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अब तीन तलाक के खौफ में नहीं जीना पड़ेगा मुस्लिम महिलाओं को
Updated Wed, 23 Aug 2017 12:40 AM IST
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सहारनपुर। सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिए जाने के ऐतिहासिक फैसले से मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर है। महिलाओं ने इस फैसले को महिलाओं के हक और वर्षों की परंपरा से आजादी का फैसला बताया है। उनका कहना है कि इस फैसले से भारतीय मुस्लिम महिलाओं के जीवन में बदलाव आएगा। छोटी सी बात पर तलाक का खौफ अब खत्म हो गया है। अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा मिली है।
अस्तित्व सामाजिक संगठन की फाउंडर रेहाना अदीब ने कहा है कि वास्तव में भारतीय मुस्लिम महिलाओं को अब सुकून मिला है। यह भारत की मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत है। सहारनपुर में ऐसी एक दर्जनों महिलाएं हैं जो तीन तलाक का दंश झेल रही हैं। कई महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें वह किसी तरह से पाल रहीं हैं। तीन तलाक के बाद ये महिलाएं ठोकरें खाने को मजबूर थीं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में बदलाव आएगा। उनके मन में जो हमेशा डर बना रहता था वह आज खत्म हो गया है।
बेहट रोड के गंगोत्री विहार की रेशमा भी तीन तलाक की शिकार हैं। उनके देहरादून निवासी पति ने उन्हें फोन पर ही तलाक दे दिया था। रेशमा की मां नूरजहां का कहना है कि उसकी बेटी छह साल तक लड़ती रही। कोर्ट में अपील कर दी, केस भी कर दिया। समाज के लोगों ने उन पर भारी दबाव बनाया। तीन तलाक खत्म करने के फैसले से ऐसी बच्चियों की जिंदगी बर्बाद नहीं होगी। यह पहले ही हो जाना चाहिए था। समाज के उन लोगों को शायद यह मंजूर न हो, लेकिन यह हुआ अच्छा।
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शहर के मोहल्ला आजाद कॉलोनी निवासी शिक्षिका उरूज इकबाल का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार तीन तलाक को लेकर प्रभावी कानून बनाएगी। जिससे तीन तलाक से प्रताड़ित हो रही महिलाओं को इंसाफ मिल सके। कोर्ट के फैसले का सभी को सम्मान करना चाहिए। आजाद कालोनी निवासी गृहणी रोमी खान कहतीं हैं कि अचानक छोटी सी बात पर तीन तलाक दे देना गलत है। गुस्से में तलाक दे देना महिला की पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है। सही मायने में तीन तलाक तीन महीने में दिया जाता है, लेकिन लोग एकदम तीन बार तलाक बोलकर रिश्ता खत्म कर लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं को राहत मिलेगी। वह कोर्ट के फैसले की सराहना करती हैं।
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अस्तित्व सामाजिक संगठन की फाउंडर रेहाना अदीब ने कहा है कि वास्तव में भारतीय मुस्लिम महिलाओं को अब सुकून मिला है। यह भारत की मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत है। सहारनपुर में ऐसी एक दर्जनों महिलाएं हैं जो तीन तलाक का दंश झेल रही हैं। कई महिलाओं के साथ उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें वह किसी तरह से पाल रहीं हैं। तीन तलाक के बाद ये महिलाएं ठोकरें खाने को मजबूर थीं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में बदलाव आएगा। उनके मन में जो हमेशा डर बना रहता था वह आज खत्म हो गया है।
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बेहट रोड के गंगोत्री विहार की रेशमा भी तीन तलाक की शिकार हैं। उनके देहरादून निवासी पति ने उन्हें फोन पर ही तलाक दे दिया था। रेशमा की मां नूरजहां का कहना है कि उसकी बेटी छह साल तक लड़ती रही। कोर्ट में अपील कर दी, केस भी कर दिया। समाज के लोगों ने उन पर भारी दबाव बनाया। तीन तलाक खत्म करने के फैसले से ऐसी बच्चियों की जिंदगी बर्बाद नहीं होगी। यह पहले ही हो जाना चाहिए था। समाज के उन लोगों को शायद यह मंजूर न हो, लेकिन यह हुआ अच्छा।
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शहर के मोहल्ला आजाद कॉलोनी निवासी शिक्षिका उरूज इकबाल का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार तीन तलाक को लेकर प्रभावी कानून बनाएगी। जिससे तीन तलाक से प्रताड़ित हो रही महिलाओं को इंसाफ मिल सके। कोर्ट के फैसले का सभी को सम्मान करना चाहिए। आजाद कालोनी निवासी गृहणी रोमी खान कहतीं हैं कि अचानक छोटी सी बात पर तीन तलाक दे देना गलत है। गुस्से में तलाक दे देना महिला की पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है। सही मायने में तीन तलाक तीन महीने में दिया जाता है, लेकिन लोग एकदम तीन बार तलाक बोलकर रिश्ता खत्म कर लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुस्लिम महिलाओं को राहत मिलेगी। वह कोर्ट के फैसले की सराहना करती हैं।