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पीलीभीतः टाडा बंदी हत्याकांड की मुकदमा वापसी पर सरकारों ने भी नहीं की समीक्षा
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पीलीभीत। वर्ष 1994 में जेलकर्मियों द्वारा जेल में बंद दस टाडा बंदियों की हत्या के गंभीर मामले के 48 आरोपियों का केस तत्कालीन मुलायम सरकार के आदेश पर वापस हो गया। मगर, उसके बाद बनी अगली सरकारों ने भी इतने बड़े हत्याकांड के मुकदमा वापसी आदेश की समीक्षा नहीं की। अब हाईकोर्ट में प्रमुख सचिव गृह की जवाब तलबी पर पीड़ितों और मृतक के परिजनों को न्याय की उम्मीद जगी है।
आठ नवंबर 1994 को जेल में बंद उस टाडा बंदियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। डेढ़ दर्जन टाडा बंदी गंभीर रूप से घायल हुए। जेल के 48 अधिकारियों और कर्मचारियों पर चार्जशीट भी लगी। सरकार की लचर पैरवी के चलते हत्या जैसे गंभीर मामले की कार्रवाई वर्ष 2007 तक स्टे रही। सरकार ने वर्ष 2007 में जनहित बताते हुए इसे वापस ले लिया। सरकारी अमले की पैरवी पर कोर्ट से मुकदमा समाप्त हो गया। यही भी विडबंना कही जाएगी कि न्यायिक अभिरक्षा में मौत के इस गंभीर मामले में आरोपियों को सजा दिलाने की जगह सरकार ने मुकदमा ही वापस ले लिया। अब लंबे अरसे बाद हाईकोर्ट में हुई याचिका को ही सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। सरकारी जवाब दाखिल न होने पर हाईकोर्ट ने पांच मार्च को प्रमुख सचिव गृह में व्यक्तिगत रुप से तलब कर लिया और जवाब न दाखिल करने का कारण बताओ नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा है। यदि उच्च न्यायालय मुकदमा वापसी के आदेश को खारिज कर दे और मामले की दोबारा सुनवाई हो, तब मृतकों के परिजनों और पीड़ितों को न्याय मिल सकता है।
बरसों लग जाएंगे आरोपियों को तलाशने में
टाडाबंदी हत्याकांड के मामले की अगर दोबारा सुनवाई शुरू हुई तो आरोपियों को तलाशने में ही कई साल गुजर जाएंगे। 48 जेल अधिकारी और कर्मचारियों में से कई आरोपी तो स्वर्ग भी सिधार हो चुके होंगे। तमाम आरोपी सेवानिवृत हो गए होंगे। दूसरे कई आरोपियों के पता ठिकाने बदल गए होंगे। यह प्रक्रिया अब खासी लंबी हो चुकी है। कानून के अनुसार मामले की दोबारा सुनवाई होने पर पहले सम्मन जारी होगा फिर जमानती वारंट और उसके बाद गैर जमानती वारंट जारी होगा। कानूनी जानकारों का कहना है कि दोबारा सुनवाई होने पर भी आरोपी सुनवाई को लंबा खींचने के लिए कानूनी मकड़जाल में फंसा देंगे। कोर्ट में गवाही के लिए पीड़ितों और मृतक के परिजनों को ढूंढने में भी खासी मशक्कत होगी। क्योंकि पीड़ितों में यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा, चंडीगढ़ और पंजाब के लोग होंगे।
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न्याय की आस में पीड़ित परिवारों के बीत गए 28 साल
पूरनपुर। जेल मेें बंद टाडा बंदियों की मौत को 28 साल हो गए। न्याय मिलने की आस वर्ष 2007 में मुकदमा वापस की अधिसूचना जारी होने पर टूट गई थी। पीड़ितों का कहना है कि न्याय की आस में कई पीड़ितों की मौत हो चुकी है। मामले में कोर्ट में गंभीरता से लेने पर एक बार फिर पीड़ितों और उनके परिवारों में न्याय की आस जगी है।
