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धान की फसल में दिखाई दे रहा निमेटोड कीट का प्रकोप
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निमेटोड से प्रभावित पौधे की जड़
- फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। जनपद में धान की फसल में निमेटोड कीट का प्रकोप दिखाई दे रहा है। निमेटोड (पादप सूत्रकृमि ) बेहद छोटे कीट होते हैं। इन्हें सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही देखा जा सकता है। ये कीट फसल की जड़ों से रस चूसकर कमजोर कर देते हैं। इससे प्रभावित पौधे भूमि से पोषक तत्व पूरी तरह से नहीं ले पाते। जिससे उनकी बढ़वार रुक जाती है और उत्पादकता प्रभावित होती है।
निमेटोड धान की खेती के लिए गंभीर समस्या बन चुका है। बेहद छोटे आकार का यह सूत्रकृमि मिट्टी में 14 महीने तक जीवित रह सकता है। धान के अलावा यह सूत्र कृमि सब्जी फसलें आदि को भी अपना शिकार बनाता है। इसकी पहचान इसके द्वारा जड़ों पर बनाई जाने की विशेष गांठ है। इस गांठ की बनावट हुक के आकार की होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं प्रोफेसर डॉक्टर इंद्र कुमार कुशवाहा ने बताया कि धान फसल में निमेटोड के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इससे प्रभावित धान की फसल के पौधे लेकर कई किसान अब तक कृषि विज्ञान केंद्र पहुंच रहे हैं। गांव देवला के किसान आसिफ, तिलक, गांव सराय के मेहरबान, बेहट के इरफान और तरुण आदि ने केवीके आकर इस पर नियंत्रण के लिए जानकारी हासिल की। इस कीट से प्रभावित धान की फसल में फुटाव में कमी, बालियों में बौनापन और दानों की संख्या में कमी आ जाती है। इससे बचाव के लिए नर्सरी में कार्बोफ्यूरान की 0.3 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से प्रयोग करना फायदेमंद रहता है। पौधरोपण के 10 दिन बाद कार्बोफ्यूरान एक किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर प्रयोग करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि खेत में ढेंचा को हरी खाद के रूप में प्रयोग करने पर भी इन सूत्र कृमियों की संख्या में कमी आती है। नीम की खली या सरसों की खली 225 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना भी मुफीद रहता है। जैविक नियंत्रण के लिए स्यूडोमोनास जीवाणु के घोल में 40 मिनट तक जड़ भिगोने से भी सूत्र कृमियों की संख्या और गांठों में कमी पाई गई है।
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निमेटोड धान की खेती के लिए गंभीर समस्या बन चुका है। बेहद छोटे आकार का यह सूत्रकृमि मिट्टी में 14 महीने तक जीवित रह सकता है। धान के अलावा यह सूत्र कृमि सब्जी फसलें आदि को भी अपना शिकार बनाता है। इसकी पहचान इसके द्वारा जड़ों पर बनाई जाने की विशेष गांठ है। इस गांठ की बनावट हुक के आकार की होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं प्रोफेसर डॉक्टर इंद्र कुमार कुशवाहा ने बताया कि धान फसल में निमेटोड के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इससे प्रभावित धान की फसल के पौधे लेकर कई किसान अब तक कृषि विज्ञान केंद्र पहुंच रहे हैं। गांव देवला के किसान आसिफ, तिलक, गांव सराय के मेहरबान, बेहट के इरफान और तरुण आदि ने केवीके आकर इस पर नियंत्रण के लिए जानकारी हासिल की। इस कीट से प्रभावित धान की फसल में फुटाव में कमी, बालियों में बौनापन और दानों की संख्या में कमी आ जाती है। इससे बचाव के लिए नर्सरी में कार्बोफ्यूरान की 0.3 ग्राम मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से प्रयोग करना फायदेमंद रहता है। पौधरोपण के 10 दिन बाद कार्बोफ्यूरान एक किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर प्रयोग करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि खेत में ढेंचा को हरी खाद के रूप में प्रयोग करने पर भी इन सूत्र कृमियों की संख्या में कमी आती है। नीम की खली या सरसों की खली 225 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना भी मुफीद रहता है। जैविक नियंत्रण के लिए स्यूडोमोनास जीवाणु के घोल में 40 मिनट तक जड़ भिगोने से भी सूत्र कृमियों की संख्या और गांठों में कमी पाई गई है।

निमेटोड से प्रभावित पौधे की जड़ का निरीक्षण करते कृषि अधिकारी- फोटो : SAHARANPUR
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