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शिवालिक के जंगलों में 18वीं सदी में भी मिले थे जीवाश्म

Sun, 21 Jun 2020 12:09 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 21 Jun 2020 12:09 AM IST
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Fossils were also found in the Shivalik forests in the 18th century
सहारनपुर के लेखक के इसी किताब में जीवाश्म सहित के बारे में दी गई है अहम जानकारियां। - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। 18 वीं सदी में एक अंग्रेज अधिकारी ने शिवालिक के जंगलों से जीवाश्मों की बड़ी खेप जुटाई थी। जीवाश्म पर बेहतरीन काम करने की वजह से उन्हें लंदन के सर्वोच्च पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। अंग्रेजी सरकार के इस अधिकारी ने कंपनी गार्डेन और जीवाश्मों पर सहारनपुर में रहकर दस वर्षों तक काम किया। सहारनपुर के शिवालिक के जंगलों से मिले लाखों साल पुराने जीवाश्म अब भी लंदन और स्कॉटलैंड की म्यूजियम में शोभा बढ़ा रहे हैं। एक पुस्तक ‘हमारा सहारनपुर’ में इस बात का जिक्र किया गया है। जिसे सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार ने मंजूरी दी है।
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सहारनपुर निवासी राजीव उपाध्याय यायावर समन्वयक विरासत यूनिवर्सिटी हेरीटेज सेंटर शोभित विवि गंगोह की पुस्तक से यह खुलासा हुआ है। ‘हमारा सहारनपुर’ नाम से लिखी गई पुस्तक में बेहद आश्चर्यचकित करने वाली जानकारी साझा की गई है। इसमें बताया गया है कि कंपनी गार्डेन में जीवाश्म विशेषज्ञ स्कॉटलैंड निवासी डॉ. फॉकनर 1832 से 42 तक उद्यान निदेशक रहे। वनस्पतियों में उनकी बेहद रुचि थी। शिवालिक के जंगलों पर वे अध्ययन और सर्वे करते रहते थे। अध्ययन और सर्वे के दौरान ही डॉ. फॉकनर ने बड़ी तादाद में जीवाश्मों की खोज की। जिसमें कछुआ, मगरमच्छ, लंगूर और कई स्तनपाई जीवों के हजारों साल पुराने जीवाश्म शामिल थे। किताब में इस बात का भी जिक्र है जब उन्हें ये जीवाश्म मिले तो उन्होंने दुनिया में प्रख्यात जीवाश्म विज्ञानी चार्ल्स डार्विन को पत्र लिखकर बातें साझा कीं। उनकी खोज पर मोहर लगाते हुए वॉलस्टन मेडल से 1837 में सम्मानित किया गया। किताब में जिक्र तो यहां तक है कि बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से वे लंदन चले गए। अपने साथ उद्यान से उत्पादित पौधों के बीज को सुखाकर हरबेरियम की करीब 70 पेटियां और जीवाश्म की करीब 40 पेटियां साथ ले गए।
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चाय पर चीन के एकाधिकार को खत्म किया
सहारनपुर । डॉ. फॉकनर जीवाश्मों के अलावा पौधों के भी बड़े जानकार थे। उस समय चाय पर चीन का एकाधिकार था। उन्होंने चीन के एकाधिकार को खत्म करने का बीड़ा उठाया। डॉ. गोवान और डॉ. रॉयली से चाय के पौधे को असम से सहारनपुर के कंपनी गार्डन मंगवाया। चाय के पौधों को विकसित किया गया, फिर डॉ. फॉकनर ने गढ़वाल और कुमाऊं की जलवायु के लिहाज से पहाड़ियों पर चाय की खेती को तकनीक से फैलाया।
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ऐतिहासिक शोध और अध्ययन का गवाह पृष्ठ पर कंपनी गार्डेन की स्थापना से लेकर जीवाश्म सहित कई महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। डॉ. फॉकनर पर ये अहम जानकारी कंपनी गार्डेन में रखी किताबों से भी मिलता है। जीवाश्मों को लेकर वाकई में यदि शिवालिक की जंगलों में सर्वे किया जाए तो निश्चित तौर पर कई हैरान करने वाली जानकारी मिलेगी।

राजीव उपाध्याय यायावर, समन्वयक विरासत, यूनिवर्सिटी हेरीटेज सेंटर, शोभित विवि गंगोह, सहारनपुर

सहारनपुर के कंपनी गार्डेन में दस सालों तक कार्य करने वाले और जीवाश्म विशेषज्ञ डॉ फॉकनर

सहारनपुर के कंपनी गार्डेन में दस सालों तक कार्य करने वाले और जीवाश्म विशेषज्ञ डॉ फॉकनर- फोटो : SAHARANPUR

हमारा सहारनपुर किताब को संस्कृति मंत्रालय से मिली चुकी है मंजूरी।

हमारा सहारनपुर किताब को संस्कृति मंत्रालय से मिली चुकी है मंजूरी।- फोटो : SAHARANPUR

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