदा करें।
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सवाल : मिर्जापुर से शाहनावाज ने पूछा है कि उनका बेटा जाकिर जिसकी उम्र 25 वर्ष है, तक़रीबन एक साल से काफ़ी बीमार है, उसे डॉक्टर ने रोजा रखने को मना किया है, परंतु वह जबरदस्ती रोजा रखता है, ऐसे में शरीयत क्या कहती है?
जवाब : कोई व्यक्ति ज्यादा बीमार है रोजा रखने से रोग बढ़ने का ख़तरा रहता है और वह जबरदस्ती रोजा रखता है, ऐसा करना ग़लत है बल्कि शरीयत उसको सहूलत की इजाजत देती है कि वह रोजा न रखे, ठीक होने के बाद रोजे की कजा अदा करे।
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सवाल : हारुन ने रामपुर स्टेट से मालूम किया कि उनके पिता जिनकी उम्र 51 वर्ष है। उन्हें नौकरी की वजह से सुबह से शाम तक काम में व्यस्त रहना पड़ता है, वे आराम भी नहीं कर सकते दिनभर काम-काज में सिर खपाते हैं। इधर से उधर माल रवाना करने में उन्हें भी माल उठाना रखना पड़ता है। इस सूरत में शरीयत रोजा छोड़ने की इजाजत देती है?
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जवाब : व्यस्तता तो हर एक को है, दुकानदार कारख़ाना का मालिक भी अपने दफ़्तर ओर कारोबारी अमूर की निगरानी में व्यस्त रहता है, नौकरी पेशे व्यक्ति को भी मशगुलियत रहती है, हर एक की मशगुलियत अलग-अलग तरह की है, कोई बहुत पहले घर आ जाता है और कोई जहां हो इफ्तार कर लेता है।
मगर ये तमाम मशगुलियतें रोजा रखने में जाइज नहीं होती। तमाम मुसलमान इस तरह के काम करते हुए तमाम रोजे रखते हैं और किसी की हालत का कोई अंदेशा भी नहीं होता। लिहाजा काम की मशगूललियत रोजे के लिए मानिए नहीं है।
सवाल : जोनपुर से इनाम ने पूछा कि मेरे पड़ोस की मस्जिद दो मंजिला है जिसने ऊपर नीचे अलग-अलग क़ुरान ए पाक तारावीह में सुने और सुनाये जा रहे हैं, लोगों को आपत्ति है कि ये ग़लत है, कारी साहब आप बताएं इस पर शरीयत का क्या हुकुम है?
जवाब : एक मस्जिद में दो हाफ़िज अलग-अलग नमाज ए तरावीह पढ़ा सकते हैं परंतु शर्त ये है कि एक दूसरे की आवाज न टकराए। बेहतर तरीक़ा यही है कि तमाम लोग एक ही हाफ़िज के पीछे नमाज ए तरावीह अदा करें।