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ये तो मजाक है साहब, जरूरत पांच लाख की है और कर्ज दिया सिर्फ 50 हजार
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पीलीभीत। साहब... यह तो बांसुरी वालों के साथ मजाक है। सिलचर से एक ट्रक बंबू मंगाने के लिए तीन लाख रुपये की जरूरत होती है। ऐसे में कम से कम एक इकाई के लिए पांच लाख रुपये का कर्ज देना चाहिए था। लेकिन शर्तों में फंसी एक जिला एक उत्पाद की ऋण योजना में पचास से हजार से एक लाख रुपये देकर टाला गया। इसके चलते कारोबार को रफ्तार नहीं मिल सका। लॉकडाउन में मेले नहीं लगे। दो वर्ष के कोरोना काल में बांसुरी की बिक्री इतनी घट गई कि उद्योग के अस्तित्व पर ही संकट है। यह कहना बांसुरी उत्पादकों का है, जो बदहाल सिस्टम की वजह से कारोबार को बढ़ा नहीं पा रहे हैं।
एक जिला एक उत्पाद योजना में बांसुरी को उद्योग के रूप में 2018 में चयनित किया गया। लेकिन अभी तक बांसुरी के कारोबार को विस्तार नहीं मिल सका। जबकि प्रचार-प्रसार काफी हुआ है। पीलीभीत में बांसुरी चौराहे का निर्माण कराया गया। एक दशक पहले 1000-1500 परिवार बांसुरी बनाते थे। संख्या अब घटकर 100-150 पर सिमट गई, क्योंकि कारीगरों को न कर्ज मिला न प्रोत्साहन। मालगाड़ी से बांस आना बंद हो गया तो ट्रक में भाड़ा अधिक लगा। साथ ही एक आदमी के बूते की बात नहीं है कि एक ट्रक बांस मंगा सके। वहीं जीएसटी रजिस्ट्रेशन न होने से अधिकतर कारीगर बांसुरी बनाने के लिए असम से बंबू सीधे नहीं मंगा सके। थोक विक्रेताओं से महंगा बंबू लेने पर मजदूरी घटी और गुजारा मुश्किल होने लगा तो बांसुरी बनाने वाले सैकड़ों परिवारों के लोग तो ई-रिक्शा चलाने लगे। वहीं कुछ लोगों ने दूसरे व्यापार अपना लिए। कई कारीगर तो अब फेरी लगाकर परिवार चला रहे हैं। जमीनी हकीकत जानने के लिए पीलीभीत के मोहल्ला डाल चंद का दौरा किया तो कारीगरों ने अपना दर्द बयां किया। साथ ही यह भी कहा कि डीएम तो बांसुरी उद्योग को बुलंदियों पर ले जाना चाहते हैं पर बैंकर्स कर्ज देने में कंजूसी कर रहे हैं। बांसुरी निर्माता इकरार ने कहा कि बार-बार दौड़ने के बाद भी 50,000 से 1,00,000 लाख तक के ऋण दिए गए हैं। इससे कारोबार चल नहीं पाता है। कारीगर कर्ज में जरूर डूब जाते हैं। मेरी नजर में बांसुरी उद्योग के साथ इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता है।
बच्चों को बांसुरी बजाने का प्रशिक्षण दिया जाए तो बढ़ेगा व्यापार, जुड़ेगी नई पीढ़ी
बांसुरी के निर्यातक और प्रमुख कारोबारी इकरार का कहना अब सरकार को चाहिए स्कूलों में बच्चों के लिए बांसुरी का प्रशिक्षण दिलाएं। संगीत के सुरों हारमोनियम की तरह बांसुरी से भी निकाला जा सकता है। अगर बच्चे सीखते हैं और सरकार प्रोत्साहन देती है तो कान्हा की बांसुरी घर घर पहुंच जाएगी। भारतीय संस्कृति और संस्कारों से नई पीढ़ी भी रूबरू हो सकेगी।
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देश-विदेश में घटी मांग, इसलिए कारोबार पर संकट के बादल
