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जिक्र-ए-शहादतैन की सदाओं से गूंजा शहर
ब्यूरो /पीलीभीत
Updated Tue, 11 Oct 2016 10:33 PM IST
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जिक्र-ए-शहादतैन की सदाओं से गूंजा शहर
- फोटो : पीलीभ्ाीत/उत्ततर प्रदेश्ा
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मोहर्रम की नवीं तारीख पर मंगलवार को शहर में ताजिये सजाए गए। जगह-जगह जिक्र-ए-शहादतैन का जिक्र हुआ। शोहदा-ए-कर्बला की शान में मनकबत का सिलसिला जारी रहा। अकीदतमंदों ने लंगर भी किये।
अल्लाह के प्यारे नबी हुजूर मोहम्मद मुस्तफा सललल्लाहो अलैहेवसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन व हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की कर्बला में शहादत को याद करने के लिए मोहर्रम मनाया जाता है। इस सिलसिले में शहर भर में ताजिए सजाए गए। ताजियादारों ने ताजियों के पास मीलाद शरीफ की महफिलें सजाईं और फातेहाख्वानी की। अकीदतमंदों ने ताजियों के दीदार कर दुआएं मांगी। जगह-जगह हुए जिक्र-ए-शहादतैन में उलमा ने कौम को मोहर्रम की अहमियत समझाई। उलमा ने कहा कि इस्लाम सच्चा मजहब है। मोहर्रम के महीने में इमाम हुसैन व इमाम हसन अलैहिस्सलाम को अपने कुनबे के साथ कर्बला की सरजमीं पर यजीद से जंग करना पड़ी। यह जंग हक के लिए लड़ी गई। इमाम हुसैन ने अपने नाना की उम्मत को बचाने के लिए यजीद से बैअत करना गवारा नहीं किया और जंग के लिए राजी हो गए। एक तरफ उनके कुनबे के कुल 72 लोग थे और दूसरी तरफ हजारों की तादाद में यजीदी फौज थी। यह जंग सच्चाई, हकपरस्ती और अल्लाह की रजा के लिए थी। यह जंग यजीद के आतंक, झूठ और मक्कारी के खिलाफ थी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दीने हक को बचाने के लिए अपने कुनबे को कुर्बान कर दिया। मुसलमानों को चाहिए कि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रास्ते को अपनाएं। यजीद जैसा कोई काम न करें।
इधर घरों में भी लोगों ने फातेहा दिलाई। शोहदा-ए-कर्बला की याद में महफिलें सजाई गईं। जगह-जगह शबीलें लगाकर लंगर तक्सीम किया गया। शहर के बेलों वाला चौराहा स्थित कुरैशियान के तखत, अब्बासियान के तखत समेत मोहल्ला पकरिया, सरफराज खां, फीलखाना, मदीनाशाह, मो. वासिल, शेर मो. आदि मोहल्लों के तखत और ताजियों पर देर रात तक काफी भीड़ रही। सभी जगह बड़े पैमाने पर सजावट की गई थी।
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अल्लाह के प्यारे नबी हुजूर मोहम्मद मुस्तफा सललल्लाहो अलैहेवसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन व हजरत इमाम हसन अलैहिस्सलाम की कर्बला में शहादत को याद करने के लिए मोहर्रम मनाया जाता है। इस सिलसिले में शहर भर में ताजिए सजाए गए। ताजियादारों ने ताजियों के पास मीलाद शरीफ की महफिलें सजाईं और फातेहाख्वानी की। अकीदतमंदों ने ताजियों के दीदार कर दुआएं मांगी। जगह-जगह हुए जिक्र-ए-शहादतैन में उलमा ने कौम को मोहर्रम की अहमियत समझाई। उलमा ने कहा कि इस्लाम सच्चा मजहब है। मोहर्रम के महीने में इमाम हुसैन व इमाम हसन अलैहिस्सलाम को अपने कुनबे के साथ कर्बला की सरजमीं पर यजीद से जंग करना पड़ी। यह जंग हक के लिए लड़ी गई। इमाम हुसैन ने अपने नाना की उम्मत को बचाने के लिए यजीद से बैअत करना गवारा नहीं किया और जंग के लिए राजी हो गए। एक तरफ उनके कुनबे के कुल 72 लोग थे और दूसरी तरफ हजारों की तादाद में यजीदी फौज थी। यह जंग सच्चाई, हकपरस्ती और अल्लाह की रजा के लिए थी। यह जंग यजीद के आतंक, झूठ और मक्कारी के खिलाफ थी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दीने हक को बचाने के लिए अपने कुनबे को कुर्बान कर दिया। मुसलमानों को चाहिए कि वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रास्ते को अपनाएं। यजीद जैसा कोई काम न करें।
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इधर घरों में भी लोगों ने फातेहा दिलाई। शोहदा-ए-कर्बला की याद में महफिलें सजाई गईं। जगह-जगह शबीलें लगाकर लंगर तक्सीम किया गया। शहर के बेलों वाला चौराहा स्थित कुरैशियान के तखत, अब्बासियान के तखत समेत मोहल्ला पकरिया, सरफराज खां, फीलखाना, मदीनाशाह, मो. वासिल, शेर मो. आदि मोहल्लों के तखत और ताजियों पर देर रात तक काफी भीड़ रही। सभी जगह बड़े पैमाने पर सजावट की गई थी।
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