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ब्लड कंपोनेंट लैब न होने से गरीबों की जान आफत में
ब्यूरो /पीलीभीत
Updated Sun, 09 Oct 2016 11:24 PM IST
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जिले में सरकारी स्तर पर ब्लड कंपोनेंट लैब न होने से अकसर गरीब मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। जिले में डेंगू के बढ़े प्रकोप व ट्रामा केसों के दौरान कंपोनेंट लैब न होने से मरीजों को होल ब्लड ही दिया जा रहा है। करीब साल भर पहले शासन को प्रपोजल भी बनाकर भेजा गया था, लेकिन अभी तक इसको हरी झंडी नहीं मिल सकी है।
जिला अस्पताल स्थित ब्लड बैंक में सीमित ब्लड यूनिट होने से गंभीर केसों (डेंगू, ट्रामा केस) को बरेली, लखनऊ समेत अन्य महानगरों में रेफर कर दिया जाता है। वजह है ब्लड कंपोनेंट लैब का न होना। ऐसे में सीमित संसाधनों के चलते अस्पताल प्रशासन को इलाज करना मजबूरी बन जाता है। ऐसे में अकसर मरीजों का अन्य अवयवों की दरकार होने के बावजूद होल ब्लड ही चढ़ाया जा रहा है। गत वर्ष अक्तूबर माह में जिला अस्पताल का निरीक्षण करने आई डीजी हेल्थ जिले में ब्लड कंपोनेंट लैब न होने पर इसका प्रपोजल बनाकर शासन को भेजने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अस्पताल प्रशासन द्वारा महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं को प्रपोजल बनाकर भेज दिया गया, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी यहां कंपोनेंट लैब को हरी झंडी नहीं मिल सकी है। हालांकि शहर के एक अन्य प्राइवेट ब्लड बैंक में कंपोनेंट लैब हाल ही में स्थापित की गई है।
कंपोनेंट लैब स्थापित होने से बचेगी चार जिंदगियां
ब्लड सेपरेशन यूनिट के माध्यम से एक यूनिट ब्लड से लाल रूधिर कणिकाएं, प्लाज्मा, सफेद रूधिर कणिकाएं व प्लेटलेट्स अलग अलग किए जा सकते हैं। कैंसर पीड़ित मरीज को सफेद रूधिर कणिकाएं, एनीमिया के रोगी को लाल रूधिर कणिकाएं, जले हुए व्यक्ति को प्लाजमा व डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स दिए जाते हैं। सीएमएस डॉ. आरसी शर्मा बताते हैं कि कंपोनेंट लैब से खून की बचत होती है। एक यूनिट रक्त में चार रोगियों का इलाज संभव है।
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शासन से स्वीकृति मिलने का इंतजार
कंपोनेंट लैब का प्रपोजल पूर्व में शासन को भेजा दिया गया था। निश्वित तौर पर कंपोनेंट के स्थापित होने पर मरीजों को काफी सहूलियत मिल सकेगी। शासन से स्वीकृति मिलने का इंतजार है।
डॉ. महावीर सिंह, प्रभारी, राजकीय रक्तकोष
जिला अस्पताल स्थित ब्लड बैंक में सीमित ब्लड यूनिट होने से गंभीर केसों (डेंगू, ट्रामा केस) को बरेली, लखनऊ समेत अन्य महानगरों में रेफर कर दिया जाता है। वजह है ब्लड कंपोनेंट लैब का न होना। ऐसे में सीमित संसाधनों के चलते अस्पताल प्रशासन को इलाज करना मजबूरी बन जाता है। ऐसे में अकसर मरीजों का अन्य अवयवों की दरकार होने के बावजूद होल ब्लड ही चढ़ाया जा रहा है। गत वर्ष अक्तूबर माह में जिला अस्पताल का निरीक्षण करने आई डीजी हेल्थ जिले में ब्लड कंपोनेंट लैब न होने पर इसका प्रपोजल बनाकर शासन को भेजने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अस्पताल प्रशासन द्वारा महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं को प्रपोजल बनाकर भेज दिया गया, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी यहां कंपोनेंट लैब को हरी झंडी नहीं मिल सकी है। हालांकि शहर के एक अन्य प्राइवेट ब्लड बैंक में कंपोनेंट लैब हाल ही में स्थापित की गई है।
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कंपोनेंट लैब स्थापित होने से बचेगी चार जिंदगियां
ब्लड सेपरेशन यूनिट के माध्यम से एक यूनिट ब्लड से लाल रूधिर कणिकाएं, प्लाज्मा, सफेद रूधिर कणिकाएं व प्लेटलेट्स अलग अलग किए जा सकते हैं। कैंसर पीड़ित मरीज को सफेद रूधिर कणिकाएं, एनीमिया के रोगी को लाल रूधिर कणिकाएं, जले हुए व्यक्ति को प्लाजमा व डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स दिए जाते हैं। सीएमएस डॉ. आरसी शर्मा बताते हैं कि कंपोनेंट लैब से खून की बचत होती है। एक यूनिट रक्त में चार रोगियों का इलाज संभव है।
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शासन से स्वीकृति मिलने का इंतजार
कंपोनेंट लैब का प्रपोजल पूर्व में शासन को भेजा दिया गया था। निश्वित तौर पर कंपोनेंट के स्थापित होने पर मरीजों को काफी सहूलियत मिल सकेगी। शासन से स्वीकृति मिलने का इंतजार है।
डॉ. महावीर सिंह, प्रभारी, राजकीय रक्तकोष