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कभी हथियार चलाया ही नहीं, तो कैसे करते फायरिंग
Updated Sat, 09 Sep 2017 12:24 AM IST
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सहारनपुर। सिपाहियों ने कभी असलहों का प्रयोग ही नहीं किया, मॉक ड्रिल में मात्र दर्शक बने रहे, कभी चलाकर ही नहीं देखे हथियार, फिर बदमाशों का सामना कैसे कर पाते। असलहों के प्रयोग न होने से असलहों में भी जंग लग गई और ऐन मौके पर धोखा दे दिया।
इंसास जैसे असलहों से लैस होते हुए भी दोनों सिपाही बदमाशों के तमंचों के सामने भीगी बिल्ली बन गए। एक सिपाही ने इंसास को चलाने का भी प्रयास किया, लेकिन पहले कभी चलाने का प्रशिक्षण लिया होता तो इंसास चला पाता। जबकि दूसरा तो इंसास को इधर-उधर से पलटता ही रह गया और बदमाश तमंचे से फायरिंग करते हुए फरार हो गए।
विभागीय सूत्रों के अनुसार हर माह होने वाली मॉक ड्रिल, दंगा नियंत्रण योजना का पूर्वाभ्यास तीन महीने से कराया ही नहीं गया। इस साल फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई और जून में ही बलवा ड्रिल का पूर्वाभ्यास कराया गया। जिसमें आंसू गैस के गोले छोड़ने, असलहों को चलाने, लाठी चार्ज किए जाने के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन जब भी यह प्रशिक्षण दिया गया तो उसमें सिपाही सिर्फ दर्शक ही बने रहे। ट्रेनर ने अपने आप आंसू गैस का एक गोला छोड़कर दिखा दिया, खुद ही हथियारों को लोड करना एवं अनलोड करना बता दिया, रबर की गोली लगाकर खुद ही चलाकर दिखा दी। न तो असली गोली चलाकर दिखाई गई और न ही कभी सिपाहियों के हाथों में असलहे देकर उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया। जिसका परिणाम बृहस्पतिवार की रात को सामने आया। असलहे होते हुए भी पुलिसकर्मी सिर्फ तमंचों के सामने नतमस्तक हो गए और बदमाश बंदी को छुड़ाकर ले गए।
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--। प्रशिक्षण के लिए मिलते हैं कारतूस
पुलिस विभाग के सूत्रों के अनुसार प्रशिक्षण के लिए विभाग को कारतूस दिए जाते हैं। लेकिन उन कारतूसों का प्रयोग कभी किया ही नहीं गया। विभागीय अधिकारियों के अनुसार निर्धारित कारतूस ही मिलते हैं। जिस कारण उनका प्रयोग विषम परिस्थितियों में ही किया जाता है।
--। समय-समय पर कराया जाता है प्रशिक्षण
एसएसपी बबलू कुमार का कहना है कि सभी पुलिसकर्मी प्रशिक्षित होते हैं, इसके बावजूद समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। पुलिस शस्त्रागार में असलहों की समुचित देखभाल की जाती है।
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इंसास जैसे असलहों से लैस होते हुए भी दोनों सिपाही बदमाशों के तमंचों के सामने भीगी बिल्ली बन गए। एक सिपाही ने इंसास को चलाने का भी प्रयास किया, लेकिन पहले कभी चलाने का प्रशिक्षण लिया होता तो इंसास चला पाता। जबकि दूसरा तो इंसास को इधर-उधर से पलटता ही रह गया और बदमाश तमंचे से फायरिंग करते हुए फरार हो गए।
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विभागीय सूत्रों के अनुसार हर माह होने वाली मॉक ड्रिल, दंगा नियंत्रण योजना का पूर्वाभ्यास तीन महीने से कराया ही नहीं गया। इस साल फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई और जून में ही बलवा ड्रिल का पूर्वाभ्यास कराया गया। जिसमें आंसू गैस के गोले छोड़ने, असलहों को चलाने, लाठी चार्ज किए जाने के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन जब भी यह प्रशिक्षण दिया गया तो उसमें सिपाही सिर्फ दर्शक ही बने रहे। ट्रेनर ने अपने आप आंसू गैस का एक गोला छोड़कर दिखा दिया, खुद ही हथियारों को लोड करना एवं अनलोड करना बता दिया, रबर की गोली लगाकर खुद ही चलाकर दिखा दी। न तो असली गोली चलाकर दिखाई गई और न ही कभी सिपाहियों के हाथों में असलहे देकर उन्हें व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया। जिसका परिणाम बृहस्पतिवार की रात को सामने आया। असलहे होते हुए भी पुलिसकर्मी सिर्फ तमंचों के सामने नतमस्तक हो गए और बदमाश बंदी को छुड़ाकर ले गए।
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--। प्रशिक्षण के लिए मिलते हैं कारतूस
पुलिस विभाग के सूत्रों के अनुसार प्रशिक्षण के लिए विभाग को कारतूस दिए जाते हैं। लेकिन उन कारतूसों का प्रयोग कभी किया ही नहीं गया। विभागीय अधिकारियों के अनुसार निर्धारित कारतूस ही मिलते हैं। जिस कारण उनका प्रयोग विषम परिस्थितियों में ही किया जाता है।
--। समय-समय पर कराया जाता है प्रशिक्षण
एसएसपी बबलू कुमार का कहना है कि सभी पुलिसकर्मी प्रशिक्षित होते हैं, इसके बावजूद समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। पुलिस शस्त्रागार में असलहों की समुचित देखभाल की जाती है।