नब्बे के दशक में क्षेत्र में आतंकवाद चरम पर था। शाम ढलते ही बाजार में सन्नाटा पसर जाता था। दहशत के चलते लोग घरों से बाहर निकलना तो दूर घरों में भी दहशत से रहते थे। फिरौती के लिए अपहरण की घटनाएं आम बात थी। कई धनाड्य कारोबारी अपने कारोबार बंद कर दूसरे शहरों को चले गए। विकास की रफ्तार सुस्त होने लगी थी। एक कोतवाल की आतंकियों ने हत्या कर दी गई। कई आतंकियों को जेल में डाला गया। वर्ष 1994 में जेल में बंद सात टांडा बंदियों की मौत हो गई थी। इसमें जेल के 48 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, मगर वर्ष 2007 में मुकदमा खत्म कर दिया गया। इससे न्याय की आस लगाए बैठे पीड़ितों का बड़ा धक्का लगा। इधर अब पुन: इस मामले में कार्रवाई शुरू होने से पीड़ितों में एक बार फिर न्याय की आस जागी है।
पहले बैरक से बाहर निकाला, फिर पीट-पीटकर मार डाला
घटना 8/9 नवंबर 1994 की है। मैं भी बैरक नंबर सात में बंद था। अचानक बैरक में घुसे जेलकर्मियों ने एक-एक कर बंदियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया। बैरक नंबर चार में ले जाकर पीट-पीट कर सात बंदियों को मार डाला था। 21 बंदी गंभीर घायल थे। पिटाई से मैं भी घायल हुआ था। न्याय की आस लगाए 28 साल पूरे हो गए। किसी की गवाही तक नहीं हुई और मुकदमा खत्म कर दिया गया। जेल में बंदियों की हत्या की गई थी। न्याय मिलने की आज तक आस लगाए बैठा हूं। - महेंद्र सिंह, खरौसा
मामले की हो सुनवाई... दोषियों को मिले कड़ी सजा
घटना बैरक नंबर सात की है। मैं कई साथियों के साथ बैरक नंबर छह में था। अचानक अलार्म बजा और जेलकर्मियों ने बैरक नंबर सात से एक-एक बंदी को निकालकर बैरक नंबर चार में लेजाकर पीटना शुरू कर दिया था। सात बंदियों की मौत हो गई थी। घटना के बाद बंदियों में दहशत फैल गई। मेरे ससुर ज्ञानी त्रिलोचन सिंह शोर-शराबा पर रात को ही जेल गेट पर पहुंच गए थे। गेट पर लोगों ने काफी शोर-शराबा भी किया गया, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। घायल बंदी और मौत के मुंह में समाए बंदियों के परिवारों को न्याय नहीं मिल सका। मामले की सही ढंग से सुनवाई हो और दोषियों को कड़ी सजा मिले। - सुखदेव सिंह छीना, हरसिंहपुर
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आठ नवंबर 1994 को जेल में बंद उस टाडा बंदियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। डेढ़ दर्जन टाडा बंदी गंभीर रूप से घायल हुए। जेल के 48 अधिकारियों और कर्मचारियों पर चार्जशीट भी लगी। सरकार की लचर पैरवी के चलते हत्या जैसे गंभीर मामले की कार्रवाई वर्ष 2007 तक स्टे रही। सरकार ने वर्ष 2007 में जनहित बताते हुए इसे वापस ले लिया। सरकारी अमले की पैरवी पर कोर्ट से मुकदमा समाप्त हो गया। यही भी विडबंना कही जाएगी कि न्यायिक अभिरक्षा में मौत के इस गंभीर मामले में आरोपियों को सजा दिलाने की जगह सरकार ने मुकदमा ही वापस ले लिया। अब लंबे अरसे बाद हाईकोर्ट में हुई याचिका को ही सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। सरकारी जवाब दाखिल न होने पर हाईकोर्ट ने पांच मार्च को प्रमुख सचिव गृह में व्यक्तिगत रुप से तलब कर लिया और जवाब न दाखिल करने का कारण बताओ नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा है। यदि उच्च न्यायालय मुकदमा वापसी के आदेश को खारिज कर दे और मामले की दोबारा सुनवाई हो, तब मृतकों के परिजनों और पीड़ितों को न्याय मिल सकता है।
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बरसों लग जाएंगे आरोपियों को तलाशने में