मुरादाबाद और दिल्ली मुंबई के हस्तशिल्प निर्यातकों के माध्यम से यूरोप और अमेरिका तक बांसुरी का निर्यात होता था लेकिन अब निर्यात बंद है। बांसुरी का निर्यात करने वाले मोहम्मद इकरार का कहना है कि फ्रांस समेत कई देशों में भारतीय वाद्य यंत्र के तौर पर बांसुरी की मांग हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। स्थानीय स्तर पर घरेलू मांग भी घट गई है। इसकी वजह बांसुरी उद्योग के वजूद पर ही संकट के बादल नजर आ रहे हैं।
बांसुरी निर्माताओं की कहानी, उनकी ही जुबानी
मैंने एक जिला एक उत्पाद योजना में ऋण के लिए आवेदन किया। आवेदन के बाद बैंक के मैनेजर मेरे घर आए। मुझसे काम कराकर देखा और संतुष्ट हुए लेकिन जब उन्होंने पैन कार्ड मांगा और कहा कि बैंक एकाउंट में कितना लेनदेन होता है? तब मैंने कहा कि पैनकार्ड है नहीं और लेनदेन तो बहुत कम है। इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आपका आवेदन होल्ड पर है, तब से मैं इंतजार ही कर रहा हूं।
- मोहम्मद शहजाद, बांसुरी निर्माता
डीएम ने दो बार मेले लगवाए। बांसुरी को नई पहचान दिलाने का प्रयास किया पर बैंकर्स ने कर्ज नहीं दिए। ऋण योजनाओं का लाभ नहीं मिला। न ही कॉमन फैसलिटी सेंटर बन सका। बातें तो बहुत हुईं हैं और हो रही हैं। पर अभी जमीनी स्तर पर कारीगरों को लाभ नहीं मिल सका। यह स्थिति तब है जब हमारे घर पर तीन पीढ़ियों से बांसुरी बनाने का काम हो रहा है।
- मोहम्मद इलियास बांसुरी निर्माता
मैं पहले बांसुरी बनाता था। अब ई-रिक्शा चलाता हूं। वजह यह है कि कर्ज के लिए बैंक में आवेदन किया और 50,000 रुपये का कर्ज देने की बात मैनेजर ने कही। इतने में कारोबार तो हो नहीं सकता था। ऐसे परिवार के गुजार के लिए मैंने ई-रिक्शा चलाना ही बेहतर समझा।
- मोहम्मद इमरान, बांसुरी निर्माता
बांसुरी बनाने के काम के लिए लोन चाहता था लेकिन लंबी प्रक्रिया थी। उसे पूरा करने में वक्त लगता तो परिवार कैसे चलता। इसलिए मैंने रसोई गैस के चूल्हे और प्रेशर कुकर की मरम्मत का काम शुरू कर दिया। बांसुरी उद्योग को बढ़ावा देना है तो कच्चे माल की स्थानीय स्तर पर उपलब्धता करानी होगी।
- मोहम्मद लईक, अब फेरी वाले, पूर्व में बांसुरी निर्माता
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एक जिला एक उत्पाद योजना में बांसुरी को उद्योग के रूप में 2018 में चयनित किया गया। लेकिन अभी तक बांसुरी के कारोबार को विस्तार नहीं मिल सका। जबकि प्रचार-प्रसार काफी हुआ है। पीलीभीत में बांसुरी चौराहे का निर्माण कराया गया। एक दशक पहले 1000-1500 परिवार बांसुरी बनाते थे। संख्या अब घटकर 100-150 पर सिमट गई, क्योंकि कारीगरों को न कर्ज मिला न प्रोत्साहन। मालगाड़ी से बांस आना बंद हो गया तो ट्रक में भाड़ा अधिक लगा। साथ ही एक आदमी के बूते की बात नहीं है कि एक ट्रक बांस मंगा सके। वहीं जीएसटी रजिस्ट्रेशन न होने से अधिकतर कारीगर बांसुरी बनाने के लिए असम से बंबू सीधे नहीं मंगा सके। थोक विक्रेताओं से महंगा बंबू लेने पर मजदूरी घटी और गुजारा मुश्किल होने लगा तो बांसुरी बनाने वाले सैकड़ों परिवारों के लोग तो ई-रिक्शा चलाने लगे। वहीं कुछ लोगों ने दूसरे व्यापार अपना लिए। कई कारीगर तो अब फेरी लगाकर परिवार चला रहे हैं। जमीनी हकीकत जानने के लिए पीलीभीत के मोहल्ला डाल चंद का दौरा किया तो कारीगरों ने अपना दर्द बयां किया। साथ ही यह भी कहा कि डीएम तो बांसुरी उद्योग को बुलंदियों पर ले जाना चाहते हैं पर बैंकर्स कर्ज देने में कंजूसी कर रहे हैं। बांसुरी निर्माता इकरार ने कहा कि बार-बार दौड़ने के बाद भी 50,000 से 1,00,000 लाख तक के ऋण दिए गए हैं। इससे कारोबार चल नहीं पाता है। कारीगर कर्ज में जरूर डूब जाते हैं। मेरी नजर में बांसुरी उद्योग के साथ इससे बड़ा मजाक और कुछ नहीं हो सकता है।
