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स्वास्थ्य मंत्री जी अस्पताल में मरीजों की भरमार पर देखने के डॉक्टरों की है बड़ी मार
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जिला अस्पताल में एक्स-रे कक्ष के बाहर जमीन पर बैठे मरीज। संवाद
- फोटो : PILIBHIT
पीलीभीत। स्वास्थ्य मंत्री/उप मुख्यमंत्री बुधवार को जिले के दौरे पर हैं। ऐसे में लोगों में उम्मीद जागी है कि शायद स्वास्थ्य मंत्री जिला अस्पताल आकर यहां मरीजों का हाल देख लें। उस ओपीडी में चले जाएं, जो मरीजों से पटी रहती है लेकिन उन्हें डॉक्टर नहीं मिलते। जिला अस्पताल मरीजों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दे पा रहा है। अस्पताल में डॉक्टरों के 26 पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां महज 11 डॉक्टर ही मौजूद हैं। तमाम बीमारियों से परेशान मरीज अस्पताल आते हैं लेकिन डॉक्टर के न मिलने पर मायूस होकर चले जाते हैं।
जिला अस्पताल में आने वाले मरीजों में सबसे अधिक मरीज फिजिशियन को ही दिखाने आते हैं। एक मात्र फिजिशियन ओपीडी के अलावा इमरजेंसी ड्यूटी भी कर रहे हैं। इमरजेंसी में डॉक्टर न होने कारण उन्हें सप्ताह में तीन रात यहां ड्यूटी करनी पड़ती है। जिस कारण फिजिशियन दूसरे दिन सुबह अस्पताल में नहीं बैठ पाते। नतीजा यह होता है कि मरीज आते हैं और डॉक्टर न मिलने पर घंटों इंतजार कर लौट जाते हैं। जिला अस्पताल की ओपीडी में महज तीन दिन ही डॉक्टर बैठते हैं। चेस्ट फिजिशियन का यहां पद तो जरूर है लेकिन तैनाती किसी की नहीं है।
जिला अस्पताल में जनरल सर्जन के दो पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां एक भी नहीं है। यहां महज आर्थोपेडिक सर्जन ही मौजूद है। जनरल सर्जन न होने के कारण पथरी जैसी बीमारी तक के ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं। लोगों को प्राइवेट अस्पताल में जाना पड़ रहा है।
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बंद पड़ा है बर्न वार्ड
जिला अस्पताल में बर्न वार्ड है लेकिन यह बंद पड़ा है। आपात स्थिति में जले मरीजों को वार्ड में शिफ्ट करने के कोई भी इंतजाम नहीं हैं। न ही देखरेख के लिए अलग से कोई चिकित्सक तैनात किया जाता है। जले हुए मरीजों के लिए अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन भी नहीं है। कभी मरीज आते हैं तो स्टाफ नर्स ही जिम्मेदारी संभालती हैं।
‘अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। इसके लिए शासन को कई बार पत्र लिखा गया है। कम स्टाफ में भी व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।’ - डॉ. बीएस यादव, सीएमएस
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जिला अस्पताल में आने वाले मरीजों में सबसे अधिक मरीज फिजिशियन को ही दिखाने आते हैं। एक मात्र फिजिशियन ओपीडी के अलावा इमरजेंसी ड्यूटी भी कर रहे हैं। इमरजेंसी में डॉक्टर न होने कारण उन्हें सप्ताह में तीन रात यहां ड्यूटी करनी पड़ती है। जिस कारण फिजिशियन दूसरे दिन सुबह अस्पताल में नहीं बैठ पाते। नतीजा यह होता है कि मरीज आते हैं और डॉक्टर न मिलने पर घंटों इंतजार कर लौट जाते हैं। जिला अस्पताल की ओपीडी में महज तीन दिन ही डॉक्टर बैठते हैं। चेस्ट फिजिशियन का यहां पद तो जरूर है लेकिन तैनाती किसी की नहीं है।
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जिला अस्पताल में जनरल सर्जन के दो पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां एक भी नहीं है। यहां महज आर्थोपेडिक सर्जन ही मौजूद है। जनरल सर्जन न होने के कारण पथरी जैसी बीमारी तक के ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं। लोगों को प्राइवेट अस्पताल में जाना पड़ रहा है।
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बंद पड़ा है बर्न वार्ड
जिला अस्पताल में बर्न वार्ड है लेकिन यह बंद पड़ा है। आपात स्थिति में जले मरीजों को वार्ड में शिफ्ट करने के कोई भी इंतजाम नहीं हैं। न ही देखरेख के लिए अलग से कोई चिकित्सक तैनात किया जाता है। जले हुए मरीजों के लिए अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन भी नहीं है। कभी मरीज आते हैं तो स्टाफ नर्स ही जिम्मेदारी संभालती हैं।
‘अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। इसके लिए शासन को कई बार पत्र लिखा गया है। कम स्टाफ में भी व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।’ - डॉ. बीएस यादव, सीएमएस