टाडाबंदी हत्याकांड के मामले की अगर दोबारा सुनवाई शुरू हुई तो आरोपियों को तलाशने में ही कई साल गुजर जाएंगे। 48 जेल अधिकारी और कर्मचारियों में से कई आरोपी तो स्वर्ग भी सिधार हो चुके होंगे। तमाम आरोपी सेवानिवृत हो गए होंगे। दूसरे कई आरोपियों के पता ठिकाने बदल गए होंगे। यह प्रक्रिया अब खासी लंबी हो चुकी है। कानून के अनुसार मामले की दोबारा सुनवाई होने पर पहले सम्मन जारी होगा फिर जमानती वारंट और उसके बाद गैर जमानती वारंट जारी होगा। कानूनी जानकारों का कहना है कि दोबारा सुनवाई होने पर भी आरोपी सुनवाई को लंबा खींचने के लिए कानूनी मकड़जाल में फंसा देंगे। कोर्ट में गवाही के लिए पीड़ितों और मृतक के परिजनों को ढूंढने में भी खासी मशक्कत होगी। क्योंकि पीड़ितों में यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा, चंडीगढ़ और पंजाब के लोग होंगे।
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न्याय की आस में पीड़ित परिवारों के बीत गए 28 साल
पूरनपुर। जेल मेें बंद टाडा बंदियों की मौत को 28 साल हो गए। न्याय मिलने की आस वर्ष 2007 में मुकदमा वापस की अधिसूचना जारी होने पर टूट गई थी। पीड़ितों का कहना है कि न्याय की आस में कई पीड़ितों की मौत हो चुकी है। मामले में कोर्ट में गंभीरता से लेने पर एक बार फिर पीड़ितों और उनके परिवारों में न्याय की आस जगी है।
नब्बे के दशक में क्षेत्र में आतंकवाद चरम पर था। शाम ढलते ही बाजार में सन्नाटा पसर जाता था। दहशत के चलते लोग घरों से बाहर निकलना तो दूर घरों में भी दहशत से रहते थे। फिरौती के लिए अपहरण की घटनाएं आम बात थी। कई धनाड्य कारोबारी अपने कारोबार बंद कर दूसरे शहरों को चले गए। विकास की रफ्तार सुस्त होने लगी थी। एक कोतवाल की आतंकियों ने हत्या कर दी गई। कई आतंकियों को जेल में डाला गया। वर्ष 1994 में जेल में बंद सात टांडा बंदियों की मौत हो गई थी। इसमें जेल के 48 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, मगर वर्ष 2007 में मुकदमा खत्म कर दिया गया। इससे न्याय की आस लगाए बैठे पीड़ितों का बड़ा धक्का लगा। इधर अब पुन: इस मामले में कार्रवाई शुरू होने से पीड़ितों में एक बार फिर न्याय की आस जागी है।
पहले बैरक से बाहर निकाला, फिर पीट-पीटकर मार डाला
घटना 8/9 नवंबर 1994 की है। मैं भी बैरक नंबर सात में बंद था। अचानक बैरक में घुसे जेलकर्मियों ने एक-एक कर बंदियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया। बैरक नंबर चार में ले जाकर पीट-पीट कर सात बंदियों को मार डाला था। 21 बंदी गंभीर घायल थे। पिटाई से मैं भी घायल हुआ था। न्याय की आस लगाए 28 साल पूरे हो गए। किसी की गवाही तक नहीं हुई और मुकदमा खत्म कर दिया गया। जेल में बंदियों की हत्या की गई थी। न्याय मिलने की आज तक आस लगाए बैठा हूं। - महेंद्र सिंह, खरौसा
मामले की हो सुनवाई... दोषियों को मिले कड़ी सजा
घटना बैरक नंबर सात की है। मैं कई साथियों के साथ बैरक नंबर छह में था। अचानक अलार्म बजा और जेलकर्मियों ने बैरक नंबर सात से एक-एक बंदी को निकालकर बैरक नंबर चार में लेजाकर पीटना शुरू कर दिया था। सात बंदियों की मौत हो गई थी। घटना के बाद बंदियों में दहशत फैल गई। मेरे ससुर ज्ञानी त्रिलोचन सिंह शोर-शराबा पर रात को ही जेल गेट पर पहुंच गए थे। गेट पर लोगों ने काफी शोर-शराबा भी किया गया, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। घायल बंदी और मौत के मुंह में समाए बंदियों के परिवारों को न्याय नहीं मिल सका। मामले की सही ढंग से सुनवाई हो और दोषियों को कड़ी सजा मिले। - सुखदेव सिंह छीना, हरसिंहपुर