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बच्चों को बांसुरी बजाने का प्रशिक्षण दिया जाए तो बढ़ेगा व्यापार, जुड़ेगी नई पीढ़ी
बांसुरी के निर्यातक और प्रमुख कारोबारी इकरार का कहना अब सरकार को चाहिए स्कूलों में बच्चों के लिए बांसुरी का प्रशिक्षण दिलाएं। संगीत के सुरों हारमोनियम की तरह बांसुरी से भी निकाला जा सकता है। अगर बच्चे सीखते हैं और सरकार प्रोत्साहन देती है तो कान्हा की बांसुरी घर घर पहुंच जाएगी। भारतीय संस्कृति और संस्कारों से नई पीढ़ी भी रूबरू हो सकेगी।
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देश-विदेश में घटी मांग, इसलिए कारोबार पर संकट के बादल
मुरादाबाद और दिल्ली मुंबई के हस्तशिल्प निर्यातकों के माध्यम से यूरोप और अमेरिका तक बांसुरी का निर्यात होता था लेकिन अब निर्यात बंद है। बांसुरी का निर्यात करने वाले मोहम्मद इकरार का कहना है कि फ्रांस समेत कई देशों में भारतीय वाद्य यंत्र के तौर पर बांसुरी की मांग हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। स्थानीय स्तर पर घरेलू मांग भी घट गई है। इसकी वजह बांसुरी उद्योग के वजूद पर ही संकट के बादल नजर आ रहे हैं।
बांसुरी निर्माताओं की कहानी, उनकी ही जुबानी
मैंने एक जिला एक उत्पाद योजना में ऋण के लिए आवेदन किया। आवेदन के बाद बैंक के मैनेजर मेरे घर आए। मुझसे काम कराकर देखा और संतुष्ट हुए लेकिन जब उन्होंने पैन कार्ड मांगा और कहा कि बैंक एकाउंट में कितना लेनदेन होता है? तब मैंने कहा कि पैनकार्ड है नहीं और लेनदेन तो बहुत कम है। इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आपका आवेदन होल्ड पर है, तब से मैं इंतजार ही कर रहा हूं।
- मोहम्मद शहजाद, बांसुरी निर्माता
डीएम ने दो बार मेले लगवाए। बांसुरी को नई पहचान दिलाने का प्रयास किया पर बैंकर्स ने कर्ज नहीं दिए। ऋण योजनाओं का लाभ नहीं मिला। न ही कॉमन फैसलिटी सेंटर बन सका। बातें तो बहुत हुईं हैं और हो रही हैं। पर अभी जमीनी स्तर पर कारीगरों को लाभ नहीं मिल सका। यह स्थिति तब है जब हमारे घर पर तीन पीढ़ियों से बांसुरी बनाने का काम हो रहा है।
- मोहम्मद इलियास बांसुरी निर्माता
मैं पहले बांसुरी बनाता था। अब ई-रिक्शा चलाता हूं। वजह यह है कि कर्ज के लिए बैंक में आवेदन किया और 50,000 रुपये का कर्ज देने की बात मैनेजर ने कही। इतने में कारोबार तो हो नहीं सकता था। ऐसे परिवार के गुजार के लिए मैंने ई-रिक्शा चलाना ही बेहतर समझा।
- मोहम्मद इमरान, बांसुरी निर्माता
बांसुरी बनाने के काम के लिए लोन चाहता था लेकिन लंबी प्रक्रिया थी। उसे पूरा करने में वक्त लगता तो परिवार कैसे चलता। इसलिए मैंने रसोई गैस के चूल्हे और प्रेशर कुकर की मरम्मत का काम शुरू कर दिया। बांसुरी उद्योग को बढ़ावा देना है तो कच्चे माल की स्थानीय स्तर पर उपलब्धता करानी होगी।
- मोहम्मद लईक, अब फेरी वाले, पूर्व में बांसुरी निर्माता