{"_id":"5db489da8ebc3e018167420e","slug":"history-of-deepak-is-very-ancient-in-indian-culture-saharanpur-news-mrt4506286171","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारतीय संस्कृति में अति प्राचीन है दीपों का इतिहास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भारतीय संस्कृति में अति प्राचीन है दीपों का इतिहास
विज्ञापन
दीपक: सरसावा में मिला गुर्जर प्रतिहार वंश सभ्यता का दीपक
- फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। हम आज दीपों का पर्व दीपावली मना रहे हैं। भारतीय संस्कृति में दीपों का इतिहास अति प्राचीन है। महाभारत काल से जुड़ी जनपद की कई जगहों से विभिन्न सभ्यताओं के दीपक खोदाई में मिल चुके हैं, जो अपने आप में बताते हैं वक्त बदलने के साथ दीपकों रूप तो बदला, लेकिन दीपावली पर दीपों का महत्व कभी कम नहीं हुई। शास्त्रों में उल्लेख है कि बिना दीपक जलाए दीपावली का पूजन पूरा नहीं होता है।
जनपद में आठ से चार हजार साल पुराने सिंधु कालीन, उत्तर वैदिक काल, कुषाण काल और गुर्जर प्रतिहार वंश सभ्यता के दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण की खोदाई में मिल चुके हैं। विरासत यूनिवर्सिटी हैरीटेज रिसर्च सेंटर शोभित विश्वविद्यालय के कोआर्डिनेटर और संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से प्रकाशित पुस्तक हमारा सहारनपुर के लेखक राजीव उपाध्याय बताते हैं कि सहारनपुर-सरसावा के बीच सरसावा टीले के नजदीक दो किलोमीटर लंबी साइट में गुर्जर प्रतिहार वंश सभ्यता के एक हजार साल पुराने दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण में मिले थे। इसी तरह तीतरो क्षेत्र के गांव बरसी के नजदीक सिंधु कालीन सभ्यता के चार हजार साल पुराने मिट्टी के दीपक खोदाई में मिल चुुके हैं। इसी गांव में महाभारत कालीन श्री महादेव बरसी मंदिर है, जहां अपने आप में महाभारत से जुड़ी कई चीजों को संजोए हुए है। इसके अलावा जनपद से सटे जलालाबाद में कुषाणकाल, गंगोह और सरसावा टीले के नजदीक उत्तर वैदिक काल सभ्यता के दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण में जमीन से निकले थे। इससे साफ है कि दीपों का महत्व कभी कम नहीं हुआ है।
पत्थर के थे शुरूआती दीपक, समय के साथ बदला रूप
सहारनपुर। राजीव उपाध्याय बताते हैं कि दीपों का इतिहास अति प्राचीन है। सर्वेेक्षण में मिले प्रमाण से पता चला कि शुरूआत में दीपक पत्थर को तराशकर बनाए गए हैं, लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग सभ्यताओं में मिट्टी के दीपक बने हैं। जैसे हैंडिल वाले दीपक, गोल कटोरी नुमा दीपक और चोंचनुमा दीपक हैं। वर्तमान में चार मुंह और एक मुंह वाले दीपकों का चलन है।
विज्ञापन
कई मूर्तियां भी मिल चुकी हैं
सहारनपुर। पुरातत्व सर्वेक्षण में गांव कादरगढ़ में मां दुर्गा की 1500 साल पुरानी मूर्ति मिली थी। इसके अलावा कई जिले पुरातत्व सर्वेक्षण में महाभारत कालीन से जुड़े मिट्टी के बर्तन, नक्काशी वाली अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मिल चुकी हैं, जिसका उल्लेखन पुरातत्व विभाग के रिकार्ड में दर्ज है।
दीपक जलाने पर ही पूजन होता है संपन्न : रोहित
