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समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुदरती फैसले के खिलाफ: उलमा
Updated Thu, 06 Sep 2018 08:42 PM IST
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नहीं बदला जा सकता प्रकृति का कानून
इस्लाम धर्म में समलैंगिक संबंध हैं हराम
फैसला धर्म और संस्कृति विरोधी: मदनी
फोटो संख्या 4, 4ए
अमर उजाला ब्यूरो
देवबंद (सहारनपुर)। सहमति से समलैंगिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कुछ उलमा ने प्रकृति के नियमों के खिलाफ बताया है। इनका कहना है कि इंसानी कानून परिवर्तनीय, लेकिन प्राकृतिक कानून अपरिवर्तनीय हैं। इस फैसले से सभी धर्मों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी और सुप्रीम अदालत को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा, यह फैसला भारत के धार्मिक सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है। समाज पहले ही यौन अपराध और हिंसा की समस्या से दो-चार है। ऐसे हालात में समलैंगिकता की इजाजत देना ठीक नहीं है। गुरुवार को अपने बयान में मौलाना मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने 2013 के फैसले पर कायम रहना चाहिए था। समलैंगिकता मूल प्रकृति-स्वाभाविकता से बगावत है इससे आवारगी, अश्लीलता और बेचैनी फैलेगी और यौन अपराधों में बढ़ोतरी होगी। मूलभूत अधिकार अपने स्थान पर हैं लेकिन ऐसा कार्य जिससे मानवीय समाज, परिवार और मानव जाति की प्रगति प्रभावित हो उसको आजादी के वर्ग में रखकर सही ठहराना गलत है। कुछ तत्वों के शोर-शराबे को आधार बनाकर पूरे समाज को अविश्वास और व्यावहारिक परेशानी में नहीं डाला जा सकता। इस तरह की कानूनी इजाजत के बाद अभिभावकों को अपने नौजवान बच्चों के चरित्र के सिलसिले में अत्याधिक चिंता हो जाएगी और अविश्वास पैदा होगा।
मदरसा जामिया हुसैनिया के वरिष्ठ उस्ताद मौलाना मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि इस्लाम धर्म में शादी से पूर्व लड़का-लड़की के मिलन को नाजायज करार दिया गया है। क्योंकि समाज में ऐसे मिलन गलत हैं तो समलैंगिकता के लिए तो मजहब में कोई गुंजाइश ही नहीं है। इंसान जो कानून बनाता है उसे कभी भी बदला जा सकता है, लेकिन कुदरती कानून में बदलाव नहीं हो सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुदरती फैसले के खिलाफ है।
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जमीयत दावातुल मुसलिमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज की युवा पीढ़ी के लिए सही नहीं है। इससे भावी पीढ़ी पर बड़ा फर्क पड़ेगा। हदीस में आता है अगर कोई पुरुष, पुरुष से या महिला किसी महिला से संबंध बनाती है तो यह सरासर हराम अमल है और ऐसा गुनाह है जिसकी अल्लाह के यहां कोई माफी नहीं है। कुरआन की कई आयतों में अल्लाह ने समलैंगिकता पर सख्त गुस्से का इजहार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि समलैंगिकता से बीमारियों के साथ-साथ पारिवारिक तानाबाना बिगड़ता है। इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हमें कोर्ट के हर फैसले को मानना चाहिए, लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और हमें अपनी बात रखने का पूरा हक हासिल है। सभी धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे सुप्रीम कोर्ट में फैसले पर पुनर्विचार की याचिका दायर करें।
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इस्लाम धर्म में समलैंगिक संबंध हैं हराम
फैसला धर्म और संस्कृति विरोधी: मदनी
फोटो संख्या 4, 4ए
अमर उजाला ब्यूरो
देवबंद (सहारनपुर)। सहमति से समलैंगिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कुछ उलमा ने प्रकृति के नियमों के खिलाफ बताया है। इनका कहना है कि इंसानी कानून परिवर्तनीय, लेकिन प्राकृतिक कानून अपरिवर्तनीय हैं। इस फैसले से सभी धर्मों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी और सुप्रीम अदालत को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा, यह फैसला भारत के धार्मिक सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है। समाज पहले ही यौन अपराध और हिंसा की समस्या से दो-चार है। ऐसे हालात में समलैंगिकता की इजाजत देना ठीक नहीं है। गुरुवार को अपने बयान में मौलाना मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने 2013 के फैसले पर कायम रहना चाहिए था। समलैंगिकता मूल प्रकृति-स्वाभाविकता से बगावत है इससे आवारगी, अश्लीलता और बेचैनी फैलेगी और यौन अपराधों में बढ़ोतरी होगी। मूलभूत अधिकार अपने स्थान पर हैं लेकिन ऐसा कार्य जिससे मानवीय समाज, परिवार और मानव जाति की प्रगति प्रभावित हो उसको आजादी के वर्ग में रखकर सही ठहराना गलत है। कुछ तत्वों के शोर-शराबे को आधार बनाकर पूरे समाज को अविश्वास और व्यावहारिक परेशानी में नहीं डाला जा सकता। इस तरह की कानूनी इजाजत के बाद अभिभावकों को अपने नौजवान बच्चों के चरित्र के सिलसिले में अत्याधिक चिंता हो जाएगी और अविश्वास पैदा होगा।
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मदरसा जामिया हुसैनिया के वरिष्ठ उस्ताद मौलाना मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि इस्लाम धर्म में शादी से पूर्व लड़का-लड़की के मिलन को नाजायज करार दिया गया है। क्योंकि समाज में ऐसे मिलन गलत हैं तो समलैंगिकता के लिए तो मजहब में कोई गुंजाइश ही नहीं है। इंसान जो कानून बनाता है उसे कभी भी बदला जा सकता है, लेकिन कुदरती कानून में बदलाव नहीं हो सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुदरती फैसले के खिलाफ है।
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जमीयत दावातुल मुसलिमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन कारी इसहाक गोरा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज की युवा पीढ़ी के लिए सही नहीं है। इससे भावी पीढ़ी पर बड़ा फर्क पड़ेगा। हदीस में आता है अगर कोई पुरुष, पुरुष से या महिला किसी महिला से संबंध बनाती है तो यह सरासर हराम अमल है और ऐसा गुनाह है जिसकी अल्लाह के यहां कोई माफी नहीं है। कुरआन की कई आयतों में अल्लाह ने समलैंगिकता पर सख्त गुस्से का इजहार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि समलैंगिकता से बीमारियों के साथ-साथ पारिवारिक तानाबाना बिगड़ता है। इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हमें कोर्ट के हर फैसले को मानना चाहिए, लेकिन हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और हमें अपनी बात रखने का पूरा हक हासिल है। सभी धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे सुप्रीम कोर्ट में फैसले पर पुनर्विचार की याचिका दायर करें।