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क्लासिकल म्यूजिक के लिए यह सबसे अच्छा दौरः राजेंद्र प्रसन्ना
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पीलीभीत। प्रख्यात बांसुरी वादक राजेंद्र प्रसन्ना ने कहा सोमवार को कहा कि परंपरागत वाद्य यंत्रों का महत्व आदिकाल से है और सृष्टि के अंत तक बना रहेगा। उतार-चढ़ाव आते रहे हैं और आगे भी आते रहेंगे लेकिन क्लासिकल म्यूजिक के लिए यह सबसे अच्छा दौर है। सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के कार्यक्रमों की वजह से नई पीढ़ी में खासकर किशोर और युवा शास्त्रीय संगीत की ओर आकर्षित हुए हैं। शास्त्रीय संगीत सीखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। सम्मान भी बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि वेस्टर्न म्यूजिक को बढ़ावा देने के लिए अति आधुनिक वाद्य यंत्र बनाए गए और उनका प्रसार खूब भी हुआ और आगे भी होता रहेगा लेकिन इनसे परंपरागत वाद्य यंत्रों तबला, बांसुरी आदि के भविष्य को कोई खतरा नहीं है। बांसुरी वादकों का भविष्य उज्ज्वल है। जिस तरह से फिल्मों में नया संगीत आने से शास्त्रीय संगीत के लिए अवसर कम नहीं हुए, उसी तरह कितने भी नए वाद्य यंत्र आ जाएं, बांसुरी के लिए भी अवसर कम नहीं होंगे। वैसे भी धरती पर जितने मनुष्य पैदा होते हैं उन सबके भीतर जन्म से ही संगीत की प्रतिभा छुपी हुई होती है। अगर बचपन और उसके बाद कोई अपनी संगीत की प्रतिभा को पहचान कर निखारने में लग जाता है तो वह किसी भी मुकाम तक भी पहुंच सकता है।
विश्व में नंबर एक है भारतीय संगीत
पारंपरिक भारतीय संगीत को पूरे विश्व में सराहना मिली है। यह हम नहीं कहते, विदेशी कहते हैं कि भारतीय संगीत अद्भुत है। सबको जान लेना चाहिए कि पारंपरिक वाद्य यंत्र और पारंपरिक संगीत कभी खत्म नहीं होगा। ज्यों ज्यों नए यंत्र बनेंगे और संगीत के क्षेत्र में फ्यूजन जैसे प्रयोग बढ़ेंगे, पारंपरिक संगीत और उसके वाद्ययंत्रों का महत्व और बढ़ेगा। जहां तक बांसुरी का सवाल हैं, मैं सबको निशुल्क ट्रेनिंग के लिए तैयार रहता हूं। क्योंकि मुझे मेरे गुरु ने निशुल्क विद्यादान दिया। मैं भी अपने शिष्यों को निशुल्क ही सिखाता हूं।
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राजेंद्र प्रसन्ना ने कहा- बांसुरी वादन में बस जो मेहनत और लगन के साथ रियाज के समय निकालते हैं, वे आगे बढ़ जाते हैं। मेरी नजर में संगीत एक साधना है। साधना के लिए संकल्प की जरूरत होती है फिर ईश्वर रास्ता देता है। ईश्वर के संकेतों को समझते हुए आगे बढ़ें तो बढ़ते चले जाएंगे। वैसे भी भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर पूरे ब्रह्मांड में इस वाद्य यंत्र को ख्याति दिलाई है। बांसुरी सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं है। ईश्वर से जुड़ने का एक माध्यम भी है।
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उन्होंने कहा कि वेस्टर्न म्यूजिक को बढ़ावा देने के लिए अति आधुनिक वाद्य यंत्र बनाए गए और उनका प्रसार खूब भी हुआ और आगे भी होता रहेगा लेकिन इनसे परंपरागत वाद्य यंत्रों तबला, बांसुरी आदि के भविष्य को कोई खतरा नहीं है। बांसुरी वादकों का भविष्य उज्ज्वल है। जिस तरह से फिल्मों में नया संगीत आने से शास्त्रीय संगीत के लिए अवसर कम नहीं हुए, उसी तरह कितने भी नए वाद्य यंत्र आ जाएं, बांसुरी के लिए भी अवसर कम नहीं होंगे। वैसे भी धरती पर जितने मनुष्य पैदा होते हैं उन सबके भीतर जन्म से ही संगीत की प्रतिभा छुपी हुई होती है। अगर बचपन और उसके बाद कोई अपनी संगीत की प्रतिभा को पहचान कर निखारने में लग जाता है तो वह किसी भी मुकाम तक भी पहुंच सकता है।
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विश्व में नंबर एक है भारतीय संगीत
पारंपरिक भारतीय संगीत को पूरे विश्व में सराहना मिली है। यह हम नहीं कहते, विदेशी कहते हैं कि भारतीय संगीत अद्भुत है। सबको जान लेना चाहिए कि पारंपरिक वाद्य यंत्र और पारंपरिक संगीत कभी खत्म नहीं होगा। ज्यों ज्यों नए यंत्र बनेंगे और संगीत के क्षेत्र में फ्यूजन जैसे प्रयोग बढ़ेंगे, पारंपरिक संगीत और उसके वाद्ययंत्रों का महत्व और बढ़ेगा। जहां तक बांसुरी का सवाल हैं, मैं सबको निशुल्क ट्रेनिंग के लिए तैयार रहता हूं। क्योंकि मुझे मेरे गुरु ने निशुल्क विद्यादान दिया। मैं भी अपने शिष्यों को निशुल्क ही सिखाता हूं।
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राजेंद्र प्रसन्ना ने कहा- बांसुरी वादन में बस जो मेहनत और लगन के साथ रियाज के समय निकालते हैं, वे आगे बढ़ जाते हैं। मेरी नजर में संगीत एक साधना है। साधना के लिए संकल्प की जरूरत होती है फिर ईश्वर रास्ता देता है। ईश्वर के संकेतों को समझते हुए आगे बढ़ें तो बढ़ते चले जाएंगे। वैसे भी भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर पूरे ब्रह्मांड में इस वाद्य यंत्र को ख्याति दिलाई है। बांसुरी सिर्फ वाद्य यंत्र नहीं है। ईश्वर से जुड़ने का एक माध्यम भी है।

लिटिल एंजिल्स स्कूल में बांसुरी वादन करते पंडित राजेंद्र प्रसंना। संवाद- फोटो : PILIBHIT