सहारनपुर। दीपावली की पूजा बिना दीपक जलाए पूरी नहीं मानी जाती हैं। ब्रह्मपुरी कॉलोनी स्थित श्री बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता और ज्योतिषाचार्य आचार्य रोहित वशिष्ठ बताते हैं भारतीय संस्कृति में दीपों का महत्व अति प्राचीन है। शास्त्रों में सतयुग और द्वापर युग में भी दीपों का उल्लेख है। बिना दीपक जलाए किसी भी देवी-देवता और दीपावली की पूजा पूरी नहीं हो सकती है। इसका शास्त्रों में भी उल्लेख है। मिट्टी के दीपक का महत्व अत्यधिक है। तेल और बत्ती युक्त दीपक जलाकर पूजन करना अति फलदायी है।
विज्ञापन
जनपद में आठ से चार हजार साल पुराने सिंधु कालीन, उत्तर वैदिक काल, कुषाण काल और गुर्जर प्रतिहार वंश सभ्यता के दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण की खोदाई में मिल चुके हैं। विरासत यूनिवर्सिटी हैरीटेज रिसर्च सेंटर शोभित विश्वविद्यालय के कोआर्डिनेटर और संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से प्रकाशित पुस्तक हमारा सहारनपुर के लेखक राजीव उपाध्याय बताते हैं कि सहारनपुर-सरसावा के बीच सरसावा टीले के नजदीक दो किलोमीटर लंबी साइट में गुर्जर प्रतिहार वंश सभ्यता के एक हजार साल पुराने दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण में मिले थे। इसी तरह तीतरो क्षेत्र के गांव बरसी के नजदीक सिंधु कालीन सभ्यता के चार हजार साल पुराने मिट्टी के दीपक खोदाई में मिल चुुके हैं। इसी गांव में महाभारत कालीन श्री महादेव बरसी मंदिर है, जहां अपने आप में महाभारत से जुड़ी कई चीजों को संजोए हुए है। इसके अलावा जनपद से सटे जलालाबाद में कुषाणकाल, गंगोह और सरसावा टीले के नजदीक उत्तर वैदिक काल सभ्यता के दीपक पुरातत्व सर्वेक्षण में जमीन से निकले थे। इससे साफ है कि दीपों का महत्व कभी कम नहीं हुआ है।
विज्ञापन
पत्थर के थे शुरूआती दीपक, समय के साथ बदला रूप
सहारनपुर। राजीव उपाध्याय बताते हैं कि दीपों का इतिहास अति प्राचीन है। सर्वेेक्षण में मिले प्रमाण से पता चला कि शुरूआत में दीपक पत्थर को तराशकर बनाए गए हैं, लेकिन धीरे-धीरे अलग-अलग सभ्यताओं में मिट्टी के दीपक बने हैं। जैसे हैंडिल वाले दीपक, गोल कटोरी नुमा दीपक और चोंचनुमा दीपक हैं। वर्तमान में चार मुंह और एक मुंह वाले दीपकों का चलन है।
विज्ञापन
कई मूर्तियां भी मिल चुकी हैं
सहारनपुर। पुरातत्व सर्वेक्षण में गांव कादरगढ़ में मां दुर्गा की 1500 साल पुरानी मूर्ति मिली थी। इसके अलावा कई जिले पुरातत्व सर्वेक्षण में महाभारत कालीन से जुड़े मिट्टी के बर्तन, नक्काशी वाली अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मिल चुकी हैं, जिसका उल्लेखन पुरातत्व विभाग के रिकार्ड में दर्ज है।
दीपक जलाने पर ही पूजन होता है संपन्न : रोहित
सहारनपुर। दीपावली की पूजा बिना दीपक जलाए पूरी नहीं मानी जाती हैं। ब्रह्मपुरी कॉलोनी स्थित श्री बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता और ज्योतिषाचार्य आचार्य रोहित वशिष्ठ बताते हैं भारतीय संस्कृति में दीपों का महत्व अति प्राचीन है। शास्त्रों में सतयुग और द्वापर युग में भी दीपों का उल्लेख है। बिना दीपक जलाए किसी भी देवी-देवता और दीपावली की पूजा पूरी नहीं हो सकती है। इसका शास्त्रों में भी उल्लेख है। मिट्टी के दीपक का महत्व अत्यधिक है। तेल और बत्ती युक्त दीपक जलाकर पूजन करना अति फलदायी है।