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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: मेहनत कर लिख दी सफलता की कहानी

Tue, 07 Mar 2023 08:52 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 07 Mar 2023 08:52 PM IST
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International Women's Day: Worked hard and wrote a success story
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार
- जनपद में कई महिलाओं ने विषम परिस्थितियों में हासिल की सफलता
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- कारोबार किया और दूसरों को भी रोजगार दिया, विभिन्न क्षेत्रों में पाया मुकाम
फोटो समाचार-20 की सीरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। आज की महिलाएं पुराने रीति रिवाजों और मिथकों को तोड़कर न सिर्फ आगे बढ़ रही हैं। बल्कि अपने दम पर सफलता की कहानी लिखीं। लोगों के लिए मिसाल कायम कर रही हैं। राह में मुश्किलें आईं, अपने और परायों ने ताने दिए, लेकिन उन सब को दरकिनार करते हुए अपने जज्बे, जुनून और जिद के चलते अपने कदम आगे बढ़ाती गईं। ऐसे तमाम उदाहरण दुनिया में हर जगह हैं। फिर भला सहारनपुर की नारियों के क्या कहने। यहां की महिलाओं ने अपनी तकदीर अपने दम पर लिखी। आइए जानते हैं उन महिलाओं के बारे में।
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--मूकबधिर बच्चों में नई उम्मीद जगा रही डॉ. रेखा कुमार
मूकबधिर बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है। आवश्यकता है तो बस उस प्रतिभा को पहचानने और निखारने की। चंद्रनगर निवासी डॉ. रेखा कुमार पिछले करीब 28 सालों से ऐसे बच्चों के लिए काम कर रही हैं। उनकी संकल्प नाम की संस्था है। इस संस्था के जरिए वह बच्चों के जीवन को सुधरने का प्रयास करती हैं। अपने 28 सालों के सफर में डॉ. रेखा कुमार सैकड़ों बच्चों का जीवन बदल चुकी हैं। उनके चेहरे पर मुस्कान ला चुकी हैं। बच्चों के अभिभावक जो कल तक यह समझते थे कि उनके बच्चे कुछ नहीं कर सकते, उनको आज विश्वास नहीं होता कि वह सब कुछ कर सकते हैं। संकल्प संस्था ने रास्ता दिखाया तो सोच बदली। साथ ही स्पेशल बच्चों का भी जीवन बदल गया।
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-पति की मौत पर नहीं हारी हिम्मत
गांव बढेड़ी कोली निवासी सुदेश शर्मा के पति सुभाष शर्मा का स्वर्गवास 1994 में हो गया था, लेकिन सुदेश शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उनका कहना है न तो उनके पास खेती की जमीन थी व न हीं रहने के लिए मकान था, लेकिन उन्होंने 16 साल महिला समाख्या में 600 रुपये की नौकरी की। उसके बाद प्राइवेट अस्पताल में नौकरी की साथ ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। बड़ा बेटा उस समय मात्र आठ वर्ष का था, उनसे एमएससी की पढ़ाई कराई। छोटे बेटे को बी-टेक कराया। उनका एक बेटा इंजीनियर और दूसरा जम्मू-कश्मीर में है। मकान बनाया और बेटों की शादी की।
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-विषम परिस्थितियों में तीन बेटियों के हाथ किए पीले
नागल निवासी आशा अरोड़ा ने विषम परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी। उनके पति सत्यदेव अरोड़ा की 2008 में मृत्यु हो गई थी। घर का खर्च कस्बे के मेन बाजार में परचून की दुकान से चलता था। पति की मौत के बाद दुखों का पहाड़ टूटा और ऐसा लगा कि अब परिवार का खर्च कैसे पूरा होगा, लेकिन आशा ने हिम्मत को बरकरार रखा। पति की मौत के बाद दुकान संभाली। दुकान से जो भी पैसा आता, उससे घर खर्च चलता है। यहीं नहीं उसने अपनी तीनों बेटियों के हाथ पीले किए। इस समय उनका बेटा ही दुकान को संभाल रहा है। उनके पास कोई जमीन नहीं है।

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-घर पर फिनाइल तैयार कर रही अलका
गांव रायपुर निवासी अलका देवी घर पर ही फिनाइल, गोनाइल, टॉयलेट, क्लीनर आदि को तैयार कर स्वयं ही बाजार में सप्लाई कर रहीं हैं। उन्होंने इस कार्य अपने संसाधनों से शुरू किया गया। इससे उनको अच्छी आय प्राप्त हो रही है। अलका देवी का कहना है कि इस काम को आगे और अधिक बढ़ाया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस:- डॉ. रेखा कुमार

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